अगर BRICS को अगर सिर्फ अमेरिका-विरोधी मंच मान लिया जाए तो इसकी असली कहानी छूट जाती है. क्योंकि यह ऐसा समूह है जिसमें दुनिया की कुछ सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं एक साथ बैठती हैं, लेकिन उनके रणनीतिक हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हैं. भारत और चीन सीमा विवाद के बावजूद साथ हैं, ईरान और सऊदी अरब क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बावजूद एक मंच पर हैं और रूस पश्चिम से संघर्ष के बीच BRICS को नई वैश्विक व्यवस्था का आधार मानता है. ऐसे में दिल्ली Summit सिर्फ विस्तार और घोषणाओं का मंच नहीं, बल्कि यह परखने का मौका है कि Global South अपने भीतर के इन विरोधाभासों के बावजूद कितनी साझा रणनीति बना सकता है.

क्या BRICS सचमुच अमेरिका-विरोधी गठबंधन है?

BRICS को अक्सर अमेरिका और पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ उभरते धड़े के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसका मकसद संगठनात्मक तस्वीर से काफी अलग है. BRICS के पास न कोई संस्थापक संधि है, न स्थायी सचिवालय और न साझा सैन्य ढांचा. इसका उद्देश्य Global South की आवाज को मजबूत करना, आर्थिक-सामाजिक सहयोग बढ़ाना और UN, IMF, World Bank तथा WTO जैसी संस्थाओं में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करना है.

यानी यह NATO जैसा सैन्य गठबंधन या किसी देश के खिलाफ औपचारिक रणनीतिक ब्लॉक नहीं है. 2025 तक BRICS में 11 पूर्ण सदस्य हैं- ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, UAE और इंडोनेशिया.

BRICS आंकड़ों के अनुसार इसमें शामिल देश दुनिया की करीब 45 फीसदी आबादी और लगभग 40 फीसदी वैश्विक GDP का प्रतिनिधित्व करते हैं. यही वजन इसे अमेरिका-विरोधी संगठन से ज्यादा Global South के प्रभाव को बढ़ाने वाले मंच में बदलता है.

फिर BRICS में सबसे बड़ा विरोधाभास कहां है?

BRICS में विरोधाभास इसकी सदस्यता के विस्तार में ही दिखाई देता है. मूल BRIC (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह था. 2011 में दक्षिण अफ्रीका जुड़ा और 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE शामिल हुए. 2025 में इंडोनेशिया पूर्ण सदस्य बना.

कहने का मतलब है कि आर्थिक हितों के साथ अब इसमें तेल उत्पादक देश, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी, अमेरिका के करीबी साझेदार और पश्चिम से टकराव में खड़े देश एक ही मेज पर हैं. BRICS में फैसले आम तौर पर consensus यानी सर्वसम्मति से होते हैं. इसलिए सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ एक साझा राजनीतिक लाइन बनाना और मुश्किल हुआ है.

2025 में कई देशों को partner-country का दर्जा भी दिया गया, जिससे समूह का दायरा और बढ़ा. विस्तार ने BRICS की वैश्विक पहुंच तो बढ़ाई है, लेकिन साझा रणनीति तैयार करने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी कर दी है.

क्या China-India की प्रतिद्वंद्विता BRICS की सबसे बड़ी परीक्षा है?

भारत और चीन BRICS के भीतर सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जटिल समीकरण हैं. 2020 के गलवान संघर्ष में 20 भारतीय सैनिक मारे गए और इसके बाद दोनों देशों के राजनीतिक भरोसे तथा आर्थिक संबंधों पर गहरा असर पड़ा. सीमा पर तनाव कम करने की कोशिशों के बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा का विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.

इसके बावजूद दोनों BRICS में साथ काम करते हैं और चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में बना हुआ है. 2025 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार करीब 155 अरब डॉलर तक पहुंचा. यही विरोधाभास BRICS की प्रकृति को समझाता है. सुरक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा और आर्थिक क्षेत्र में निर्भरता साथ-साथ चल रही है.

