सालों से अलग रह रहे थे पति-पत्नी, फिर आई तलाक की याचिका... जानें क्या कहकर झारखंड हाई कोर्ट ने तलाक देने से कर दिया मना?
झारखंड हाई कोर्ट का कहना है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना भी तलाक का आधार नहीं बन सकता, जब तक यह साबित न हो कि किसी एक ने जानबूझकर हमेशा के लिए शादी का रिश्ता छोड़ दिया है.
Jharkhand High Court
(Image Source: ANI )झारखंड हाई कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच विवाद और तलाक से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर पत्नी अपने ससुराल वालों से अलग घर में रहने की मांग करती है, तो इसे अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता. सिर्फ लंबे समय तक अलग रहने से भी तलाक का आधार नहीं बनता. अदालत ने इसी वजह से पति की तलाक की मांग खारिज करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है.
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का कुछ समय के लिए गुस्से या नाराजगी में अलग हो जाना यह साबित नहीं करता कि उसने हमेशा के लिए वैवाहिक रिश्ता खत्म करने का फैसला कर लिया है.
क्या है हाई कोर्ट का कहना?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी पति या पत्नी का कुछ समय के लिए गुस्से या नाराजगी में अलग रहना अपने आप में रिश्ते को त्यागना नहीं माना जा सकता. इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति ने बिना उचित कारण के वैवाहिक रिश्ता छोड़ने का इरादा बना लिया था. पीठ ने कहा "अगर कोई अपने पार्टनर को कुछ समय के लिए, जैसे गुस्सा या नफरत की हालत में, हमेशा के लिए साथ रहने का इरादा किए बिना छोड़ देता है, तो इसे छोड़ना नहीं माना जाएगा."
अदालत ने यह भी साफ किया कि कई बार परिस्थितियों के कारण पति या पत्नी को वैवाहिक घर छोड़ना पड़ सकता है. कुछ मामलों में दोनों पक्ष आपसी सहमति से अपने मतभेद सुलझाने के लिए अलग रहने का फैसला करते हैं.
पत्नी की अलग रहने की मांग पर क्या बोला कोर्ट?
अदालत ने कहा कि पत्नी का ससुराल वालों से अलग घर में रहने की इच्छा जताना अपने आप में मानसिक पीड़ा साबित नहीं करता. इसके लिए यह देखना जरूरी है कि क्या उसके व्यवहार में अपमानजनक रवैया था और क्या इसे साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं.
क्या है पूरा मामला?
मामले के मुताबिक, इस दंपती की शादी 25 नवंबर 2007 को हुई थी. उनकी दो बेटियां हैं. पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी उसके साथ शारीरिक और मानसिक क्रूरता करती थी. वह अक्सर उससे झगड़ा करती थी और उसके पिता तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ रहने पर आपत्ति जताती थी. पति का यह भी आरोप था कि पत्नी लगातार अलग घर में रहने का दबाव बनाती थी. उसने दावा किया कि पत्नी आत्महत्या करने की धमकी देती थी और उसकी दिवंगत मां के लॉकर से गहने भी ले गई थी.
पति ने कब दायर की थी याचिका?
पति ने साल 2017 में वैवाहिक अधिकारों की बहाली के लिए अदालत में याचिका दायर की थी. इसके बाद सुलह की प्रक्रिया हुई, जिसमें पति-पत्नी दोबारा साथ रहने के लिए राजी हो गए. इस समझौते के बाद पति ने पत्नी और बेटियों के रहने के लिए एक किराए का फ्लैट भी उपलब्ध कराया. हालांकि, कुछ समय बाद दोनों के बीच फिर विवाद शुरू हो गया. पति का आरोप था कि पत्नी ने ससुराल लौटने से इनकार कर दिया और पुलिस तथा राज्य महिला आयोग में उसके खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज कराई.। इसके बाद पति ने तलाक की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया.
कब खारिज हुई थी तलाक की याचिका?
फैमिली कोर्ट ने मई 2025 में पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी. इस फैसले को चुनौती देते हुए पति ने झारखंड हाई कोर्ट में अपील की. पति के वकील अतनु बनर्जी ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने मामले में पेश किए गए सबूतों का सही तरीके से आकलन नहीं किया. उन्होंने कहा कि पत्नी का व्यवहार मानसिक क्रूरता और परित्याग की श्रेणी में आता है. पति के आरोपों को खारिज करते हुए पत्नी के वकील दिलीप कुमार ने अदालत में कहा कि पति ने ही उसे अपनी बेटियों के साथ ससुराल छोड़ने के लिए मजबूर किया था.
उन्होंने दावा किया कि पति ने 2019 में किराया और घर का खर्च देना भी बंद कर दिया था, जिसके कारण पत्नी को अपने मायके वालों पर निर्भर रहना पड़ा. पत्नी की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि पति उसके साथ मारपीट और उत्पीड़न करता था. वकील ने कहा कि पति ने उससे 3 लाख रुपये की मांग की थी और उस पर बेटा पैदा करने का दबाव भी बनाया था.