Explainer: कुत्ते-बिल्लियों से लेकर बंदरों तक पर प्रयोग का खुलेगा रास्ता, नए ड्राफ्ट में क्या-क्या, क्यों भड़का है PETA?
प्रयोगशाला में कुत्ते-बिल्लियों से लेकर बंदरों तक पर परीक्षण के नए मसौदे पर विवाद है. जानिए सरकार के प्रस्ताव, PETA की आपत्तियां और जानवरों की सुरक्षा से जुड़े सवाल.
कल्पना कीजिए, किसी दवा या बीमारी पर रिसर्च के लिए अब तक जिस प्रयोग की मंजूरी लेने के लिए केंद्रीय समिति के पास जाना पड़ता था, उसकी अनुमति रिसर्च इंस्टीट्यूट अपनी समिति ही दे सकेगी. यही बदलाव केंद्र सरकार के नए प्रस्ताव में किया गया है. अभी यह सिर्फ मसौदा भर है. अगर यह कानून बना तो फिर यह मसला सिर्फ वैज्ञानिकों को मिलने वाली छूट का नहीं है, बल्कि उन बेजुबान जानवरों का भी है जिन पर प्रयोग किए जाते हैं. नए नियमों में आवारा कुत्तों, बिल्लियों और जंगली जानवरों के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. यही वजह है कि PETA इंडिया समेत पशु अधिकार संगठन इसके विरोध में उतर आए हैं.
आखिर सरकार नियम क्यों बदलना चाहती है? नए ड्राफ्ट में ऐसा क्या है जिससे विवाद बढ़ गया है? और क्या इसका असर भारत में होने वाली मेडिकल रिसर्च पर भी पड़ेगा? समझते हैं पूरा मामला.
नए ड्राफ्ट में क्या-क्या बदलने वाला है?
केंद्रीय समिति CCSEA ने अक्टूबर 2026 में प्रयोगशालाओं में पशुओं के इस्तेमाल, उनके प्रजनन और व्यापार से जुड़े नए नियमों का मसौदा जारी किया है. इसका नाम पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026 है.
इसमें सबसे बड़ा बदलाव पशुओं पर होने वाले प्रयोगों की मंजूरी को लेकर है. अब तक बड़े जानवरों पर प्रयोग के लिए केंद्रीय समिति की अनुमति जरूरी होती थी. नए प्रस्ताव में संस्थानों की अपनी पशु आचार समिति यानी IAEC को भी कुछ प्रयोगों की मंजूरी देने का अधिकार देने की बात कही गई है.
मसौदे के मुताबिक, प्रयोगों को उनसे होने वाली संभावित पीड़ा के आधार पर चार हिस्सों में बांटा जाएगा. ये हैं- हल्के, मध्यम, गंभीर और नॉन-रिकवरी. हल्के और मध्यम स्तर के प्रयोगों को संस्थान की आंतरिक समिति मंजूरी दे सकेगी. गंभीर और नॉन-रिकवरी श्रेणी के प्रयोगों की समीक्षा केंद्रीय समिति करेगी.
इसके अलावा, मसौदे में 3Rs का सिद्धांत भी शामिल है. इसका मतलब है कि जहां संभव हो, जानवरों की जगह दूसरे वैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाए, प्रयोगों में कम से कम जानवरों को शामिल किया जाए और उन्हें होने वाले दर्द व तनाव को कम किया जाए.
सरकार को 28 साल पुराने नियम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत में प्रयोगशालाओं में जानवरों के इस्तेमाल को लेकर वर्ष 1998 से नियम लागू हैं. इनके तहत पशुओं पर प्रयोग करने वाली संस्थाओं और प्रयोगशालाओं की निगरानी केंद्रीय समिति करती है. बड़े जानवरों पर प्रयोग के लिए केंद्रीय स्तर पर अनुमति लेना जरूरी है.
