Exclusive: अमृतपाल जेल में, फिर भी पंजाब में क्यों कायम है उसका जलवा? वारिस पंजाब दे के साथ क्यों खड़े हैं लोग?
| अमृतपाल सिंह जेल में बंद है, लेकिन पंजाब में उसका प्रभाव अब भी कायम है. जानिए क्यों युवा और समर्थक वारिस पंजाब दे से जुड़ रहे हैं और इसके पीछे क्या वजहें हैं.
पंजाब की राजनीति में अमृतपाल सिंह की मौजूदगी एक दिलचस्प सवाल खड़ा करती है. वह जेल में बंद है, लेकिन उसके नाम की चर्चा लगातार बनी हुई है. 2024 के लोकसभा चुनाव में जेल में रहते हुए खडूर साहिब से जीत हासिल करना इस बात का बड़ा संकेत था कि पंजाब में उसके समर्थकों का एक मजबूत आधार मौजूद है. यानी वो जेल में भले ही बंद है, पर उसका असर लोगों के दिलों में अब भी है. आखिर अमृतपाल के पीछे कौन लोग खड़े हैं? उसकी लोकप्रियता की वजह धार्मिक पहचान है, युवाओं की नाराजगी या पारंपरिक पंथक राजनीति में आई खाली जगह? इन सवालों को समझने के लिए स्टेट मिरर ने पंजाब की सीनियर जर्नलिस्ट वंदना शर्मा से बातचीत की. समझें उन्होंने क्या कहा?
सीनियर जर्नलिस्ट वंदना शर्मा के मुताबिक, पंजाब में सिख मतदाताओं को मोटे तौर पर तीन अलग-अलग धाराओं में समझा जा सकता है. पहली धारा पंथक राजनीति से जुड़ी है, दूसरी गरमपंथी विचारधारा से प्रभावित है और तीसरी उन युवाओं की है, जो मौजूदा व्यवस्था से नाराज हैं. उनके मुताबिक, अमृतपाल और ‘वारिस पंजाब दे’ को मिल रहे समर्थन को समझने के लिए इन तीनों धाराओं को अलग-अलग देखना जरूरी है.
पंजाब में पंथक वोट किसके साथ खड़ा है?
वंदना शर्मा बताती हैं कि सिख मतदाताओं का एक वर्ग पंथक राजनीति और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) से जुड़ा है. इस धारा में गुरुद्वारों के प्रबंधन और धार्मिक संस्थाओं से जुड़े लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है. परंपरागत रूप से इस वर्ग का झुकाव शिरोमणि अकाली दल की तरफ रहा है. इसलिए इस धड़े का समर्थन अकाली दल की राजनीतिक स्थिति और उसके गठबंधन से भी प्रभावित हो सकता है.
उनके मुताबिक, पहले अकाली दल से अलग हुए एक गुट की वजह से पंथक वोटों में बंटवारा देखने को मिला था. इस गुट ने अलग होकर शिरोमणि अकाली दल (सुरजीत) के नाम से अपनी पहचान बनाई थी. अब इस गुट के दोबारा अकाली दल में शामिल होने से पंथक राजनीति में समीकरण बदल सकते हैं. वंदना शर्मा का मानना है कि अगर अकाली दल और बीजेपी के बीच गठबंधन होता है तो इस धड़े का समर्थन गठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में जा सकता है. हालांकि, इसका वास्तविक असर चुनावी गठबंधन और स्थानीय उम्मीदवारों के आधार पर ही तय होगा.
क्या भिंडरवाला विचारधारा से प्रभावित लोग अमृतपाल के साथ हैं?
वंदना शर्मा के मुताबिक सिख समाज की दूसरी धारा गरमपंथी विचारधारा से प्रभावित लोगों की है. इस वर्ग के कुछ लोग जरनैल सिंह भिंडरांवाले और खालिस्तान की विचारधारा से प्रभावित रहे हैं. ये पंजाब की राजनीति और भविष्य को अलग नजरिए से देखते हैं. उनके मुताबिक, इस धड़े के भीतर भी अलग-अलग तरह की सोच है और सभी लोगों को एक ही राजनीतिक विचारधारा वाला मानना ठीक नहीं होगा.
वंदना शर्मा कहती हैं कि इस वर्ग के लोगों का झुकाव अमृतपाल की तरफ भी दिखाई देता है. अमृतपाल ने अपने भाषणों और गतिविधियों में सिख पहचान, धार्मिक मुद्दों और पंथक सवालों को प्रमुखता दी है. इसी वजह से विचारधारा के स्तर पर उससे सहमति रखने वाले कुछ लोग उसके समर्थन में खड़े नजर आते हैं. हालांकि, इस समर्थन को पूरे सिख समाज की राय नहीं माना जा सकता.
व्यवस्था से नाराज युवा अमृतपाल से क्यों जुड़ रहे हैं?
