क्या है 'खाने की प्लेट' जितना टेलीस्कोप, कैसे करेगा काम, कौन है इसे बनाने वाली बेंगलुरु की राम्या, जिन्हें NASA ने दी फंडिंग
राम्या मंजूनाथ आंचे अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में खगोल विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. अब उन्हें नासा ने PUFFINS मिशन के लिए 20 मिलियन डॉलर की फंडिंग दी है.
कभी-कभी जिंदगी की कोई घटना इंसान के मन में ऐसा सवाल छोड़ जाती है, जिसका जवाब ढूंढने में पूरी जिंदगी गुजर जाती है. बेंगलुरु के देवनहल्ली की रहने वाली एक लड़की के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. साल 2003 में जब अंतरिक्ष यान कोलंबिया हादसे में भारतीय मूल की अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला समेत सात लोगों की जान चली गई, तब दुनिया भर में शोक की लहर थी. उस समय इस लड़की के मन में भी कई सवाल उठे. आखिर अंतरिक्ष में ऐसा क्या हुआ था? यह हादसा क्यों हुआ और क्या इसे रोका जा सकता था? उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि ये सवाल एक दिन उसे अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में इतनी आगे ले जाएंगे.
आज यही लड़की अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना में खगोल विज्ञान की सहायक प्रोफेसर हैं. उनका नाम है राम्या मंजूनाथ अंचे. उन्होंने एक ऐसे छोटे टेलीस्कोप के मिशन का नेतृत्व किया है, जिसे NASA से 20 मिलियन डॉलर यानी करीब 200 लाख डॉलर की फंडिंग मिली है. यह टेलीस्कोप आकार में खाने की प्लेट जितना होगा, लेकिन इसका काम बेहद खास है. यह अंतरिक्ष में तारों के बीच मौजूद धूल के बेहद छोटे कणों का अध्ययन करेगा. आइए जानते हैं कौन हैं राम्या, कैसे शुरू हुआ उनका सफर और उनका यह मिशन क्यों खास माना जा रहा है.
कौन हैं राम्या मंजूनाथ आंचे?
राम्या का जन्म बेंगलुरु के देवनहल्ली में हुआ. उनके पिता ए. मंजूनाथ जाने-माने माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. वह बेंगलुरु के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय से रिटायर हुए हैं. उनके पिता मिट्टी से जुड़े शोध में काम करते थे. ऐसे में घर का माहौल पढ़ाई और विज्ञान से जुड़ी चर्चाओं वाला था. राम्या ने देवनहल्ली के ऑक्सफोर्ड इंग्लिश स्कूल से शुरुआती पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने बेंगलुरु के MES विद्यासागर प्रो. MPL शास्त्री पीयू कॉलेज में पढ़ाई की. आगे चलकर उन्होंने सर एम. विश्वेश्वरैया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में डिग्री ली. राम्या को बचपन से ही विज्ञान में दिलचस्पी थी. जब वह हाईस्कूल में पहुंचीं, तब घर में विज्ञान से जुड़े विषयों पर बातचीत होने लगी थी. पिता के मुताबिक, इन चर्चाओं ने राम्या के मन में सवाल पूछने और उनके जवाब तलाशने की आदत पैदा की.
कल्पना चावला के हादसे ने बदल दी सोच
राम्या के मन में अंतरिक्ष और विज्ञान को लेकर दिलचस्पी बढ़ने की एक बड़ी वजह साल 2003 का कोलंबिया हादसा भी बना. 1 फरवरी 2003 को अंतरिक्ष यान कोलंबिया पृथ्वी पर लौटते समय दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. इस हादसे में कल्पना चावला समेत सात अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई थी. इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया था. राम्या उस समय किशोर उम्र में थीं. हादसे के बाद उनके मन में कई सवाल उठने लगे. वह जानना चाहती थीं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और भविष्य में इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जा सकता है. राम्या के मुताबिक, इस घटना ने उन पर गहरा असर डाला. वह इसके कारणों को समझना चाहती थीं. यही जिज्ञासा धीरे-धीरे उन्हें विज्ञान और अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा में आगे ले गई.
सॉफ्टवेयर की नौकरी के बजाय चुना शोध का रास्ता
राम्या की इंजीनियरिंग की पढ़ाई ऐसे समय में पूरी हुई, जब बेंगलुरु में सॉफ्टवेयर कंपनियों का कारोबार तेजी से बढ़ रहा था. उस दौर में ज्यादातर इंजीनियरिंग के छात्र बड़ी कंपनियों में नौकरी पाने और अच्छा पैकेज हासिल करने का सपना देखते थे. लेकिन राम्या की सोच इससे अलग थी. वह किसी कंपनी में नौकरी करने के बजाय रिसर्च यानी शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती थीं. उनके परिवार ने भी उनके फैसले का साथ दिया. पिता का कहना है कि उन्होंने कभी अपने बच्चों पर किसी खास तरह की पढ़ाई या नौकरी चुनने का दबाव नहीं बनाया. राम्या के शोध का रास्ता चुनने पर उन्हें खुशी हुई.
