देवदासी प्रथा से लेकर कुप्रथा तक, कैसे कुंवारी लड़कियां होने लगी यौन शोषण का शिकार?

देवदासी परंपरा में कुंवारी लड़कियों की शादी देवताओं से कराई जाती है. फिर पुरोहित और ऊंची जाति के लोग उनसे संबंध बनाते हैं. इनके बच्चों के पिता का नाम नहीं होता है जिसके बाद ये मजबूरन ये वेश्यावृत्ति और भीख मांगकर जिंदगी जीती हैं. हालांकि स्टेट मिरर हिंदी इस दावे की पुष्टि नहीं करता है.

Curated By :  सागर द्विवेदी
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21वीं सदी के भारत में जब हम डिजिटल प्रगति, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की बात करते हैं, तब दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों से आने वाली कहानियां हमें झकझोर देती हैं. इस कड़ी में आज एक ऐसी प्रथा के बारे में बात करेंगे जिसके बारे में जानकर आपके पैरों के नीचे की जमीन खिसक जाएगी. इस प्रथा का नाम है देवदासी प्रथा.

जिसका इतिहास केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि आज भी हजारों महिलाएं इस प्रथा से पीड़ित हैं और बिना बाप के गोद में बच्चा लिए लोगों को खुश रहने की दुआ देती हैं जो कि उनके किस्मत में कभी है ही नहीं और इस प्रथा को शायद सरकार भी भूल चुकी है.

क्या है देवदासी प्रथा?

'देवदासी' शब्द का अर्थ है. देवता की दासी.. यानी देवता की सेवा हेतु खुद को समर्पित कर दें. इस परंपरा के तहत किशोरावस्था की लड़कियों को मंदिर में किसी देवी या देवता को समर्पित कर दिया जाता है. उन्हें प्रतीकात्मक रूप से देवता से विवाह करना होता है, जिसके बाद वे किसी अन्य पुरुष से शादी नहीं कर सकती. शुरुआती दौर में देवदासियां मंदिरों में नृत्य और संगीत के माध्यम से धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा होती थी. उन्हें सम्मानित दर्जा प्राप्त था. लेकिन समय के साथ यह परंपरा सामाजिक और यौन शोषण में बदल गई. मंदिरों से जुड़ी यह परंपरा धीरे-धीरे देह-व्यापार और तस्करी के जाल में उलझती चली गई.

परंपरा के अनुसार ये लड़कियां मंदिरों की देखभाल करती थी और उन्हें समाज में सम्मान दिया जाता था, फिर समय के साथ इन महिलाओं को मंदिर के पुजारियों या शक्तिशाली पुरुषों के यौन शोषण का शिकार होना पड़ा, जिससे यह एक कुप्रथा में बदल गई. वहीं इसकी कानूनी लड़ाई की बात करें तो 1934 में बॉम्बे देवदासी संरक्षण अधिनियम और 1947 में मद्रास देवदासी अधिनियम के माध्यम से इस पर रोक लगाने की शुरुआत हुई, और 1988 में यह पूरी तरह से अवैध हो गई. हालांकि यह प्रथा पूरी तरह से गैरकानूनी है लेकिन आज भी देश के कुछ हिस्सों में इसका अस्तित्व है. आइए जानते हैं देवदासी प्रथा के बारे में...

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, देवदासी परंपरा में कुंवारी लड़कियों की शादी देवताओं से कराई जाती है. फिर पुरोहित और ऊंची जाति के लोग उनसे संबंध बनाते हैं. इनके बच्चों के पिता का नाम नहीं होता है जिसके बाद मजबूरन ये वेश्यावृत्ति और भीख मांगकर जिंदगी जीती हैं.

यह एक ऐसी परंपरा है जहां धर्म के नाम पर बच्चियों को मंदिर में दान कर देवदासी बनाया जाता है. देवदासी प्रथा भले ही गैरकानूनी है, लेकिन आज भी दक्षिण भारत के कई राज्यों में यह प्रथा जारी है. बात करें बेंगलुरु से चार सौ किलोमीटर दूर उत्तरी कर्नाटक के जिला कोप्पल के उकरकेरी गांव की तो जिसे आज भी देवदासियों का गांव भी कहा जाता है. देवदासी प्रथा यानी कि दर्द और पीड़ा की जीती जागती कहानियां... उस श्रापित समुदाय की जिंदा लाशें, जिन्हें सरकार भुला चुकी है.

क्या है इन देवदासी महिलाओं की पहचान?