इस व्यवस्था में हर प्रयोग की मंजूरी के लिए केंद्रीय समिति पर निर्भरता रहती है. सरकार के नए प्रस्ताव का मकसद इसी प्रक्रिया को आसान बनाना है. हल्के और मध्यम स्तर के प्रयोगों की मंजूरी संस्थानों की अपनी समितियों को मिलने से शोधकर्ताओं को अनुमति के लिए लंबा इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
इससे वैज्ञानिक और शैक्षणिक संस्थानों में रिसर्च का काम तेजी से आगे बढ़ सकता है. हालांकि, मसौदे में पुराने नियमों की कमियों का विस्तृत ब्यौरा नहीं दिया गया है. इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि 1998 के नियमों में कौन-सी कमियां आधिकारिक रूप से स्वीकार की गई हैं.
PETA को नए नियमों में सबसे ज्यादा आपत्ति किस बात से?
PETA इंडिया और दूसरे पशु अधिकार संगठनों का विरोध मुख्य रूप से निगरानी की व्यवस्था को लेकर है. उनका कहना है कि जिस संस्थान में प्रयोग होना है, उसी संस्थान की समिति को प्रयोग की मंजूरी देने का अधिकार मिलना हितों के टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. संगठनों को डर है कि इससे स्वतंत्र निगरानी कमजोर होगी और पशुओं के साथ होने वाले प्रयोगों पर नियंत्रण कम हो सकता है.
दूसरी बड़ी चिंता आवारा और जंगली जानवरों को लेकर है. मसौदे के नियम 5(3) में विशेष वैज्ञानिक कारण और सक्षम अधिकारी की अनुमति के आधार पर कुछ अपवादों की गुंजाइश रखी गई है. पशु अधिकार संगठनों को आशंका है कि इसका इस्तेमाल आवारा कुत्तों, बिल्लियों और अन्य जंगली जानवरों पर प्रयोग करने के लिए किया जा सकता है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि नए मसौदे में इन जानवरों को प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल करने की खुली छूट दे दी गई है. विरोध करने वाले संगठनों की चिंता उन परिस्थितियों को लेकर है जिनमें अपवाद के तौर पर अनुमति मिल सकती है.
क्या अब कुत्ते-बिल्लियों को भी लैब में ले जाया जा सकेगा?
यह नए विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है. मसौदे में आवारा और जंगली जानवरों के इस्तेमाल पर सामान्य रोक के साथ कुछ विशेष परिस्थितियों में छूट का प्रावधान बताया गया है.
PETA और दूसरे संगठन चाहते हैं कि इस तरह के अपवादों को खत्म किया जाए. उनकी चिंता है कि स्पष्ट और सख्त सीमाएं नहीं होने पर आवारा कुत्तों और बिल्लियों को भी प्रयोगों में शामिल करने का रास्ता खुल सकता है. संगठनों का कहना है कि इन मामलों में निगरानी कमजोर नहीं होनी चाहिए.
PETA और दूसरे संगठन सरकार से क्या चाहते हैं?
पशु अधिकार संगठनों की मांग है कि नए मसौदे को वापस लिया जाए या उसमें बड़े बदलाव किए जाएं. वे चाहते हैं कि बड़े जानवरों पर होने वाले प्रयोगों की मंजूरी केंद्रीय समिति के पास ही रहे, ताकि स्वतंत्र निगरानी बनी रहे.
उनकी दूसरी मांग आवारा और जंगली जानवरों पर प्रयोग की छूट खत्म करने की है. इसके अलावा, मोबाइल प्रयोगशालाओं और खुले क्षेत्रों में प्रयोग करने से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा की मांग भी उठाई गई है.
संगठन चाहते हैं कि जानवरों पर परीक्षण करने के बजाय आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए. इनमें कंप्यूटर आधारित मॉडल, मानव कोशिकाओं पर परीक्षण और ऑर्गन-ऑन-चिप जैसी तकनीकें शामिल हैं.
क्या नए नियमों पर रोक लगी तो रिसर्च की रफ्तार थम जाएगी?