कैसे शुरू हुआ अंतरिक्ष विज्ञान का सफर
साल 2012 में राम्या ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स में दाखिला लिया. यहां उन्होंने खगोलीय उपकरणों से जुड़े विषय में इंटीग्रेटेड एमटेक-पीएचडी की पढ़ाई शुरू की. इस दौरान उन्हें प्रोफेसर जी.सी. अनुपमा का मार्गदर्शन मिला. इसके बाद साल 2020-21 में उन्होंने पुणे के इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप की. यहां से उनका शोध का अनुभव और मजबूत हुआ. साल 2021 में राम्या अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना पहुंचीं. फिलहाल वह वहां स्टीवर्ड ऑब्जर्वेटरी में सहायक शोध प्रोफेसर के तौर पर काम कर रही हैं. इसी दौरान उन्होंने NASA के एक खास मिशन का प्रस्ताव तैयार किया, जिसे अंतरिक्ष एजेंसी की मंजूरी मिल गई.
NASA ने दिए 20 मिलियन डॉलर, क्या है PUFFINS मिशन?
- राम्या जिस मिशन का नेतृत्व कर रही हैं, उसका नाम PUFFINS है. इसका पूरा नाम Polarimetry in the Ultraviolet to Find Features in INterStellar dust है. इस मिशन के लिए NASA ने अक्टूबर में 20 मिलियन डॉलर की फंडिंग दी है. यह राशि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी के एस्ट्रोफिजिक्स पायनियर्स कार्यक्रम के तहत मिली है.
- इस मिशन का मुख्य मकसद तारों के बीच मौजूद धूल के बेहद छोटे कणों का अध्ययन करना है. ये कण इतने छोटे होते हैं कि आम टेलीस्कोप से इन्हें देख पाना मुश्किल है. इनका आकार सामान्य सर्दी-जुकाम के वायरस जितना बताया गया है. सुनने में ये धूल के मामूली कण लग सकते हैं, लेकिन अंतरिक्ष को समझने में इनकी भूमिका काफी अहम है.
- तारों से निकलने वाली रोशनी जब इन कणों के बीच से गुजरती है, तो उसकी दिशा और गुणों पर असर पड़ता है. इसके अलावा नए तारों और ग्रहों के बनने की प्रक्रिया को समझने में भी ये कण मदद कर सकते हैं.
प्लेट जितना छोटा टेलीस्कोप कैसे काम करेगा
- PUFFINS मिशन की सबसे दिलचस्प बात इसका टेलीस्कोप है. इसका आकार खाने की प्लेट जितना होगा. यानी यह आकार में बहुत बड़ा नहीं होगा, लेकिन इसके जरिए अंतरिक्ष की ऐसी चीजों को समझने की कोशिश की जाएगी, जिन्हें ज्यादातर टेलीस्कोप पकड़ नहीं पाते.
- यह टेलीस्कोप अल्ट्रावायलेट यानी पराबैंगनी रोशनी के जरिए धूल के कणों का अध्ययन करेगा. इसके लिए यूवी स्पेक्ट्रोपोलरिमेट्री नाम की तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा. इस तकनीक के जरिए रोशनी के गुणों और उसके ध्रुवीकरण का अध्ययन किया जाता है.
- राम्या के मुताबिक, अंतरिक्ष से इस तकनीक का इस्तेमाल करके अध्ययन करने की कोशिश करीब 30 साल से नहीं हुई है. ऐसे में PUFFINS से मिलने वाली जानकारी वैज्ञानिकों के लिए एक लंबे समय से खाली पड़े हिस्से को भरने में मददगार हो सकती है.
2030 में अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी
PUFFINS पांच साल का मिशन है. इसकी योजना के मुताबिक, अगले चार साल तक टेलीस्कोप को तैयार करने और उसके डिजाइन पर काम किया जाएगा. इसे साल 2030 में अंतरिक्ष में भेजने का लक्ष्य है. इस परियोजना में करीब 40 वैज्ञानिक, इंजीनियर, शोध छात्र और पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता काम कर रहे हैं. राम्या इस पूरी टीम की मुख्य जांचकर्ता यानी प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं. वह बताती हैं कि टीम के कई सदस्य उनसे ज्यादा अनुभवी हैं और वह रोज उनसे कुछ नया सीखती हैं.
राम्या के लिए यह भी एक खास उपलब्धि है, क्योंकि यह पहला ऐसा उपकरण होगा, जिसके डिजाइन में उन्होंने मदद की है और जिसे वास्तव में तैयार करके अंतरिक्ष में भेजा जाएगा.