मणिमाला यानी मंगलसूत्र, हाथ में हरे रंग की चूड़ियां, चांदी के पतले कड़े और पडलगि यानी बांस की टोकरी इनकी पहचान है. देवदासियों का जिक्र पुराणों में मिलता है. चोल वंश और गुप्त काल में भी देवदासी की प्रथा थी. छठी शताब्दी में शुरू हुई इस प्रथा ने नौवीं दसवीं शताब्दी तक भारत में अपनी जड़ जमा ली थी. योन सांग, अल बरूनी, अरब यात्री अबू जैद अल हसन जैसे विदेश यात्रियों ने अपने लेखों में देवदासियों का जिक्र किया है. शुरुआती दौर में देवदासियां मंदिर की देखभाल और गर्भ गृह के बाहर बने मंडपों में नृत्य करती थीं. आगे चलकर यह प्रथा वेश्यावृत्ति में बदल गई.

'प्रेग्नेंट करने वाले लोग दोबारा नहीं दिखाते शक्ल'

इस प्रथा में ऊंची जाति के मर्द हमारे साथ जब तक चाहे शारीरिक संबंध बनाते हैं. एक बार हम प्रेग्नेंट हुए कि दोबारा वो अपनी शक्ल नहीं दिखाते. कहते हैं कि इस प्रथा में हम इस दरिंदगी को शोषण का नाम भी नहीं दे सकते हैं. कहा जाता है कि देवदासी महिलाएं शूद्र होती हैं. ऊंची जाति के लोग संकट आने का डर बताकर दलित परिवार की लड़कियों को देवदासी बनाते रहे हैं.

दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में एक महिला कहती है कि 'मैं और मेरी बेटी दोनों ही देवदासी हैं. इसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है. इसके साथ कौन रहेगा? इसलिए मेरी बेटी देवदासी बना दी गई. कम से कम अपना पेट भरने के लिए जिंदगी तो जी सकेगी. जैसा कि आपको शुरुआत में बताया कि देवदासी लड़कियां जब मां बन जाता है तो इनके साथ संबंध बनाने वाले दोबारा से अपनी शक्ल नहीं दिखाते हैं यानी कि इनके बच्चों को पिता का नाम नहीं मिलता है और इनके बच्चे के सहारे जिंदगी काटते हैं.

कुंवारी लड़कियों को कैसे बनाया जाता है देवदासी?

इस रिपोर्ट के मुताबिक आगे बताया गया कि देवदासी बनने की कोई उम्र नहीं होती है इसके लिए कुछ रीति रिवाज होते हैं. जैसे कि मंदिर में सबसे पहले काला कंबल बिछाकर लड़की को बैठाया जाता है. फिर साड़ी, कंगन और चूड़ी पहनाई जाती है उस लड़की के चारों और बांस की टोकरी यानी पडलगि रखी जाती है. फिर पांच देवदासियां जो पहले से देवदासी हैं वो हुदो-हुदो मंत्र का जाप करते हुए माथे पर आड़ा सिंदूर लगाकर मणिमाला यानी मंगलसूत्र पहनाती हैं. इसके बाद उस लड़की को पांच घरों से भीख मांगकर लानी होती है और फिर वह कुंवारी लड़की देवदासी बन जाती है.

किन राज्यों में देवदासी को क्या कहा जाता है?

ओडिशा में महारि यानी महान नारी.

वहीं कर्नाटक में राजा दासी जोक थी

महाराष्ट्र में मुरली और भाविन.

वहीं स्थानीय देवियां यल्लमा, होलगेम्मा और होसूरमा के नाम पर दलित महिलाओं को देवदासी बनाया जाता है. यह तीनों देवियां बहन हैं, जिनके मंदिरों में आज भी देवदासियां मौजूद हैं.

देशभर में देवदासी की आबादी कितनी?

भास्कर की 2022 की देवदासी की इस रिपोर्ट में बसम्मा कहती है कि वह तीन साल पहले देवदासी बनी है तो बसम्मा की जो बात है वो सरकार के दावों की पूरी तरह से पोल खोल रही है. 1982 में कर्नाटक सरकार ने इस प्रथा को गैरकानूनी बताते हुए पूरी तरह रोक लगा दिया था लेकिन आज भी कर्नाटक में करीब 70 हजार से अधिक देवदासियां हैं जो राज्य सरकार के पर मुंह करारा तमाचा है.

