कई लोग सुबह उठते ही मोबाइल देखने लगते हैं, तो कुछ लोग दिन की शुरुआत चाय या कॉफी के साथ करते हैं. लेकिन एक्ट्रेस सामांथा रूथ प्रभु की सुबह की शुरुआत थोड़ी अलग होती है. वह दिन की शुरुआत अपने जिंदगी में मौजूद अच्छी चीजों को याद करके करती हैं. इसके लिए वह ग्रैटीट्यूड जर्नल लिखती हैं. 

सामांथा के मुताबिक, इस छोटी-सी आदत ने मुश्किल समय में उनके सोचने का तरीका बदलने में मदद की. दरअसल ग्रैटीट्यूड जर्नल में वह चीजें लिखी जाती हैं, जिसके लिए व्यक्ति आभारी महसूस करता है. इसे रोजाना लिखने से स्ट्रेस कम होता है और इमोशन्स को समझने में मदद मिलती है. 

सामांथा सुबह करती हैं ये काम

सामांथा ने अपने हेल्दी पीरियड-केयर ब्रांड ZOY के एक इवेंट में अपने सुबह के रूटीन के बारे में बात की. उन्होंने बताया कि वह सुबह उठने के बाद 45 मिनट ग्रैटीट्यूड जर्नल लिखने के साथ-साथ अलावा धूप में बैठने और मेडिटेशन करने में बिताती हैं. एक्ट्रेस ने कहा कि वह चाहे कहीं भी हों या कितनी भी बिजी क्यों न हों, ग्रैटीट्यूड जर्नल जरूर लिखती हैं. सामांथा ने बताया कि जब वह अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही थीं, तब उन्हें ग्रैटीट्यूड जर्नल लिखने की सलाह मिली थी.

कैसे ग्रैटीट्यूड जर्नल ने बदली सामांथा की जिंदगी?

शुरुआत में सामांथा के लिए डायरी में अच्छी बातें लिखना आसान नहीं था, क्योंकि उस समय वह खुद भी अच्छा महसूस नहीं कर रही थीं. लेकिन धीरे-धीरे उनकी सोच बदलने लगी. सामांथा के मुताबिक, पूरी तरह ठीक महसूस करने से पहले ही उन्हें मेंटली बेहतर लगने लगा था.

क्या होता है ग्रैटीट्यूड जर्नल?

ग्रैटीट्यूड जर्नल एक ऐसी डायरी है, जिसमें इंसान अपनी जिंदगी की उन चीजों को लिखता है, जिनके लिए वह आभारी महसूस करता है. इसमें किसी अपने का साथ, परिवार का प्यार, दोस्तों की मदद, प्रकृति, अच्छी यादें या दिनभर में मिली कोई छोटी खुशी शामिल हो सकती है. इसे लिखने के लिए किसी खास डायरी या महंगे सामान की जरूरत नहीं होती. आप एक नॉर्मल नोटबुक में रोज कुछ मिनट निकालकर ऐसी तीन से पांच बातें लिख सकते हैं, जिनके लिए आप शुक्रगुजार हैं. चाहें तो यह भी लिखें कि वे बातें आपके लिए क्यों मायने रखती हैं.

ग्रैटीट्यूड जर्नल लिखने के क्या फायदे हैं?

  • रोज अच्छी बातों पर ध्यान देने से जिंदगी के उन पहलुओं को पहचानने में मदद मिल सकती है, जिन्हें हम परेशानियों के बीच नजरअंदाज कर देते हैं.
  • ग्रैटीट्यूड से जुड़ी एक्टिविटीज पर हुए कुछ शोध में लोगों के महसूस किए गए तनाव में कमी के साइन मिले हैं. हालांकि, इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता है.
  • जब हम दूसरों की मदद और साथ की अहमियत समझते हैं, तो उनके प्रति आभार जताना आसान हो सकता है. इससे रिश्तों में अपनापन बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
  • अपनी जिंदगी की अच्छी बातों को याद करना भावनाओं को समझने और मन को संभालने में मदद कर सकता है. हालांकि, यह किसी मेंटल हेल्थ समस्या का इलाज नहीं है.

कैसे काम करती है यह आदत?

जब इंसान रोज कुछ समय निकालकर अपने जीवन की अच्छी बातों पर ध्यान देता है, तो उसका ध्यान केवल परेशानियों तक सीमित नहीं रहता. वह मुश्किलों के साथ-साथ उन चीजों को भी देखना सीख सकता है, जो उसे सहारा देती हैं. नियमित अभ्यास से यह नजरिया धीरे-धीरे मजबूत हो सकता है.

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि आपको हर हाल में खुश रहने या अपनी परेशानी को नजरअंदाज करने की जरूरत है. अगर किसी दिन कुछ भी अच्छा लिखने का मन न हो, तो अपनी भावनाओं को ईमानदारी से लिखना भी ठीक है. सामांथा का अनुभव बताता है कि छोटी-सी आदत भी सोचने का नजरिया बदलने की शुरुआत बन सकती है.