इस पूरे विवाद का एक दूसरा पहलू वैज्ञानिक अनुसंधान है. दवाओं की सुरक्षा जांचने, बीमारियों को समझने और नई चिकित्सा तकनीक विकसित करने में प्रयोगशालाओं की अहम भूमिका होती है.
अगर प्रयोगों की मंजूरी प्रक्रिया लंबी और जटिल बनी रहती है, तो शोध परियोजनाओं को शुरू करने में देरी हो सकती है. वहीं, नए प्रस्ताव के तहत कुछ प्रयोगों की मंजूरी संस्थानों की अपनी समितियों को मिलने से प्रक्रिया तेज हो सकती है.
इसका असर दवाओं के विकास, बीमारियों पर शोध और नई चिकित्सा तकनीकों के परीक्षण से जुड़े कामों पर पड़ सकता है. हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि नए नियमों पर रोक लगने से कोई खास दवा, टीका या चिकित्सा परियोजना रुक जाएगी. इसके लिए संबंधित शोध संस्थानों और परियोजनाओं के आंकड़ों की जरूरत होगी.
दूसरी तरफ, वैज्ञानिक अनुसंधान की रफ्तार बढ़ाने के नाम पर पशुओं की सुरक्षा से समझौता भी नहीं किया जा सकता. इसलिए इस बहस का असली मुद्दा रिसर्च रोकना या जानवरों पर प्रयोग की खुली छूट देना नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाना है.
इस पूरे विवाद पर सरकार का क्या पक्ष है?
नए मसौदे के पीछे सरकार का घोषित उद्देश्य वैज्ञानिक और शैक्षणिक अनुसंधान से जुड़ी मंजूरी प्रक्रिया को आधुनिक और सरल बनाना है. प्रयोगों को उनकी संभावित पीड़ा के आधार पर बांटना और हल्के व मध्यम स्तर के प्रयोगों की मंजूरी संस्थागत समितियों को देना इसी दिशा में प्रस्तावित बदलाव हैं. सरकार ने इस मसौदे पर वैज्ञानिकों, शोध संस्थानों, पशु अधिकार संगठनों और आम नागरिकों से सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं.
जनता कब तक और कहां भेज सकती है आपत्ति?
सरकार की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक नए मसौदे पर जनता से सुझाव और आपत्तियां 5 नवंबर 2026 तक अपनी राय भेजी जा सकती है. सचिव, पशुपालन और डेयरी विभाग को संबोधित करते हुए cpcsea-mef@gov.in या mailto:cpcsea-mef@gov.in) पर भेजना होगा.
फिलहाल, नया मसौदा अभी अंतिम कानून नहीं, बल्कि प्रस्तावित नियमों का ड्राफ्ट है. यानी सरकार सुझावों और आपत्तियों के आधार पर इसमें बदलाव कर सकती है.
रिसर्च को रफ्तार मिलेगी या बेजुबानों की सुरक्षा कमजोर होगी?
इस पूरे विवाद में दो पक्ष हैं. एक तरफ वैज्ञानिक संस्थान हैं, जिन्हें रिसर्च के लिए तेज और आसान मंजूरी चाहिए. दूसरी तरफ पशु अधिकार संगठन हैं, जिन्हें डर है कि मंजूरी की प्रक्रिया आसान करने के चक्कर में जानवरों की सुरक्षा और निगरानी कमजोर हो सकती है.
अब सरकार के सामने चुनौती सिर्फ नए नियम लागू करने की नहीं, बल्कि यह भरोसा कायम करने की भी है कि वैज्ञानिक तरक्की के नाम पर पशुओं के साथ मनमानी नहीं होगी.
क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि प्रयोगशाला में किस जानवर पर परीक्षण होगा. असली सवाल यह है कि उस प्रयोग की मंजूरी कौन देगा, निगरानी कौन करेगा और अगर किसी बेजुबान के साथ गलत हुआ तो जवाबदेह कौन होगा?