वंदना शर्मा के मुताबिक, तीसरी धारा उन युवाओं की है, जो मौजूदा व्यवस्था से नाराज हैं और राजनीति में नए विकल्प की तलाश कर रहे हैं. ऐसे युवाओं की मौजूदगी केवल ग्रामीण इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी क्षेत्रों में भी उनका समर्थन देखने को मिलता है. इनमें से कुछ युवा धार्मिक और पंथक मुद्दों से प्रभावित हैं, जबकि कुछ का जुड़ाव सामाजिक समस्याओं और व्यवस्था के प्रति नाराजगी से है.
उनका कहना है कि अमृतपाल को युवाओं के बीच पहचान दिलाने में नशे के खिलाफ चलाया गया अभियान भी एक बड़ी वजह रहा. जेल जाने से पहले अमृतपाल ने नशा उन्मूलन को लेकर अभियान चलाया था. इस दौरान नशे की लत से जूझ रहे लोगों को उससे बाहर निकालने और नशा मुक्ति केंद्रों के जरिए मदद पहुंचाने की कोशिश की गई. वंदना शर्मा के मुताबिक, इस अभियान से प्रभावित युवाओं और उनके परिवारों के बीच अमृतपाल के प्रति समर्थन पैदा हुआ. यही वजह है कि उसकी गैरमौजूदगी में भी उसका प्रभाव बना हुआ है.
जेल में रहते हुए अमृतपाल ने खडूर साहिब का चुनाव कैसे जीता?
अमृतपाल के प्रभाव का सबसे बड़ा राजनीतिक उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है. जेल में रहते हुए उसने खडूर साहिब सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उसे 4,04,430 वोट मिले, जबकि कांग्रेस उम्मीदवार कुलबीर सिंह जीरा को 2,07,310 वोट मिले. अमृतपाल ने करीब 1.97 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.
वंदना शर्मा के बताए तीनों सामाजिक और राजनीतिक धड़ों के संदर्भ में इस नतीजे को देखा जा सकता है. हालांकि, यह जीत अपने आप में यह साबित नहीं करती कि तीनों धड़े एक साथ अमृतपाल के समर्थन में आ गए थे. इतना जरूर है कि जेल में रहते हुए इतनी बड़ी जीत ने पंजाब की राजनीति में उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और समर्थकों के प्रभाव को सामने ला दिया.
क्या अकाली दल की कमजोरी से ‘वारिस पंजाब दे’ को जगह मिली?
पंजाब में लंबे समय तक शिरोमणि अकाली दल पंथक राजनीति का प्रमुख चेहरा रहा है. लेकिन पिछले कुछ चुनावों में पार्टी का राजनीतिक आधार कमजोर हुआ है. ऐसे में अमृतपाल और ‘वारिस पंजाब दे’ को उन लोगों के बीच जगह बनाने का अवसर मिला, जो पारंपरिक अकाली राजनीति से संतुष्ट नहीं थे या नए नेतृत्व की तलाश में थे.
वंदना शर्मा के विश्लेषण के मुताबिक, अमृतपाल को मिल रहा समर्थन केवल एक वजह से नहीं जुड़ा है. इसमें धार्मिक पहचान, गरमपंथी विचारधारा से प्रभावित लोगों और व्यवस्था से नाराज युवाओं की अलग-अलग भूमिका है. यही वजह है कि उसके समर्थन को केवल किसी एक राजनीतिक या सामाजिक वर्ग तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता.
क्या अमृतपाल का व्यक्तिगत प्रभाव संगठन को भी मजबूत बना पाएगा?
अमृतपाल की लोकप्रियता और ‘वारिस पंजाब दे’ की चुनावी ताकत दो अलग-अलग बातें हैं. 2024 में अमृतपाल ने जेल में रहते हुए लोकसभा चुनाव जीता, लेकिन किसी संगठन को लंबे समय तक राजनीतिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए स्थानीय नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और लगातार जनसंपर्क की जरूरत होती है. अमृतपाल की गैरमौजूदगी में संगठन के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है.
वंदना शर्मा का साफ मत है कि अमृतपाल को समर्थन देने वाले लोगों की वजहें अलग-अलग हैं. किसी के लिए वह पंथक और धार्मिक पहचान का चेहरा है, तो किसी के लिए नशे के खिलाफ अभियान चलाने वाला नेता. वहीं, कुछ युवा उसे व्यवस्था के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर करने का माध्यम मानते हैं. अब देखना होगा कि ‘वारिस पंजाब दे’ इन अलग-अलग धड़ों के समर्थन को कितनी दूर तक एकजुट रख पाता है और क्या अमृतपाल का व्यक्तिगत प्रभाव आने वाले चुनावों में संगठन की स्थायी राजनीतिक ताकत बन सकेगा.