लड़की पैदा हुई तो केंद्र जिम्मेदार... कौन हैं पंजाब में BJP विधायक अश्विनी शर्मा, जो ऐसा बयान देकर फंसे, बाद में मांगी माफी

पंजाब विधानसभा में BJP विधायक अश्विनी शर्मा की लड़की के जन्म पर टिप्पणी से विवाद हुआ. AAP के विरोध के बाद उन्होंने बयान पर खेद जताकर माफी मांगी.

Curated By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 6 Aug 2026 6:27 PM IST

पंजाब विधानसभा में गुरुवार को खनन से होने वाली कमाई पर बहस अचानक राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से निकलकर लड़के और लड़की के बीच कथित भेदभाव की बहस में बदल गई. केंद्र पर पंजाब के साथ भेदभाव का आरोप लगा रहे आम आदमी पार्टी के मंत्री को जवाब देते हुए BJP विधायक अश्विनी शर्मा ने ऐसा उदाहरण दिया, जिस पर सदन में हंगामा खड़ा हो गया. एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक शर्मा ने कहा कि अगर किसी परिवार में लड़की पैदा होती है तो उसका दोष भी केंद्र सरकार को दिया जाता है, जबकि लड़का पैदा होने पर उसे परिवार की मेहनत बताया जाता है.

आम आदमी पार्टी ने पंजाब बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष शर्मा के इस बयान को लपक लिया. AAP ने इस टिप्पणी को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण सोच बताया और शर्मा से माफी की मांग की. विवाद बढ़ने के बाद शर्मा ने अपनी टिप्पणी पर खेद जताया और कहा कि उन्होंने पंजाब में प्रचलित एक कहावत का उदाहरण दिया.

पंजाब विधानसभा में अश्विनी शर्मा ने क्या कहा?

दरअसल, विधानसभा में विवाद की शुरुआत पंजाब में माइनिंग से होने वाली कमाई को लेकर हुई बहस से हुई. माइनिंग और जियोलॉजी मंत्री नरिंदर कुमार गोयल ने आरोप लगाया कि अगर केंद्र सरकार ने पंजाब का सहयोग किया होता तो राज्य को माइनिंग से बड़ी आय हो सकती थी. उन्होंने दावा किया कि अवैध माइनिंग के खिलाफ राज्य सरकार कार्रवाई कर रही है और केंद्र की ओर से इसके लिए राज्य को सम्मान भी मिला है.

इसी के जवाब में BJP विधायक अश्विनी शर्मा ने AAP पर हर समस्या के लिए केंद्र को जिम्मेदार ठहराने का आरोप लगाया. इसी दौरान उन्होंने लड़की के जन्म को लेकर विवादित उदाहरण दिया. उनके बयान पर सत्तापक्ष ने तुरंत आपत्ति जताई और इसे महिला विरोधी टिप्पणी बताया.

AAP ने क्यों उठाया महिला सम्मान का मुद्दा?

अश्विनी शर्मा की टिप्पणी के बाद मंत्री अमन अरोड़ा ने तीखा विरोध जताया. उन्होंने सवाल किया कि क्या BJP विधायक लड़के और लड़की के बीच अंतर करते हैं. उन्होंने कहा कि आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और ऐसे समय में सदन में इस तरह की टिप्पणी स्वीकार नहीं की जा सकती.

AAP ने शर्मा से हर बच्ची से माफी मांगने की मांग की. विवाद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान से भी जोड़ते हुए सत्तापक्ष ने सवाल उठाया कि जब केंद्र सरकार खुद बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा की बात करती है, तब BJP के एक विधायक की ऐसी टिप्पणी को कैसे उचित माना जा सकता है?

कौन हैं अश्विनी शर्मा?

अश्विनी शर्मा पंजाब BJP के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे हैं और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं. वह पंजाब विधानसभा में BJP का प्रतिनिधित्व करते हैं और सदन में पार्टी के प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं.

शर्मा लंबे समय से पंजाब की राजनीति में सक्रिय हैं और राज्य सरकार की नीतियों तथा आम आदमी पार्टी के खिलाफ BJP की ओर से मुखर होकर पक्ष रखते रहे हैं. यही वजह है कि विधानसभा में दिया गया उनका बयान राजनीतिक रूप से भी चर्चा का विषय बन गया.

विवाद बढ़ा तो अश्विनी शर्मा ने क्या सफाई दी?

बयान पर विवाद बढ़ने के बाद शर्मा ने सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने पंजाब में आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली एक कहावत का उदाहरण दिया था. उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य बेटियों का अपमान करना नहीं था और अगर उनके शब्दों से किसी को ठेस पहुंची है तो उन्हें खेद है.

शर्मा ने यह भी कहा कि उनके परिवार में बेटियों का सम्मान है और वह अपनी बेटियों का आशीर्वाद लेकर ही घर से निकलते हैं. उन्होंने टिप्पणी को रिकॉर्ड से हटाए जाने पर भी सहमति जताई, अगर सदन को लगता है कि उनके शब्द उचित नहीं थे.

हालांकि, माफी के साथ शर्मा ने AAP पर पलटवार भी किया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महिलाओं के मुद्दे पर राजनीति कर रही है और जब महिला प्रदर्शनकारियों पर कथित कार्रवाई होती है, तब सत्तापक्ष की महिला सम्मान को लेकर चिंता दिखाई नहीं देती.

बयान से बड़ा सवाल क्या खड़ा हुआ?

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर राजनीतिक बहस की भाषा और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को लेकर इस्तेमाल होने वाले उदाहरणों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. विधानसभा में राजनीतिक कटाक्ष करते समय किसी भी ऐसे उदाहरण से बचने की जरूरत है, जिसे महिलाओं या बेटियों के प्रति भेदभाव के रूप में देखा जा सकता है.

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान को राष्ट्रीय प्राथमिकता के तौर पर सामने रखता है, दूसरी तरफ राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान उसी संवेदनशीलता की कसौटी पर परखे जाते हैं.

अश्विनी शर्मा ने अपनी टिप्पणी पर खेद जरूर जताया है, लेकिन अब विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है. सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक बहस में विरोधी सरकार पर हमला करने के लिए ऐसे उदाहरणों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जो समाज में लैंगिक समानता के संदेश के उलट समझे जा सकते हैं?

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