आधी रात की एक कॉल, बाकी सब अंधेरा : असम से निकाले गए लोगों के परिवार भटके, कोई बांग्लादेश में तो कोई लापता

असम में 1950 के Immigrants (Expulsion from Assam) Act को दोबारा लागू कर विदेशी घोषित लोगों को तेजी से बाहर निकाले जाने की कार्रवाई ने कई परिवारों को गहरे संकट में डाल दिया है. नगांव जिले के 15 लोगों को 24 घंटे में भारत छोड़ने का आदेश दिया गया, जिसके बाद उन्हें माटिया ट्रांजिट कैंप से भारत-बांग्लादेश सीमा की ओर भेज दिया गया. दो हफ्ते बीतने के बाद भी कई परिवारों को यह नहीं पता कि उनके परिजन कहां हैं.;

( Image Source:  Sora AI )
Edited By :  प्रवीण सिंह
Updated On : 5 Jan 2026 10:06 AM IST

आधी रात का वक्त. फोन बजता है. नंबर अनजान. दूसरी तरफ रोती हुई आवाज - “मुझे नहीं पता मैं कहां हूं… शायद ढाका के पास कहीं.” यह आवाज थी अहेदा खातून की - एक मां की, जिसे भारत से निकाल दिया गया, और जिसका परिवार अब सिर्फ एक व्हाट्सऐप कॉल के सहारे उसकी मौजूदगी का अंदाजा लगा पा रहा है.

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इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार असम के नगांव जिले के 15 लोगों में अहेदा खातून भी शामिल थीं, जिन्हें विदेशी न्यायाधिकरण (FT) द्वारा विदेशी घोषित किए जाने के बाद 17 दिसंबर को “देश छोड़ने” का आदेश थमा दिया गया. आदेश साफ था - 24 घंटे के भीतर भारत छोड़ो. लेकिन दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी, इन 15 में से कई लोगों के परिवारों को यह तक नहीं पता कि उनके अपने जिंदा हैं या नहीं, कहां हैं, किस हाल में हैं.

1950 का कानून, 2025 की कार्रवाई

यह पूरी कार्रवाई Immigrants (Expulsion from Assam) Act, 1950 के तहत की गई - एक ऐसा कानून, जो पिछले 70 सालों से निष्क्रिय था, लेकिन पिछले साल असम कैबिनेट ने इसके लिए एक SOP मंजूर कर इसे फिर से लागू कर दिया. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही परिवारों को इस आदेश की जानकारी मिली, वे अदालतों की शरण लेने की कोशिश में जुटे. लेकिन इससे पहले ही 19 दिसंबर को इन सभी 15 लोगों को माटिया ट्रांजिट कैंप (असम का डिटेंशन सेंटर) से निकालकर भारत-बांग्लादेश सीमा की ओर ले जाया गया.

‘दो दिन जंगल में चली, स्टेशन-स्टेशन भटकी’

अहेदा खातून के बेटे आदिलुर ज़मान, जो जुरिया में सब्ज़ी बेचकर परिवार चलाते हैं, बताते हैं - “करीब छह दिन तक हमें नहीं पता था कि अम्मी कहां हैं. फिर एक रात करीब 11:30 बजे उनका व्हाट्सऐप कॉल आया. उन्होंने किसी का फोन उधार लिया था… उन्हें मेरा नंबर याद था.” आदिलुर के मुताबिक, अहेदा खातून ने बताया कि उन्हें रात के अंधेरे में किसी अनजान जगह पर गाड़ी से उतार दिया गया. वहां से दो दिन जंगल जैसे इलाके में पैदल चलीं. कई रातें रेलवे प्लेटफॉर्म पर बिताईं, दिन में ट्रेनों में भटकती रहीं. आखिरकार एक ई-रिक्शा (टॉम-टॉम) चालक ने मदद की, जिसने उन्हें अपने घर में पनाह दी - हालांकि उसका परिवार खुद बेहद गरीब है. आदिलुर ज़मान कहते हैं, “मेरी मां ने कभी अकेले नगांव तक सफर नहीं किया था. आज वह किस देश, किस गांव में हैं - यह तक साफ नहीं.”

बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश का वीडियो कॉल

एक और परिवार को एकमात्र सुराग वीडियो कॉल के जरिए मिला. नगांव के ही हुसैन अली को भी इन्हीं 15 लोगों में शामिल कर निकाला गया था. उनके पड़ोसी मुस्तफा अली बताते हैं, “हुसैन की पत्नी को एक अनजान नंबर से वीडियो कॉल आया. कॉल करने वालों ने कहा कि वे Border Guard Bangladesh से हैं.” वीडियो में हुसैन अली दिखे. बताया गया कि वे बांग्लादेश के फुलटोला इलाके में रेलवे लाइन के पास अकेले मिले. स्थानीय लोगों ने उन्हें रेलवे पुलिस को सौंप दिया. परिवार को हुसैन से बात तक नहीं करने दी गई. यह अब तक की इकलौती सूचना है.

किसी को अब तक कोई खबर नहीं

रातुर रहमान के पिता नजरुल इस्लाम को 2018 में विदेशी घोषित किया गया था. उनका मामला अभी भी गुवाहाटी हाईकोर्ट में लंबित है, अगली सुनवाई 28 जनवरी को है. रहमान कहते हैं, “हमारे वकील ने कहा है कि कोर्ट में ही पता करने की कोशिश करेंगे कि वे कहां हैं.”

सुप्रीम कोर्ट भी बंद, परिवार इंतज़ार में

अहेदा खातून की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे वकील अदील अहमद कहते हैं, “मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. कोर्ट के विंटर ब्रेक के बाद 5 जनवरी को इसे अर्जेंट लिस्टिंग के लिए अनुमति मिली है.”

हिमंता सरकार का साफ संदेश: कानूनी रास्ते बायपास होंगे

इस पूरे मुद्दे पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने साफ कहा है कि FT द्वारा विदेशी घोषित व्यक्ति को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाने का मौका देने से पहले 1950 के कानून के तहत एक हफ्ते में ही बाहर निकाला जाएगा. सरमा के मुताबिक, इस प्रक्रिया से भारत-बांग्लादेश के बीच किसी औपचारिक संधि की जरूरत नहीं, बिना सत्यापन सीधे ‘पुश बैक’ किया जा सकता है. सीएम सरमा कहते हैं, “हम 10,000 से 50,000 तक विदेशियों को निकाल सकते हैं. पिछले पांच साल में अगर अतिक्रमण हटाना हमारी पहचान था, तो अगले पांच साल में विदेशियों को निकालना हमारी पहचान होगी.”

कानून क्या कहता है, हकीकत क्या है?

कानूनी रूप से FT के फैसले को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है वहीं औपचारिक डिपोर्टेशन के लिए दूसरे देश की सहमति जरूरी होती है. लेकिन हकीकत यह है कि वर्षों से डिपोर्टेशन की प्रक्रिया अटकी रही है और अब ‘पुश बैक’ के जरिए लोगों को चुपचाप सीमा पार कराया जा रहा है.

यह सिर्फ कानून और राजनीति की कहानी नहीं है. यह उन परिवारों की कहानी है, जो आधी रात की एक कॉल, एक वीडियो झलक, या पूरी चुप्पी के भरोसे अपने अपनों के जिंदा होने का सबूत ढूंढ रहे हैं.

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