इतना ही नहीं हैरानी की बात ये है कि इन पीड़ित महिलाओं को आज मात्र गुजारा करने के लिए 1500 रुपये की पेंशन मिलती है. अब आज के समय में 1500 रुपए से कैसे गुजारा होता है इस बात का अंदाजा तो हर कोई लगा सकता है. वहीं पूर्णिमा की रात ये देवदासियां देवियों को खुश करने के लिए सालों से मंदिर में पूजा पाठ की रस्में निभाती आ रही हैं, गोद में बिना बाप के बच्चे लिए लोगों को खुश रहने की दुआ देती हैं जो कि इनके जीवन में है ही नहीं.

कर्नाटक की निंगव्वा कनल की कहानी इसी सच्चाई को सामने लाती है. बेहद गरीब परिवार में जन्मी कनल ने बचपन में ही अभाव, भूख और बेबसी का चेहरा देखा. सात साल की उम्र में लिया गया एक निर्णय. देवदासी बनने का. उनकी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर गया. यह फैसला उनका नहीं, हालात का था.

कैसे गरीबी ने छीना कनल का बचपन?

निंगव्वा कनल दस लोगों के परिवार में सबसे छोटी थीं. उन्होंने अपनी बड़ी बहन को वेश्यावृत्ति के जरिए परिवार चलाते देखा. यह उनके लिए सामान्य हो गया था कि पेट भरने के लिए शरीर ही साधन बन जाए.

डीडब्ल्यू से बातचीत में कनल ने कहा कि, 'उन दिनों हमारी स्थिति इतनी ज्यादा खराब थी कि जिस दिन हमारे मां-बाप को काम नहीं मिलता था उस रात हमारे पास खाने के लिए भी कुछ नहीं होता था.' महज सात साल की उम्र में उन्होंने देवदासी बनने का रास्ता चुना. किशोरावस्था में उन्हें मंदिर को समर्पित कर दिया गया. बाद में वे उत्तर प्रदेश के एक इलाके में देह-व्यापार करने लगीं. 18 साल की उम्र तक वे दो बेटियों की मां बन चुकी थीं.

आज 54 वर्ष की हो चुकी कनल अपने अतीत को याद करते हुए कहती हैं कि 'वैसे तो मैं शादियों में परफॉर्म करती थी लेकिन कई बार लोग मुझे जबरन कार में बैठाकर ले जाते थे और मेरे साथ रेप करते थे.' यह बयान सिर्फ एक महिला का अनुभव नहीं, बल्कि उस संरचनात्मक शोषण की कहानी है जिसमें धर्म, जाति और पितृसत्ता एक साथ काम करते हैं.

क्या देवी येल्लम्मा से जुड़ी है इसकी ऐतिहासिक जड़?

इस प्रथा की जड़ें कर्नाटक के सौंदत्ती स्थित देवी येल्लम्मा मंदिर से जोड़ी जाती हैं. शुरुआत में देवदासियों को भगवान और भक्तों के बीच मध्यस्थ माना जाता था. वे नृत्य-संगीत के जरिए पूजा का हिस्सा बनती थीं. उनकी कला ने मंदिर के पुजारियों, अमीरों और उच्च जातियों के पुरुषों को आकर्षित किया. धीरे-धीरे यह संबंध यौन शोषण में बदलता गया. 19वीं शताब्दी तक कुछ देवदासियों की सामाजिक स्थिति ऊंची मानी जाती थी, लेकिन वह सम्मान उनकी स्वतंत्र पहचान का नहीं, बल्कि उनके संरक्षकों की ताकत का परिणाम था.

महिला सशक्तिकरण पर काम करने वाली संस्था संपर्क की संस्थापक डॉ. स्मिता प्रेमचंदर कहती हैं कि 'यह सही है कि समाज में उनकी हैसियत ठीकठाक थी लेकिन ऐसा सिर्फ इसलिए था क्योंकि उनके संरक्षक अमीर और प्रभावशाली लोग थे. उनकी यह हैसियत उनके देवदासी होने के कारण नहीं थी. 'वे आगे कहती हैं कि 'समय के साथ, देवदासियों की यह हैसियत कमजोर पड़ने लगी क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने इस प्रथा को गैरकानूनी बना दिया और देवदासियों को ऐसे लोगों का संरक्षण मिलना बंद हो गया.'

क्या जाति इस प्रथा की जड़ में है?

2015 में संपर्क संस्था द्वारा तैयार रिपोर्ट, जिसे अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के समक्ष प्रस्तुत किया गया, बताती है कि लगभग 85 प्रतिशत देवदासियां दलित समुदाय से आती हैं. महिला अधिकार कार्यकर्ता आशा रमेश कहती हैं कि 'जाति इस प्रथा का अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है. ज्यादातर अनुसूचित जातियों में ही यह प्रथा पाई जाती है.” यह साफ करता है कि देवदासी प्रथा केवल धार्मिक कुरीति नहीं, बल्कि जातिगत शोषण की निरंतरता है. समाज के सबसे कमजोर तबकों की लड़कियां ही इसका सबसे आसान शिकार बनती हैं.

