भारत में क्यों बढ़ रही है C-Section डिलीवरी? सरकारी अस्पतालों से ज्यादा प्राइवेट अस्पताल में माएं दे रही हैं बच्चों को जन्म

भारत में सिजेरियन डिलीवरी को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 2016–2021 के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में C-Section की दर घट रही है, जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यह लगातार बढ़ रही है. 2021 तक प्राइवेट अस्पतालों में लगभग आधे प्रसव सिजेरियन से हुए.;

( Image Source:  AI Grok )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 13 Jan 2026 4:16 PM IST

भारत में बच्चे के जन्म के तरीके में एक अजीब तरह का अंतर दिख रहा है, खासकर सिजेरियन डिलीवरी (सी-सेक्शन) के मामले में. हाल ही में एक बड़े नेशनल स्टडी में पता चला है कि सरकारी अस्पतालों में सी-सेक्शन की संख्या थोड़ी कम हो रही है, जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यह लगातार बढ़ रही है.यह अध्ययन राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के 2016 से 2021 तक के आंकड़ों पर आधारित है और इसे PLOS ग्लोबल पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो सरकारी अस्पतालों में 2016 में सी-सेक्शन से होने वाले प्रसव 15.5% थे, जो 2021 में घटकर 14.3% हो गए यानी थोड़ी कमी आई है. प्राइवेट अस्पतालों में 2016 में यह दर 45.4% थी, जो 2021 में बढ़कर 47.5% हो गई यानी लगभग आधे प्रसव अब सर्जरी से हो रहे हैं. यह अंतर बहुत साफ दिखता है. सरकारी जगहों पर डॉक्टर जरूरत के अनुसार ही सी-सेक्शन करते हैं, इसलिए दर कम या स्थिर रहती है. लेकिन प्राइवेट अस्पतालों में कई कारणों से यह ज्यादा हो रहा है, जैसे मरीजों की सुविधा, शुभ मुहूर्त में बच्चा पैदा करने की इच्छा, कम तनाव वाली डिलीवरी की मांग, या कभी-कभी आर्थिक कारण भी. 

कुछ जगहों पर बहुत ज्यादा सी-सेक्शन

कुछ जिलों में स्थिति बहुत चिंताजनक है. पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद और नादिया जिलों के प्राइवेट अस्पतालों में 10 में से 9 से ज्यादा (90% से अधिक) बच्चे सी-सेक्शन से पैदा हो रहे हैं. यह भारत में अब तक की सबसे ज्यादा दर है. तेलंगाना के करीमनगर जिले में प्राइवेट अस्पतालों में 91% से ज्यादा प्रसव सिजेरियन से होते हैं. दक्षिण भारत के कई राज्य जैसे तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में लगभग सभी जिले उच्च दर वाले हैं. वहीं, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकारी अस्पतालों में सी-सेक्शन बहुत कम होते हैं. राजस्थान में प्राइवेट अस्पतालों में भी यह दर सबसे कम रही है. 

राज्य स्तर पर सबसे ज्यादा फर्क

अध्ययन बताता है कि सी-सेक्शन की दर में सबसे बड़ा अंतर राज्यों के बीच है, न कि जिले या गांव के स्तर पर यानी एक महिला कहां रहती है (किस राज्य में), यह फैसला करने में सबसे ज्यादा असर डालता है कि उसका प्रसव सामान्य होगा या सिजेरियन से. समय के साथ यह अंतर और बढ़ गया है. प्राइवेट अस्पतालों में राज्य-स्तरीय फर्क 2016 में 69% से बढ़कर 2021 में 78% हो गया. वहीं सरकारी अस्पतालों में भी यह थोड़ा बढ़ा है, तेलंगाना और जम्मू-कश्मीर में दोनों तरह के अस्पतालों में सी-सेक्शन की दर सबसे ज्यादा रही है.  तेलंगाना में प्राइवेट अस्पतालों में 2021 तक यह 80% से ऊपर पहुंच गई थी.

क्यों हो रहा है यह सब?

-अध्ययन के मुताबिक, प्राइवेट अस्पतालों में बढ़ोतरी के कई कारण हैं:

-महिलाएं कम दर्द और प्लान्ड डिलीवरी चाहती हैं

-शुभ समय पर बच्चा होने की इच्छा

-प्राइवेट अस्पतालों में बेहतर सुविधाएं होने का भरोसा

-आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से बीमा कवरेज बढ़ने से ज्यादा सर्जरी हो रही हैं

-कभी-कभी डॉक्टरों की ओर से भी जरूरत से ज्यादा सर्जरी करने की प्रवृत्ति

खतरे क्या हैं?

-जरूरत से ज्यादा सी-सेक्शन कई समस्याएं पैदा कर सकता है:

-मां को सर्जरी के बाद संक्रमण, ज्यादा खून बहना, लंबे समय तक ठीक होने में दिक्कत

-भविष्य की गर्भावस्थाओं में खतरा बढ़ना

-बच्चे के स्वास्थ्य पर असर, जैसे इम्यूनिटी कमजोर होना

-परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ना, क्योंकि प्राइवेट में यह बहुत महंगा पड़ता है

क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्राइवेट अस्पतालों पर सख्त निगरानी और नियम बनाए जाएं. सभी जगह एक जैसे मानक (प्रोटोकॉल) लागू हो. सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं को बढ़ाया जाए. सी-सेक्शन सिर्फ तब हो जब सच में मेडिकल जरूरत हो. यह अध्ययन बताता है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता बहुत ज्यादा है. दक्षिण के राज्य आगे हैं, लेकिन वहां भी प्राइवेट में ज्यादा सर्जरी हो रही है. समय रहते कदम उठाए जाएं तो मां और बच्चे दोनों की सुरक्षा बेहतर हो सकती है. 

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