चुनाव आयोग में सीनियर उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कथित कदाचार को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को पत्र लिखा था. Hindustan Times के मुताबिक, इन पत्रों में IT महानिदेशक सीमा खन्ना के कामकाज की निगरानी से जुड़ी एक व्यवस्था हटाने पर चिंता जताई गई थी.

दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने जुलाई में अलग-अलग पत्र लिखे थे. दोनों पत्रों की भाषा लगभग एक जैसी थी. हालांकि, पत्रों में चुनाव आयोग के भीतर किसी मतभेद का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया था, लेकिन इनमें साफ कहा गया था कि गर्ग का DG-IT की फाइलों को एक उप चुनाव आयुक्त (DEC) के जरिए भेजे जाने की प्रक्रिया को हटाने का फैसला नियमों के खिलाफ था.

किन बातों पर उठाए थे सवाल?

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने पत्रों में बताया था कि सीमा खन्ना से जुड़ी फाइलें पहले उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के पास भेजी जाती थीं. संजय कुमार चुनावी प्रक्रिया की पूरी जानकारी रखने वाले अनुभवी अधिकारी थे. पत्रों में कहा गया कि फाइलों की निगरानी की इस लेयर को हटाने से पूरी प्रक्रिया कमजोर हुई और इससे गर्ग ने निगरानी व्यवस्था को प्रभावित किया.

यह जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले सप्ताह चुनाव आयोग ने इस मामले में स्पष्टीकरण जारी किया था. आयोग ने कहा था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने सोमनाथन को जो पत्र लिखे थे, वे आयोग की किसी नीति या उसके IT विभाग से जुड़े नीतिगत मामले को लेकर नहीं थे. आयोग के मुताबिक, ये पत्र सिर्फ चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्त एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थे.

चुनाव आयोग ने यह भी कहा था कि गर्ग की ओर से जारी किया गया काम के बंटवारे का आदेश वास्तव में लागू नहीं हुआ था. आयोग के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों के आदेश के बाद IT विभाग की DEC के स्तर पर निगरानी कभी वास्तव में खत्म नहीं हुई थी.

संजय कुमार अगस्त में अपने कैडर लौटे

हालांकि, जिस DEC संजय कुमार के पास पहले सीमा खन्ना की फाइलें जाती थीं, वह अगस्त में अपने मूल कैडर में वापस लौट गए. वह केंद्र शासित प्रदेश (UT) कैडर के IAS अधिकारी थे. अब उनकी जिम्मेदारियां मनीष गर्ग देख रहे हैं. इसका मतलब है कि सीमा खन्ना से जुड़ी फाइलें अब उनके जरिए चुनाव आयुक्तों तक पहुंचती हैं.

चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों ने नाम नहीं बताने की शर्त पर HT को बताया कि संजय कुमार ने खुद को कार्यमुक्त करने की गुजारिश की थी, क्योंकि वह दिल्ली सरकार में वापस जाना चाहते थे.

IT विभाग पर पहले से ही क्या चल रहा है विवाद?

यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि सीमा खन्ना और चुनाव आयोग का IT विभाग पहले से ही एक बड़े विवाद के केंद्र में हैं. Indian Express की एक जांच में दावा किया गया था कि सीमा खन्ना की ओर से लागू किए गए नए IT प्रोटोकॉल/सिस्टम, जिसे चुनाव आयोग ने मंजूरी दी थी. इन प्रोटोकोल्स ने उस डेटाबेस को उन अधिकारियों से ही अलग कर दिया था जो मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए जिम्मेदार हैं.

इन अधिकारियों में Electoral Registration Officers (EROs) और Deputy Electoral Registration Officers (Deputy EROs) शामिल हैं. इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के IT सिस्टम और मतदाता सूची से जुड़े कामकाज को लेकर सवाल उठे थे.

कैबिनेट सचिव सोमनाथन क्यों नहीं कर सके कार्रवाई?

HT को यह भी जानकारी मिली है कि देश के शीर्ष नौकरशाह कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन इन पत्रों के आधार पर सीधे कोई कार्रवाई नहीं कर सके. इसकी वजह यह बताई गई कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ये पत्र चुनाव आयोग के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत हैसियत में लिखे थे. बताया जाता है कि सोमनाथन ने मनीष गर्ग के खिलाफ मिली शिकायतों को संबंधित कार्मिक मंत्रालय और Department of Personnel and Training (DoPT) को भेज दिया था.

HT के अनुसार, सरकार का मानना था कि ये पत्र कार्रवाई की मांग करने के बजाय सरकार को स्थिति से अवगत कराने की प्रकृति के थे. सरकार की ओर से कोई कार्रवाई करना चुनाव आयोग की स्वायत्तता में हस्तक्षेप माना जा सकता था.

गर्ग ने दोनों चुनाव आयुक्तों के सामने रखा अपना पक्ष

रिपोर्ट के मुताबिक, मनीष गर्ग ने दोनों चुनाव आयुक्तों से मुलाकात कर अपने फैसले को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट किया था. बताया जाता है कि गर्ग ने उन्हें समझाया कि उनका फैसला पदानुक्रम (hierarchy) से जुड़ी समस्या को दूर करने के उद्देश्य से था. उनका तर्क था कि सीमा खन्ना, संजय कुमार से वरिष्ठ अधिकारी थीं. चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, खन्ना को इस साल की शुरुआत में लेवल-14 से लेवल-15 अधिकारी के पद पर पदोन्नत किया गया था.

आखिर क्या है दिक्कत?

कुछ सरकारी अधिकारियों का मानना है कि मनीष गर्ग के कथित कदाचार का मुद्दा केवल किसी एक अधिकारी के फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह चुनाव आयोग की स्ट्र्क्चर से जुड़ी समस्या को भी सामने लाता है. Election Commission (Conditions of Service of Election Commissioners and Transaction of Business) Act, 1991 के अनुसार, चुनाव आयोग के फैसले बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं. अगर चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद होता है, चाहे वह बैठक में सामने आए या फाइलों के जरिए, तो प्रत्येक सदस्य का पक्ष दर्ज किया जाता है.

हर रोज के कामकाज के लिए आयोग के काम को अलग-अलग चुनाव आयुक्तों के बीच बांटा जा सकता है. लेकिन अगर किसी मामले पर चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद हो या कोई भी चुनाव आयुक्त उस मामले को पूरी आयोग के सामने रखने की मांग करे, तो उसे तीनों सदस्यों वाले पूर्ण आयोग के पास भेजना जरूरी होता है. इसके बाद फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाता है.