Asian Games 2026: जापान में चल रहे एशियन गेम्स 2026 में 30 सितंबर का दिन भारतीय तीरंदाजों के लिए खास रहा. क्योंकि भारतीय तीरंदाजी टीमों ने 2 गोल्ड मेडल जीते. जिसमें चिकिता तनिपार्थी ने साहिल जाधव की जोड़ी भी शामिल है, जिन्होंने कंपाउंड मिक्स्ड आर्चरी इवेंट में शानदार प्रदर्शन करते हुए दिन का दूसरा गोल्ड मेडल भारत को दिलाया.

अब एशियन गेम्स 2026 में भारत के पास कुल 8 गोल्ड मेडल हो गए हैं. चिकिता और साहिल की जोड़ी ने इस इवेंट में साउथ कोरिया को हराकर ये कारनामा किया है. इस जोड़ी ने कुल 1414 अंक हासिल किए, जो कि एक नया एशियन गेम्स रिकॉर्ड है. अब हर कोई जानना चाहता है कि आखिर चिकिता और साहिल की जोड़ी कैसे बनी? क्यों चिकिता तेलंगाना की रहने वाली हैं, जबकि साहिल महाराष्ट्र के.

कैसे बनी चिकिता और साहिल की जोड़ी?

चिकिता तनिपार्थी और साहिल जाधव को कंपाउंड मिक्स्ड टीम के लिए उनके प्रदर्शन और राष्ट्रीय स्तर पर फॉर्म के आधार पर चुना गया. कंपाउंड तीरंदाजी में मिक्स्ड टीम में एक पुरुष और एक महिला खिलाड़ी शामिल होते हैं. दोनों ही भारत के शीर्ष कंपाउंड तीरंदाजों में शामिल हैं और एशियन गेम्स में पहले भी अपनी क्षमता दिखा चुके थे.

एशियन गेम्स में दोनों ने शुरुआत से ही शानदार तालमेल दिखाया. टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल में भारतीय जोड़ी ने कजाकिस्तान को 159-154 से हराया था. इसके बाद फाइनल में साउथ कोरिया के खिलाफ मुकाबला शूटऑफ तक पहुंचा, जहां भारत ने दबाव में बेहतर प्रदर्शन करते हुए गोल्ड अपने नाम किया.

कैसी है साहिल के संघर्ष की कहानी?

महाराष्ट्र के साहिल राजेश जाधव की कहानी भी संघर्ष से भरी है. उन्होंने 2016 में अपने एक पड़ोसी को तीरंदाजी करते देखकर इस खेल की शुरुआत की थी. शुरुआत में आर्थिक परेशानियां उनके रास्ते में बड़ी चुनौती थीं. हालात इतने मुश्किल हो गए थे कि 2022 में साहिल ने तीरंदाजी छोड़ने का मन बना लिया था लेकिन परिवार ने उनका साथ नहीं छोड़ा.

साहिल की मां ने उनके लिए बेहतर कंपाउंड धनुष खरीदने के लिए अपने गहने तक बेच दिए. परिवार के इस त्याग ने साहिल को दोबारा पूरी ताकत से खेल में लौटने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद साहिल ने कोलकाता स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) केंद्र में ट्रेनिंग जारी रखी और धीरे-धीरे भारतीय कंपाउंड तीरंदाजी टीम का अहम हिस्सा बन गए.

कैसी है चिकिता के संघर्ष की कहानी?

चिकिता तनिपार्थी की कहानी सिर्फ तीरंदाजी में जीत की नहीं, बल्कि परिवार के त्याग और लगातार मेहनत की भी है. तेलंगाना के किसान परिवार से आने वाली चिकिता को उनके पिता ने बचपन से ही इस खेल के लिए प्रोत्साहित किया. उनकी ट्रेनिंग का खर्च जुटाना आसान नहीं था, लेकिन बेटी के सपने के लिए पिता ने अपनी धान काटने की मशीन तक बेच दी थी.

चिकिता ने 2018 में आधिकारिक तौर पर तीरंदाजी शुरू की और इसके बाद लगातार अपनी पहचान मजबूत की. उनकी मेहनत का बड़ा नतीजा 2025 में देखने को मिला, जब वह वर्ल्ड आर्चरी यूथ चैंपियनशिप के अंडर-21 वर्ग का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं.