मंगलसूत्र का असली इतिहास: पीले धागे से सोने की चेन तक, जानिए कहां से शुरू हुआ ये ट्रेंड
मंगलसूत्र सिर्फ एक गहना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में सुहाग और सुरक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक है. जानिए वैदिक काल के साधारण धागे से लेकर आज के सोने और काले मोती वाले मंगलसूत्र तक की पूरी कहानी.
भारतीय समाज में मंगलसूत्र विवाहित भारतीय महिला की सबसे खास पहचान और उसका अत्यंत पवित्र आभूषण माना जाता है. मंगलसूत्र को ठीक उसी तरह की पवित्रता और मान्यता प्राप्त है, जैसी मान्यता सिंदूर को प्राप्त है. विवाह के शुभ अवसर पर पति अपनी पत्नी को मंगलसूत्र पहनाता है और वह स्त्री आजीवन इसे धारण करती है जब तक उसका पति जीवित रहता है. इसे उतारना अशुभ माना जाता है. यह न केवल सुहाग का प्रतीक है, बल्कि पति-पत्नी के अटूट बंधन, सुरक्षा, प्रेम और घरेलू सुख-समृद्धि का भी प्रतीक है.
मंगलसूत्र पहनने की परंपरा प्राचीन वैदिक काल से चली आ रही है, जो आज भी पूरे भारत में विवाहित महिलाओं की शादीशुदा स्थिति की स्पष्ट पहचान बनकर उभरती है. लेकिन इससे भी ज्यादा मंगलसूत्र का इतिहास मायने रखता है कि आखिर इसकी शुरुआत कहां से हुई. मंगलसूत्र जो आज के समय में काली मोती और सोने के पेंडेंट का पहना जाता है. लेकिन सालों पहले सोने का मंगलसूत्र पहनने का कोई चलन नहीं था. वह बिना सोने और साज सजावट के पीले धागे का मंगलसूत्र माना जाता था.
वैदिक काल की जड़ें: सिर्फ एक धागा, कोई सोना नहीं
कहानी की शुरुआत वैदिक काल से होती है, लगभग 1500 ईसा पूर्व से भी पहले. उस समय मंगलसूत्र का मतलब था 'मंगल' (शुभ) + 'सूत्र' (धागा) यानी शुभ धागा. प्राचीन हिंदू ग्रंथों में जैसे मनुस्मृति और ललिता सहस्रनाम में इसका जिक्र मिलता है. दुल्हन को गले में एक पीला धागा बांधा जाता था जिसे हल्दी में भिगोकर तैयार किया जाता था. हल्दी को शुद्धि और रोग-निवारक माना जाता था खासकर प्रसव के समय. यह धागा बुरी शक्तियों, नजर और अन्य पुरुषों से सुरक्षा का प्रतीक था. कोई सोना, कोई मोती नहीं बस एक सादा, पवित्र सूत. पुरातात्विक सबूत भी इसकी पुष्टि करते हैं. मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में ऐसे ही नेकलेस के अवशेष मिले हैं, जो कोरग (दक्षिण भारत) के मंगलसूत्र से मिलते-जुलते हैं. लेकिन असली ट्रेंड की नींव दक्षिण भारत में पड़ी. ललिता सहस्रनाम में जिक्र है देवी त्रिपुरसुंदरी के मंगलसूत्र धारण करने का वर्णन करता है. इसका अर्थ है कि देवी के गले में भगवान कामेश्वर (शिव) द्वारा स्वयं बांधा गया था.
कहां से हुआ सोने का मंगलसूत्र का असली ट्रेंड?
भारत में सोने के मंगलसूत्र पहनने का ट्रेंड सबसे पहले दक्षिण भारत से शुरू हुआ. खासकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से. यहां इसे 'थाली' या 'थिरुमंगलयम' कहते हैं. संग्राम साहित्य 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व और 6वीं शताब्दी के ग्रंथों में इसका स्पष्ट उल्लेख है- एक पीला धागा, जिसमें सोने का छोटा पेंडेंट जैसे लक्ष्मी या राधा की मूर्ति जोड़ा जाता था. दक्षिण भारतीय शादियों में दूल्हा थाली को मंत्र पढ़कर गले में बांधता है, और यह पीला धागा धीरे-धीरे सोने की चेन में बदल गया. क्योंकि यहां की संस्कृति में विवाह को 'मंगल' का सबसे पवित्र रूप माना जाता था. अरब व्यापार के दौरान 6वीं शताब्दी के बाद काले मोतियों का इस्तेमाल शुरू हुआ. ये मोती 'नजर' से बचाने के लिए जोड़े गए काला रंग बुरी नजर का प्रतीक था फिर सोना आया. दक्षिण भारत की महिलाएं पहले से ही सोने के गहनों की शौकीन थी तो धागे की जगह सोने की चेन और पेंडेंट का चलन बढ़ा. आज भी तमिल थाली में सोने के सिक्के, छोटे-छोटे पेंडेंट और कभी-कभी मूंगा देखने को मिलता है.
उत्तर और पश्चिम भारत में फैलाव
धीरे-धीरे यह ट्रेंड उत्तर और पश्चिम की ओर बढ़ा. उत्तर भारत में मंगलसूत्र को 'मंगलसूत्र' ही कहा जाता है. काले मोतियों की माला के साथ सोने का पेंडेंट और चेन. यह रूप लगभग 100-150 साल पहले (19वीं-20वीं शताब्दी) लोकप्रिय हुआ, जब ब्रिटिश काल में सोने का व्यापार बढ़ा और महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधरी. पश्चिम भारत महाराष्ट्र, गुजरात में भी 'थाली' और 'मंगलसूत्र' का मिश्रण देखा जाता है. बंगाल में मूंगा और सोने का कॉम्बिनेशन, जबकि राजस्थान-उत्तर प्रदेश में सरल, क्लासिक डिजाइन. लेकिन मूल ट्रेंड दक्षिण से ही आया जहां से सोने का इस्तेमाल सबसे पहले बड़े पैमाने पर शुरू हुआ. 20वीं शताब्दी के मध्य तक यह पूरे भारत में फैल चुका था. आज हर हिंदू शादी में मंगलसूत्र बांधना अनिवार्य है चाहे वह दिल्ली हो, मुंबई, चेन्नई या कोलकाता.
सिर्फ गहना नहीं, जीवन का रक्षा कवच
सोने का मंगलसूत्र पहनने का ट्रेंड सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि गहरी मान्यता पर टिका है. ज्योतिषियों के अनुसार, इसमें कई देवी-देवताओं का वास होता है लक्ष्मी, पार्वती, शिव. यह पति-पत्नी के अटूट बंधन, प्रजनन क्षमता और घर की खुशहाली का प्रतीक है. पत्नी इसे जीवन भर नहीं उतारती उतारने का मतलब अशुभ माना जाता है. आज के समय में डिजाइन बदले हैं कुछ महिलाएं लाइटवेट गोल्ड मंगलसूत्र चुनती हैं, कुछ में डायमंड जोड़ती हैं. लेकिन मूल भाव वही है, जो दक्षिण भारत के प्राचीन थाली से चला आ रहा है.