महात्मा गांधी जिस शिष्य की सबसे अधिक प्रशंसा करते थे, उसी पोट्टी श्रीरामुलु ने 58 दिन तक आमरण अनशन कर एक ऐसा इतिहास रच दिया, जिसने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया. उनके बलिदान के बाद आंध्र राज्य का गठन हुआ और यहीं से भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की शुरुआत हुई. यह सिर्फ एक अनशन की कहानी नहीं, बल्कि उस संकल्प, त्याग और नैतिक शक्ति की गाथा है जिसने आधुनिक भारत के नक्शे को नई दिशा दी.

महात्मा गांधी ने कभी कहा था, "अगर मेरे पास पोट्टी श्रीरामुलु जैसे 11 अनुयायी होते, तो मैं एक साल में देश को आजाद करा लेता." शायद गांधी को भी अंदाजा नहीं था कि उनका यही शिष्य आजाद भारत में ऐसा इतिहास रचेगा, जो सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि पूरे देश का भूगोल बदल देगा. 58 दिनों तक अन्न का एक दाना तक नहीं खाया, हर गुजरते दिन के साथ शरीर टूटता गया, लेकिन इरादा नहीं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, जब उनकी मौत हुई तो सिर्फ एक गांधीवादी कार्यकर्ता की सांसें नहीं थमीं, बल्कि सत्ता की चुप्पी भी टूट गई.

नेहरू सरकार को झुकना पड़ा, अलग आंध्र राज्य का रास्ता खुला और यहीं से भारत में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की शुरुआत हुई, जिसने आज के भारत का नक्शा गढ़ दिया.

क्या इंसान की प्रतिबद्धता देश का नक्शा बदल सकती है?

महात्मा गांधी ने कभी अपने शिष्य पोट्टी श्रीरामुलु के बारे में कहा था, "अगर मेरे पास श्रीरामुलु जैसे 11 और अनुयायी होते, तो मैं एक साल में देश को आज़ाद करा लेता." यह सिर्फ प्रशंसा नहीं थी, बल्कि उस व्यक्ति की तपस्या, अनुशासन और अडिग संकल्प की पहचान थी. शायद गांधी को भी अंदाजा नहीं था कि उनका यही शिष्य आज़ाद भारत में एक ऐसी लड़ाई लड़ेगा, जो किसी सरकार को गिराने के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान को सम्मान दिलाने के लिए होगी. उसने हथियार नहीं उठाया, हिंसा का रास्ता नहीं चुना, बल्कि वही रास्ता अपनाया जिसे गांधी ने सबसे बड़ी नैतिक शक्ति बताया था- उपवास.

58 दिनों तक भोजन का एक दाना तक नहीं खाया और अंततः अपनी जान दे दी. लेकिन उसकी मौत किसी आंदोलन का अंत नहीं बनी, बल्कि भारत के राजनीतिक भूगोल की नई शुरुआत साबित हुई. जिस फैसले को केंद्र सरकार लगातार टाल रही थी, वही फैसला कुछ दिनों बाद लेना पड़ा और भारत में भाषाई आधार पर बनने वाले पहले राज्य आंध्र राज्य का रास्ता खुल गया.

नेहरू क्यों नहीं चाहते थे भाषाई राज्यों का गठन ?

आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा लक्ष्य राष्ट्रीय एकता था. विभाजन का दर्द ताज़ा था, लाखों शरणार्थियों का पुनर्वास चल रहा था, कश्मीर में युद्ध जैसी परिस्थितियाँ थीं और सैकड़ों रियासतों का भारत में विलय भी पूरा नहीं हुआ था. ऐसे समय में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को डर था कि अगर राज्यों का गठन भाषा के आधार पर शुरू हुआ तो क्षेत्रीय पहचान राष्ट्रीय एकता पर भारी पड़ सकती है. कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भाषाई राज्यों का समर्थन जरूर किया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद उसकी प्राथमिकताएं बदल गईं.

नेहरू, सरदार पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की JVP समिति ने भी यही राय दी कि उस समय भाषाई राज्यों का गठन उचित नहीं होगा. संसद में भी नेहरू ने कहा था कि भाषाई राज्यों का विचार गलत नहीं है, लेकिन "अभी सही समय नहीं है." समस्या यह थी कि आंध्र के लोगों के लिए यह जवाब अधूरा था. उन्हें यह नहीं बताया गया कि वह "सही समय" आखिर आएगा कब. इसी अनिश्चितता ने आंदोलन को और तेज़ कर दिया.

इंजीनियर कैसे बना गांधी का सबसे समर्पित अनुयायी?

पोट्टी श्रीरामुलु का जन्म 1901 में हुआ था. उन्होंने सैनिटरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और रेलवे में नौकरी भी की, लेकिन निजी जीवन की एक गहरी त्रासदी ने उनका पूरा जीवन बदल दिया. पत्नी और नवजात बच्चे की मौत के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बन गए. नमक सत्याग्रह में शामिल हुए, साबरमती आश्रम में रहे, जेल गए और अपना पूरा जीवन समाज सेवा को समर्पित कर दिया.

