Kisse Netaon Ke: ‘Bodefa’ की कहानी क्या है? कैसे Upendranath Brahma ने बदली Assam की सियासत
जानें Upendranath Brahma की ‘Bodofa’ बनने की कहानी और कैसे बोडोलैंड असम की राजनीति में किंगमेकर बना. पहचान, आंदोलन और सत्ता का पूरा विश्लेषण.
असम की राजनीति में आज अगर कोई क्षेत्र “किंगमेकर” की भूमिका निभाता है, तो वह है Bodoland Territorial Region. लेकिन इस ताकत की कहानी अचानक नहीं बनी. इसके पीछे एक ऐसा आंदोलन है, जिसे दिशा दी एक साधारण युवक ने, जिसे आज पूरा बोडो समाज “Bodofa” यानी फादर आफ बोड़ोलैंड के रूप में सम्मान देता है. उस शख्स का नाम है उपेंद्रनाथ ब्रह्मा. असम विधानसभा चुनाव तैयारियों के बीच जानते हैं उन्हीं की कहानी.
The Politics of Identity in Assam के लेखक Udayon Misra ने अपनी किताब में उपेंद्रनाथ ब्रह्मा के बारे में विस्तार से जिक्र किया है. इसके अलावे भी कई पुस्तक हैं, जिनमें उनके बारे में जिक्र है. यह किताब असम की राजनीति में पहचान (identity) आधारित आंदोलनों, जैसे असम आंदोलन, बोडो आंदोलन को गहराई से समझाती है और क्षेत्रीय सियासत के बदलते स्वरूप का विश्लेषण करती है.
असम के किस इलाके में हुआ था ब्रह्मा का जन्म?
दरअसल, उपेंद्रनाथ ब्रह्मा (Upendranath Brhma) का जन्म 31 मार्च 1956 को असम के Kokrajhar क्षेत्र में हुआ था. वे एक साधारण किसान परिवार से आते थे. उनका बचपन ग्रामीण Bodo समाज की समस्याओं जैसे गरीबी, शिक्षा की कमी और राजनीतिक उपेक्षा के बीच बीता. बचपन से ही उनके मन में एक असाधारण सवाल था: “हमारी भाषा और हमारी पहचान को सम्मान क्यों नहीं मिलता?” गांव के स्कूल में बैठकर उठे ये सवाल धीरे-धीरे उनके जीवन का मकसद बन गया.
पढ़ाई के लिए जब वह गांव से बाहर निकले, तो दुनिया को नए नजरिए से देखा. उसने महसूस किया कि जिन समुदायों की अपनी मजबूत पहचान और राजनीतिक आवाज है, वही आगे बढ़ते हैं. इसी एहसास ने उसके भीतर एक संकल्प पैदा किया, अगर बोडो समाज को बचाना है, तो उसे संगठित करना होगा. यह विचार ही आगे चलकर उसके संघर्ष की नींव बना.
उन्होंने, गांव लौटने पर उसने अपने समाज की हकीकत को और करीब से देखा.गरीबी, अशिक्षा और राजनीतिक उपेक्षा. इस स्थिति ने उन्हें कम उम्र में ही झकझोर दिया. स्कूली शिक्षा के बाद उपेंद्र नाथ सिर्फ सवाल पूछने वाला लड़का नहीं रहे, बल्कि कॉलेज पहुंचने तक, जवाब खोजने वाला एक नेता बन चुके थे. इसी दौरान वह All Bodo Students Union से जुड़ा और यहीं से उसके आंदोलन को दिशा मिली. उसने इस संगठन को सिर्फ छात्र राजनीति तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक मिशन में बदल दिया.
क्या थी उपेंद्रनाथ की सोच?
उसकी सोच साफ थी, “संघर्ष का रास्ता हिंसा नहीं, संगठन और शिक्षा है.” वह गांव-गांव घूमते, लोगों से बात करते, युवाओं को जोड़ते और उन्हें अपनी पहचान के महत्व को समझाते. शुरुआत में लोग डरते थे कि यह आंदोलन टकराव पैदा करेगा, लेकिन उपेंद्र ने सभी को भरोसा दिलाया कि यह लड़ाई अधिकार और सम्मान की है, टकराव की नहीं.
1980 के दशक में जब असम कई आंदोलनों और अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था, तब बोडो समाज की मांग, अपनी अलग पहचान और राजनीतिक अधिकार तेज हो गई. इस कठिन समय में उपेंद्रनाथ ब्रह्मा का नेतृत्व और मजबूत होकर उभरा. राजनीतिक दबाव, सामाजिक विरोध और अस्थिर माहौल के बावजूद उन्होंने अपने आंदोलन को हिंसा से दूर रखा. उनका मानना था कि अगर संघर्ष अपनी मूल पहचान खो देगा, तो उसका उद्देश्य भी खत्म हो जाएगा.