क्या कानून इस प्रथा को रोक पाने में असफल रहा?

कर्नाटक सरकार ने 1982 में कर्नाटक देवदासी (समर्पण का प्रतिषेध) अधिनियम लागू किया. इसके बावजूद 2019 की एक रिपोर्ट में सामने आया कि इस कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आवश्यक नियमों का मसौदा तक तैयार नहीं किया गया था.

बाल संरक्षण से जुड़े कानून जैसे POCSO अधिनियम, 2012 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में देवदासी प्रथा को बाल यौन शोषण के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है. मानव तस्करी कानूनों में भी देवदासियों को विशेष रूप से चिन्हित नहीं किया गया. जब कानूनों में स्पष्टता और कठोरता नहीं होती, तो कुप्रथाएं सामाजिक सहमति और प्रशासनिक ढिलाई के सहारे जीवित रहती हैं.

क्या सरकारी योजनाएं सभी तक पहुंच पाईं?

2008 में कर्नाटक सरकार ने सर्वेक्षण में 46,600 देवदासियों की पहचान की थी. इस सर्वे से कई महिलाओं को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिला. लेकिन हजारों महिलाएं सूची से बाहर रह गईं. महानंदा कनल, जो चर्मरोग से पीड़ित हैं और अपने किशोर बेटे पर निर्भर हैं, कहती हैं कि 'मैंने अपनी बीमारी के कारण कभी भी अपना गांव नहीं छोड़ा और इसीलिए इस सर्वे के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं थी.' डॉ. प्रेमचंदर कहती हैं कि 'देवदासियों की जरूरतों को देखते हुए यह जरूरी हो जाता है कि कोई नया सर्वेक्षण कराया जाए. महिलाएं अभी भी जीवित हैं और उन्हें इसकी बहुत जरूरत है. यह प्रथा भले ही गैरकानूनी कर दी गई हो लेकिन देवदासियां तो अभी भी हैं.'

क्या सम्मान की लड़ाई अब भी जारी है?

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दक्षिण भारत के मंदिरों में जारी इस प्रथा को लेकर राज्यों से जवाब मांगा है. 2022 में स्कूलों में देवदासियों के बच्चों के दाखिले के समय पिता का नाम अनिवार्य न रखने का निर्णय एक सकारात्मक कदम माना गया. विमोचन संघ के संस्थापक बीएल पाटिल कहते हैं 'इस प्रथा में, लड़कियां अक्सर अपनी मां का अनुसरण करते हुए देवदासी बन जाती हैं. इसे रोकने के लिए हम लोगों ने देवदासियों के बच्चों के लिए एक आवासीय विद्यालय शुरू किया है.' यह प्रयास दर्शाते हैं कि बदलाव संभव है, लेकिन लंबी लड़ाई अभी बाकी है.

क्यों खत्म नहीं हो पा रही देवदासी प्रथा?

गरीबी और बेरोजगारी- जब परिवार के पास आय का कोई स्थायी स्रोत नहीं होता, तो बच्चियों को समर्पित करना ‘आर्थिक विकल्प’ बन जाता है. जातिगत संरचना- दलित और हाशिए पर खड़े समुदाय सामाजिक दबाव के कारण विरोध नहीं कर पाते.

  • कानून का कमजोर क्रियान्वयन-अधिनियम तो हैं, लेकिन सख्ती से पालन नहीं.
  • सामाजिक स्वीकृति-कई समुदायों में इसे परंपरा के रूप में स्वीकार किया जाता है.
  • पुनर्वास की कमी-देवदासियों और उनके बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार योजनाओं का अभाव.

क्या सच में खत्म होगी यह कुप्रथा?

देवदासी प्रथा केवल एक धार्मिक कुरीति नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता, आर्थिक अभाव और प्रशासनिक उदासीनता का संयुक्त परिणाम है. कानून बनाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सामाजिक चेतना, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण. जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि किसी भी बच्ची का जीवन देवता के नाम पर बलिदान नहीं किया जा सकता, तब तक यह लड़ाई अधूरी रहेगी. देवदासी प्रथा को खत्म करने के लिए केवल कानून नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज की जरूरत है. जो हर कनल और महानंदा को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दे सके.

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