14 साल जेल में बिताए, फिर MP कोर्ट में खुला राज! जिस FSL रिपोर्ट पर हुई सजा, उसका इस केस से नहीं था कोई लेना-देना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में करीब 14 साल से जेल में बंद दो दोषियों को बड़ी राहत दी ह. कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया, क्योंकि FSL रिपोर्ट किसी दूसरे मामले की थी.

Edited By :  हेमा पंत
Updated On : 8 Aug 2026 8:47 AM IST

14 साल तक जेल में रहने के बाद मध्य प्रदेश के दो लोगों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे तुलसीराम राजपाल और हरप्रसाद की दोषसिद्धि को कोर्ट ने पलट दिया. सुनवाई के दौरान ऐसा चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि जिस FSL रिपोर्ट को ट्रायल कोर्ट ने सबूत मानकर सजा सुनाई थी, वह इस मामले की थी ही नहीं. रिपोर्ट किसी दूसरे केस से जुड़ी थी, जिसमें आरोपी, हथियार और घायल व्यक्ति तक अलग थे.

मामला 2009 का है, जब प्यारे लाल गड़रिया पर घर में घुसकर हमला करने का आरोप दोनों पर लगा था। 2012 में दमोह की स्पेशल सेशन कोर्ट ने दोनों को हत्या समेत अन्य धाराओं में उम्रकैद सुनाई थी. लेकिन हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान FIR को लेकर भी कई सवाल उठे. जांच अधिकारी ने माना कि FIR उनकी लिखावट में नहीं थी और उसे लिखने वाले पुलिसकर्मी की पहचान भी नहीं हो सकी. डॉक्टर की गवाही में प्यारे लाल को अस्पताल पहुंचने पर मृत बताया गया था, जिससे यह संदेह भी गहरा गया कि FIR आखिर किसने और कब दर्ज कराई. इन्हीं गंभीर खामियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोनों की सजा रद्द कर दी.

क्या है पूरा मामला?

मामला 25 अगस्त 2009 की रात का है. अभियोजन के अनुसार, प्यारे लाल गड़रिया ने शिकायत की थी कि आरोपी तुलसीराम राजपाल और हरप्रसाद उसके घर में घुसे थे. आरोप था कि उन्होंने परिवार के लोगों के साथ गाली-गलौज और मारपीट की. अभियोजन के मुताबिक, इसी दौरान तुलसीराम ने प्यारे लाल के पेट में चाकू मार दिया, जबकि हरप्रसाद और एक अन्य व्यक्ति ने उसे पकड़ रखा था. पुलिस की कार्रवाई के बाद यह मामला अदालत पहुंचा. ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 15 गवाह पेश किए. इसके बाद 29 जून 2012 को दमोह की स्पेशल सेशन कोर्ट ने तुलसीराम और हरप्रसाद को हत्या समेत अन्य धाराओं में दोषी ठहराया और दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई.

14 साल बाद सामने आई FSL रिपोर्ट की बड़ी गलती

मामले में हाईकोर्ट की सुनवाई के दौरान सबसे अहम बात फॉरेंसिक रिपोर्ट को लेकर सामने आई. कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जिस FSL रिपोर्ट को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया था, वह इस मामले से संबंधित ही नहीं थी. रिपोर्ट किसी दूसरे मुकदमे की थी. उसमें आरोपी अलग थे, हथियार अलग थे और घायल व्यक्ति भी अलग थे. इसके बावजूद इस रिपोर्ट को मौजूदा केस में रिकॉर्ड पर लिया गया और आरोपियों से भी इसके बारे में पूछताछ की गई. ट्रायल कोर्ट ने इसी रिपोर्ट को अपने फैसले में आधार बनाया. हाईकोर्ट की बेंच ने इस पर हैरानी जताते हुए कहा कि यह ट्रायल कोर्ट की गंभीर लापरवाही है. कोर्ट के मुताबिक, केवल इस गलती के आधार पर भी निचली अदालत का फैसला हटाया जा सकता था.

किसने लिखी थी फिर?

हाईकोर्ट को जांच के दौरान FIR को लेकर भी गंभीर सवाल मिले. जांच अधिकारी अशोक कुमार ननामा ने माना कि FIR उनकी अपनी लिखावट में नहीं थी. उन्हें मौका दिए जाने के बावजूद वह यह नहीं बता सके कि FIR लिखने वाला पुलिस अधिकारी कौन था. कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति ने FIR लिखी, उसका बयान अदालत में होना जरूरी था. लेकिन इस मामले में किसी अज्ञात पुलिसकर्मी ने रिपोर्ट लिखी और जांच अधिकारी ने उस पर सिर्फ साइन किए.

क्या प्यारे लाल ने खुद दर्ज कराई थी FIR?

मामले में यह सवाल भी अहम बन गया कि आखिर FIR वास्तव में किसने दर्ज कराई थी. बचाव पक्ष ने इस बात पर सवाल उठाया कि क्या प्यारे लाल ने खुद FIR दर्ज कराई थी या उस समय तक उनकी मौत हो चुकी थी. कोर्ट ने डॉक्टर की गवाही का भी ध्यान रखा, जिसमें कहा गया था कि प्यारे लाल को अस्पताल मृत अवस्था में लाया गया था. ऐसे में FIR दर्ज होने के समय उनकी स्थिति क्या थी, इस पर गंभीर संदेह पैदा हुआ.

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि FIR पर लगा अंगूठे का निशान वास्तव में प्यारे लाल का ही था. कोर्ट ने इस संभावना को भी खारिज नहीं किया कि उनकी मौत के बाद किसी अन्य व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई हो और FIR पर उनका अंगूठा लगवा दिया गया हो.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने मामले की पूरी जांच और सबूतों को देखने के बाद कहा कि अभियोजन की कहानी गंभीर कमियों से घिरी हुई है. FIR की असलियत, अंगूठे के निशान और FSL रिपोर्ट तीनों को लेकर संदेह पैदा हुआ. कोर्ट ने माना कि ये सिर्फ छोटी तकनीकी गलतियां नहीं थीं, बल्कि इनका सीधा असर पूरे केस की विश्वसनीयता पर पड़ता है. इसलिए दोनों आरोपियों के खिलाफ दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को बरकरार रखना मुमकिन नहीं है.

14 साल जेल के बाद दोनों को मिली राहत

इन सभी खामियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने तुलसीराम राजपाल और हरप्रसाद की सजा और दोषसिद्धि रद्द कर दी. यानी जिस हत्या के मामले में दोनों को 2012 में उम्रकैद सुनाई गई थी, करीब 14 साल जेल में रहने के बाद हाईकोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया. कोर्ट ने साफ किया कि जब जांच और सबूतों में इतनी गंभीर कमियां हों और अभियोजन अपने ही महत्वपूर्ण साक्ष्यों को विश्वसनीय तरीके से साबित न कर पाए, तो केवल ऐसे आधार पर किसी व्यक्ति की सजा कायम नहीं रखी जा सकती.

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