भारत चीन के बढ़ते प्रभाव से सावधान है, जबकि चीन भारत की अमेरिका के साथ बढ़ती रणनीतिक साझेदारी और इंडो-पैसिफिक भूमिका को चुनौती के रूप में देखता है. इसके बावजूद दोनों यह समझते हैं कि BRICS को पूरी तरह द्विपक्षीय विवादों का बंधक बनाने से संगठन की उपयोगिता कमजोर होगी.

Iran-Saudi एक मंच पर कैसे टिकते हैं?

BRICS का विस्तार पश्चिम एशिया के दो महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वियों- ईरान और सऊदी अरब को भी एक ही मंच पर ले आया है. दोनों देशों के बीच वर्षों तक क्षेत्रीय प्रभाव, यमन, सीरिया और दूसरे संघर्षों को लेकर तीखी प्रतिस्पर्धा रही. 2023 में चीन की मध्यस्थता से दोनों ने राजनयिक संबंध बहाल करने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन उनके रणनीतिक हित पूरी तरह समान नहीं हुए हैं.

UAE भी BRICS का सदस्य है और उसके ईरान के साथ अपने अलग आर्थिक तथा सुरक्षा हित हैं. इसलिए पश्चिम एशिया के किसी संकट पर सामूहिक प्रतिक्रिया तैयार करना आसान नहीं है. एक सदस्य की सुरक्षा चिंता दूसरे सदस्य की कूटनीतिक प्राथमिकता से टकरा सकती है. यही कारण है कि BRICS का विस्तार एक तरफ उसे अधिक प्रतिनिधिक बनाता है, लेकिन दूसरी तरफ सामूहिक विदेश नीति पर सहमति की संभावना कम करता है.

Russia-West टकराव में BRICS किस तरफ खड़ा है?

रूस BRICS को पश्चिमी दबाव के बीच रणनीतिक विकल्प के तौर पर देखता है, खासकर यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद. चीन भी अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने वाली बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वकालत करता है. लेकिन भारत की स्थिति अलग है.

भारत रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है. भारत BRICS को पश्चिम-विरोधी मोर्चे में बदलने के पक्ष में नहीं है. डॉलर से दूरी और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर भी भारत का रुख चीन या रूस की तुलना में ज्यादा सावधान है.

BRICS में स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की चर्चा होती रही है, लेकिन भारत ऐसी व्यवस्था से बचना चाहता है जो एक नई निर्भरता, खासकर चीन-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था, पैदा कर सकती है. इसलिए रूस के लिए BRICS रणनीतिक प्रतिरोध का मंच हो सकता है, लेकिन भारत के लिए यह strategic autonomy और बहुध्रुवीय कूटनीति का मंच है.

दिल्ली Summit में Global South के सामने असली चुनौती क्या?

दिल्ली Summit में भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि वह BRICS को कितनी दूर तक राजनीतिक समूह बनने देगा और कितनी मजबूती से इसे विकास, व्यापार, तकनीक, जलवायु, स्वास्थ्य और वित्त जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखेगा.

दरअसल, BRICS की ताकत इसकी विविधता है. चीन की औद्योगिक क्षमता, भारत का डिजिटल और सेवा क्षेत्र, रूस की ऊर्जा शक्ति, खाड़ी देशों की पूंजी, ब्राजील की कृषि क्षमता और अफ्रीकी देशों की क्षेत्रीय भूमिका मिलकर बड़ा आर्थिक नेटवर्क बना सकती है. लेकिन यही विविधता इसकी कमजोरी भी है.

भारत-चीन सीमा विवाद, ईरान-खाड़ी समीकरण, रूस-पश्चिम संघर्ष और अमेरिका के साथ अलग-अलग सदस्यों के रिश्ते किसी भी सामूहिक राजनीतिक बयान को कठिन बना सकते हैं.

दिल्ली ब्रिक्स Summit की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि BRICS ने अमेरिका के खिलाफ कितनी कड़ी भाषा इस्तेमाल की, बल्कि इससे कि क्या वह मतभेदों के बावजूद Global South के लिए व्यापार, विकास वित्त, भुगतान व्यवस्था और वैश्विक संस्थानों में सुधार जैसे ठोस एजेंडे पर सहमति बना पाता है. यही भारत की कूटनीतिक परीक्षा है और यही BRICS की असली उपयोगिता का पैमाना भी है.