श्रीरामुलु का संघर्ष शुरुआत में अलग राज्य के लिए नहीं था. वे दलितों के मंदिर प्रवेश, सामाजिक समानता और गांधीवादी मूल्यों के लिए लगातार अनशन और सत्याग्रह करते रहे. 1946 में दलितों के मंदिर प्रवेश को लेकर उनका आमरण अनशन गांधी के हस्तक्षेप के बाद ही टूटा था. गांधी उन्हें "दृढ़ निश्चयी कार्यकर्ता" मानते थे. यही अडिग स्वभाव बाद में उन्हें आंध्र आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बना गया.

 

58 दिन का अनशन... जिसने पूरी व्यवस्था को चुनौती दी

19 अक्टूबर 1952 को पोट्टी श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग राज्य की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरू किया. उनका विश्वास था कि यदि एक भाषा, एक संस्कृति और एक साझा पहचान वाले लोगों को अलग प्रशासन मिलेगा तो उनका विकास भी बेहतर होगा. शुरुआती दिनों में केंद्र सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. नेताओं ने समझाने की कोशिश की, लेकिन श्रीरामुलु ने साफ कर दिया कि जब तक स्पष्ट घोषणा नहीं होगी, वह उपवास नहीं तोड़ेंगे. दिन गुजरते गए, शरीर कमजोर होता गया, लेकिन संकल्प और मजबूत होता गया. 58वें दिन उनकी हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि वे बोल भी नहीं पा रहे थे. डॉक्टरों ने उपवास तोड़ने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने सिर्फ अपनी उंगली होंठों पर रखकर मना कर दिया.

15 दिसंबर 1952 को 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं थी, बल्कि उस नैतिक दबाव का चरम था जिसे अब सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती थी.

मौत जिसने दक्षिण भारत को सड़कों पर ला दिया

श्रीरामुलु की मृत्यु की खबर फैलते ही तेलुगु भाषी क्षेत्रों में अभूतपूर्व जनाक्रोश फूट पड़ा. जगह-जगह प्रदर्शन हुए, सरकारी कार्यालयों पर हमले हुए, रेल सेवाएँ बाधित हुईं, पुलिस फायरिंग हुई और कई लोगों की जान चली गई. यह हिंसा स्वयं श्रीरामुलु के गांधीवादी विचारों के विपरीत थी, लेकिन जनता के भीतर वर्षों से जमा असंतोष अब विस्फोट बन चुका था.

चार दिन तक हालात बिगड़ते रहे और अंततः 19 दिसंबर 1952 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अलग आंध्र राज्य बनाने की घोषणा कर दी. एक साल बाद 1 अक्टूबर 1953 को आंध्र राज्य अस्तित्व में आया. बाद में 1956 में तेलंगाना क्षेत्र के विलय के साथ आंध्र प्रदेश बना और 2014 में तेलंगाना फिर अलग राज्य बन गया. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की निर्णायक शुरुआत उसी 58 दिन के अनशन से हुई थी.

क्या सिर्फ आंध्र बना या बदल गया भारत का भूगोल?

आंध्र राज्य बनने के बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, गुजरात, पंजाब और अन्य क्षेत्रों में भी भाषाई पहचान के आधार पर राज्यों की मांग तेज़ हो गई. केंद्र सरकार समझ चुकी थी कि अब इस प्रश्न को लंबे समय तक टालना संभव नहीं है. इसी दबाव में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया. आयोग ने देशभर का व्यापक अध्ययन किया, हजारों लोगों से बातचीत की और लाखों सुझावों के आधार पर 1956 में राज्यों के बड़े पुनर्गठन की सिफारिश की.

यही वह प्रक्रिया थी जिसने आधुनिक भारत का नक्शा तैयार किया. बाद के दशकों में बने अधिकांश राज्यों की वैचारिक नींव भी इसी फैसले से जुड़ी रही. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इसलिए लिखा कि यदि जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता थे, तो पोट्टी श्रीरामुलु को आधुनिक भारत का "मानचित्रकार" कहा जा सकता है, क्योंकि उनके बलिदान ने भारत के राजनीतिक नक्शे की दिशा बदल दी.

इतिहास की सबसे बड़ी सीख क्या?

पोट्टी श्रीरामुलु की कहानी सिर्फ एक अलग राज्य की मांग की कहानी नहीं है. यह उस नैतिक शक्ति की कहानी है, जिसमें सत्ता से बड़ा हथियार विश्वास और प्रतिबद्धता बन जाता है. उन्होंने न चुनाव लड़ा, न कोई राजनीतिक पद चाहा, न किसी सरकार को गिराने की कोशिश की. उनका उद्देश्य सिर्फ इतना था कि करोड़ों तेलुगु भाषियों की पहचान को संवैधानिक सम्मान मिले.

उन्होंने अपनी जान देकर यह साबित किया कि लोकतंत्र में कई बार सबसे बड़ी ताकत बंदूक नहीं, बल्कि नैतिक दबाव होता है. उनके बलिदान ने न सिर्फ नेहरू सरकार का रुख बदला, बल्कि यह भी तय किया कि भारत अपनी विविधताओं को दबाकर नहीं, बल्कि उन्हें सम्मान देकर मजबूत बनेगा. यही वजह है कि आज जब भारत का नक्शा देखते हैं तो उसकी कई सीमाओं के पीछे पोट्टी श्रीरामुलु के 58 दिनों के उस मौन संघर्ष की छाप साफ दिखाई देती है.