4 मई 1990 को जब उनका अचानक निधन हुआ, तो पूरा बोडो समाज जैसे टूट गया. लेकिन यह उनका अंत नहीं था. यहीं से एक नए युग की शुरुआत हुई. उनकी मृत्यु के बाद उनका विचार और भी ताकतवर बन गया. लोग कहने लगे कि उपेंद्रनाथ ब्रह्मा को कहने लगे. लोग में इस धारणा को बल मिला कि “Bodofa कभी नहीं मरते,” क्योंकि वह अब एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार बन चुके थे.
कैसे बन गए Bodofa?
उन्हें “Bodofa” यानी बोडोलैंड का फादर इसलिए कहा गया, क्योंकि उन्होंने सिर्फ नेतृत्व नहीं किया, बल्कि एक बिखरे हुए समाज को दिशा दी, उसे संगठित किया और उसे अपनी पहचान के लिए खड़ा होना सिखाया. विद्वान Sanjib Baruah भी मानते हैं कि उनका आंदोलन केवल एक जातीय संघर्ष नहीं था, बल्कि एक “identity awakening” था, जहां एक समुदाय ने खुद को पहचानते हुए राजनीतिक शक्ति में बदल दिया. “Bodofa” यानी “पिता” यह कोई सरकारी खिताब नहीं था. यह उस भरोसे का नाम था, जो जनता ने उन्हें दिया.
आज भी उनकी कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा है, एक ऐसे युवक की कहानी, जिसने सवाल पूछने से शुरुआत की और एक पूरे समाज की आवाज़ बन गया. यही कारण है कि Upendranath Brahma आज भी सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि बोडो समाज के “Bodofa” के रूप में जिंदा हैं.
Brahma के बाद आंदोलन रुका नहीं, बल्कि आगे बढ़ता गया. उन्होंने बोडोलैंड इलाके में जो चेतना पैदा की, उसके दम पर बोडोलैंड मांग को लेकर आंदोलन दशकों तक चलता रहा. इसका नतीजा यह निकला कि 1993 केंद्र सरकार ने बोडोलैंड स्वायत्त परिषद का गठन किया. वहीं 2003 Bodoland Territorial Council बना और अब Bodoland Territorial Region के रूप में उसकी पहचान है. इन सबके पीछे एक ही सोच थी, “संगठित पहचान ही सत्ता की चाबी है.” जो लोगों को ब्रह्मा ने दी थी.
असम की राजनीति में आज Bodoland ‘किंगमेकर’ क्यों है?
आज Bodoland Territorial Region असम की राजनीति का निर्णायक केंद्र बन चुका है. 15 से 20 विधानसभा सीटों सीटों पर सीधा असर है. गठबंधन राजनीति में बीटीसी की अहम भूमिका. ऐसी स्थिति में बीटीसी सरकार बनाने या गिराने की ताकत बनकर उभरता है. असम में अब कोई भी पार्टी Bodoland को नजरअंदाज करके सत्ता तक नहीं पहुंच सकती.
Brahma की असली विरासत क्या?
Upendranath Brahma ने सिर्फ आंदोलन नहीं किया, उन्होंने एक मॉडल दिया. अपनी पहचान को ताकत बनाओ. समाज को संगठित करो. लोकतांत्रिक दबाव बनाओ और यही मॉडल आज भी Bodoland को मजबूत बनाए हुए है.
आखिर यह कहानी क्या कहती है?
यह सिर्फ एक नेता की कहानी नहीं है. यह एक पूरी राजनीतिक चेतना की कहानी है. एक बिखरे समाज की एक मजबूत पहचान बनने की और उस पहचान के सत्ता तक पहुंचने की कहानी है. आज Bodoland का “किंगमेकर” बनना इस बात का सबूत है कि Brahma का विचार एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक स्थायी राजनीतिक क्रांति था.
एक साल पहले दिल्ली नगर निगम (MCD) ने दक्षिण दिल्ली में लाला लाजपत राय मार्ग के एक हिस्से (कैलाश कॉलोनी मेट्रो स्टेशन के पास) का नाम बदलकर 'बोडोफा उपेंद्रनाथ ब्रह्मा मार्ग' रखा. यहां पर उनकी एक प्रतिमा का अनावरण केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया था.
असम की राजनीति में बोडोलैंड अहम क्यों?
BTR क्षेत्र सीधे तौर पर 12 विधानसभा सीटों को प्रभावित करता है. ये सीटें कोकराझार, चिरांग, बक्सा और उदालगुड़ी जिलों में फैली हुई हैं. इस पूरे क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 30 से 35 लाख (3–3.5 मिलियन) के बीच मानी जाती है. यहां का वोटिंग पैटर्न अक्सर गठबंधन की दिशा तय करता है. यही वजह है कि BTR को “किंगमेकर” कहा जाता है