Full View

दीपावली से ठीक एक दिन पहले घरों में दीये जलने लगते हैं. गलियां रोशनी से सज जाती हैं और हर तरफ त्योहार की रौनक दिखाई देने लगती है. इस दिन को छोटी दीपावली, नरक चतुर्दशी और रूप चौदस जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस दिन को नरक चतुर्दशी क्यों कहते हैं? इसके पीछे सिर्फ भगवान कृष्ण और नरकासुर की कहानी ही नहीं, बल्कि एक धर्मात्मा राजा से जुड़ी कथा भी है.

कथा के अनुसार, राजा रन्ति देव ने जीवन में कभी जानबूझकर कोई पाप नहीं किया था, लेकिन जब उनकी मृत्यु का समय आया तो यमदूत उन्हें लेने पहुंच गए. राजा हैरान रह गए कि आखिर उनसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया, जिसकी वजह से उन्हें नरक जाना पड़ेगा. तब यमदूतों ने उन्हें बताया कि एक बार उनके द्वार से भूखा ब्राह्मण बिना भोजन किए लौट गया था. बस इसी गलती का दंड उन्हें भुगतना पड़ा. इसके बाद राजा ने ऋषियों से इसका उपाय पूछा और उन्हें नरक से मुक्ति का रास्ता मिला.

क्यों मनाते हैं नरक चतुर्दशी?

हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी मनाई जाती है. इसे छोटी दीपावली इसलिए कहते हैं क्योंकि इस दिन भी दीपावली की तरह घरों में दीये जलाए जाते हैं. मान्यता है कि दीपों की रोशनी अंधकार को दूर करने के साथ जीवन से नकारात्मकता और बुराइयों को खत्म करने का संदेश देती है. इस दिन को नरक चतुर्दशी कहने के पीछे मान्यता है कि पूजा-पाठ और अच्छे कर्मों से इंसान को पापों से मुक्ति मिलती है और नरक के कष्टों से छुटकारा मिलता है. इस पर्व से जुड़ी दो प्रमुख पौराणिक कथाएं भी काफी प्रचलित हैं.

भगवान कृष्ण ने किया था नरकासुर का वध

नरक चतुर्दशी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण और राक्षस नरकासुर की है. मान्यताओं के अनुसार, नरकासुर एक अत्याचारी और क्रूर राक्षस था. उसने अपनी ताकत के घमंड में कई लोगों को परेशान कर रखा था. उसने 16 हजार 100 कन्याओं को बंदी बना लिया था. उसके अत्याचारों से परेशान होकर देवताओं और लोगों ने भगवान कृष्ण से मदद मांगी. इसके बाद भगवान कृष्ण ने नरकासुर के खिलाफ युद्ध किया और उसका अंत कर दिया. उन्होंने नरकासुर की कैद से सभी कन्याओं को आजाद कराया और उन्हें सम्मान दिया. इसी खुशी में लोगों ने अपने घरों में दीपक जलाकर उत्सव मनाया. मान्यता है कि तभी से नरक चतुर्दशी पर दीये जलाने की परंपरा शुरू हुई.

राजा रन्ति देव को क्यों जाना पड़ा था नरक?

इस पर्व से जुड़ी एक दूसरी कथा राजा रन्ति देव की है. कहा जाता है कि वह बेहद धर्मात्मा और पुण्य करने वाले राजा थे. उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी जानबूझकर कोई गलत काम नहीं किया था. लेकिन जब उनकी मृत्यु का समय आया, तो यमदूत उन्हें लेने पहुंच गए. यह देखकर राजा हैरान रह गए. उन्होंने यमदूतों से पूछा कि जब उन्होंने कोई पाप नहीं किया, तो उन्हें नरक क्यों जाना पड़ रहा है? तब यमदूतों ने बताया कि एक बार उनके दरवाजे से भूखा ब्राह्मण बिना भोजन किए लौट गया था. उसी गलती के कारण उन्हें यह फल भुगतना पड़ रहा है.

राजा ने यमदूतों से कुछ और समय देने की विनती की. उन्हें एक साल का समय मिला. इसके बाद राजा ऋषियों के पास पहुंचे और अपनी परेशानी बताई. ऋषियों ने उन्हें कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का व्रत रखने और ब्राह्मणों को भोजन कराने की सलाह दी. साथ ही, उनसे अपने व्यवहार के लिए क्षमा मांगने को कहा. राजा ने ऋषियों की बात मानी और पूरी श्रद्धा से व्रत किया. मान्यता है कि इससे उन्हें अपने पाप से मुक्ति मिली और विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ. तभी से इस दिन व्रत और पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित हुई.

नरक चतुर्दशी पर क्या करना चाहिए?

इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्योदय से पहले शरीर पर तेल लगाकर स्नान करना शुभ माना जाता है. कुछ परंपराओं में पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर स्नान करने का भी विधान बताया गया है.

  • अभ्यंग स्नान: इस दिन सूर्योदय से पहले तेल लगाकर स्नान करने की परंपरा है. इसे अभ्यंग स्नान कहा जाता है. मान्यता है कि इससे शरीर की शुद्धि होती है और रूप-सौंदर्य में वृद्धि होती है.
  • श्रीकृष्ण के दर्शन: स्नान के बाद भगवान कृष्ण और विष्णु जी के मंदिर में दर्शन करने की परंपरा है.
  • यमराज को जल अर्पित करना: इस दिन यमराज के नाम से तर्पण करने और तीन अंजलि जल अर्पित करने का विधान बताया गया है. इसे अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति की कामना से जोड़ा जाता है.
  • दीये जलाना: शाम के समय घर के बाहर और आसपास दीपक जलाए जाते हैं. मान्यता है कि इससे नकारात्मकता दूर होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है.
  • दान-पुण्य करना: इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराना और दान देना भी शुभ माना जाता है.