भारत में आंदोलनों को इतिहास बहुत पुराना है. लोगों के लिए आंदोलनों के नाम केवल पहचान नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के प्रमुख सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असंतोष या सत्ता के खिलाफ विद्रोह के सिम्बल भी होते हैं. 1970 के दशक के ‘नवनिर्माण आंदोलन’ और ‘बिहार आंदोलन’ से लेकर ‘संपूर्ण क्रांति’, ‘असम आंदोलन’, ‘मंडल विरोधी आंदोलन’, 2011 के ‘अन्ना आंदोलन’, ‘किसान आंदोलन’, ‘अग्निपथ विरोधी आंदोलन’ एनआरसी-सीएए को लेकर शाहीन बाग आंदोलन, सीजेपी का आंदोलन और अब कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ तक आंदोलन की भाषा लगातार बदली है.

शुरुआत में आंदोलन अक्सर छात्र संगठनों और जमीनी समूहों के नेतृत्व में होते थे, लेकिन समय के साथ राजनीतिक दल, मीडिया और सोशल मीडिया भी आंदोलन की पहचान तय करने में महत्वपूर्ण हो गए. इसलिए नामों का यह बदलाव भारत में मुद्दों, नेतृत्व और सियासी मुद्दों को समझने का महत्वपूर्ण जरिया हो गया है.

‘नवनिर्माण आंदोलन’ ने छात्र असंतोष को राजनीति से कैसे जोड़ा?

1973-74 में गुजरात में महंगाई और हॉस्टल मेस फीस बढ़ने के खिलाफ छात्रों का विरोध शुरू हुआ. जल्द ही यह भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकार के खिलाफ व्यापक जनआंदोलन बन गया, जिसे ‘नवनिर्माण आंदोलन’ कहा गया. आंदोलन के दबाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को फरवरी 1974 में इस्तीफा देना पड़ा और विधानसभा भंग करनी पड़ी. इस आंदोलन ने यह संदेश दिया कि छात्र मुद्दे केवल कैंपस तक सीमित नहीं हैं. वे सरकार की जवाबदेही और शासन व्यवस्था का प्रश्न बन सकते हैं. गुजरात के बाद इसी प्रकार की असंतोष की लहर बिहार में दिखाई दी.

‘बिहार आंदोलन’ से ‘संपूर्ण क्रांति’ तक नाम क्यों बदला?

1974 में बिहार के छात्रों ने महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और खाद्य संकट के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. छात्रों ने जयप्रकाश नारायण यानी जेपी से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया. जेपी के जुड़ने के बाद आंदोलन का दायरा तेजी से बढ़ा और 5 जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में उन्होंने ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया. इस तरह एक क्षेत्रीय छात्र आंदोलन व्यापक राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन में बदल गया. जेपी का लक्ष्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाना था.

1975 के आपातकाल के दौर में यह आंदोलन लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक बना और 1977 में जनता पार्टी की जीत के राजनीतिक वातावरण को बनाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही.

‘असम आंदोलन’ ने छात्र राजनीति को क्षेत्रीय पहचान से कैसे जोड़ा?

1979 में असम में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन यानी AASU के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हुआ. इसका मुख्य मुद्दा मतदाता सूची में कथित विदेशी नागरिकों, विशेषकर बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों की पहचान और उन्हें हटाने की मांग थी. आंदोलन लगभग छह वर्ष चला और इसमें बंद, प्रदर्शन तथा आर्थिक गतिविधियों को बाधित करने जैसे तरीके अपनाए गए. छात्र आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक असमिया जनआंदोलन में बदल गया. 1985 के असम समझौते के बाद आंदोलन की राजनीतिक ऊर्जा ने असम गण परिषद को जन्म दिया, जिसने सत्ता भी हासिल की.

‘मंडल आंदोलन’ ने आंदोलन की भाषा में क्या बदलाव किया?

1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने के निर्णय के बाद देश के कई हिस्सों में आरक्षण विरोधी छात्र आंदोलन हुए. अब आंदोलन का केंद्र महंगाई या भ्रष्टाचार के बजाय सरकारी नौकरियों, सामाजिक न्याय, जाति और अवसरों का प्रश्न था. मंडल विरोधी आंदोलन के साथ-साथ पिछड़े वर्गों के आरक्षण के समर्थन में भी राजनीतिक लामबंदी हुई. इसके परिणामस्वरूप उत्तर भारत की राजनीति में पिछड़ी जातियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति अधिक मजबूत हुई.

‘अन्ना’ ने आंदोलन की पहचान को कैसे बदला?

2011 में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने आंदोलन की भाषा में बड़ा बदलाव किया. 2G स्पेक्ट्रम विवाद, कॉमनवेल्थ गेम्स से जुड़े आरोप और भ्रष्टाचार के खिलाफ बढ़ते जन असंतोष के बीच अन्ना हजारे ने जन लोकपाल की मांग को लेकर अनशन किया. जंतर-मंतर और बाद में रामलीला मैदान पर बड़ी भीड़ जुटी. आंदोलन को ‘अन्ना आंदोलन’ कहा गया क्योंकि एक व्यक्ति का नाम ही पूरे आंदोलन की राष्ट्रीय पहचान बन गया. गांधीवादी अनशन के साथ सोशल मीडिया, टीवी और मोबाइल संचार ने इसकी पहुंच बढ़ाई. आंदोलन ने यह भी दिखाया कि भ्रष्टाचार जैसे एक मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में बदला जा सकता है.

अन्ना आंदोलन से चुनावी राजनीति तक क्या बदलाव आया?

अन्ना आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणति यह रही कि इसके भीतर से एक समूह ने चुनावी राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया. अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी का गठन हुआ. इससे भारत में एक नया मॉडल सामने आया—सामाजिक आंदोलन से सीधे राजनीतिक पार्टी का निर्माण. यानी आंदोलन अब केवल सरकार पर दबाव डालने का माध्यम नहीं रहा; वह सत्ता प्राप्त करने की रणनीति का आधार भी बन सकता था.

2019 के बाद आंदोलनों के नाम मुद्दा-केंद्रित क्यों?

2019 के बाद CAA विरोधी आंदोलन, 2020-21 का किसान आंदोलन और 2022 का अग्निपथ विरोधी आंदोलन किसी कानून या सरकारी नीति के नाम से पहचाने गए. CAA विरोधी आंदोलन में नागरिकता और संविधान का प्रश्न प्रमुख था, किसान आंदोलन में तीन कृषि कानून और कृषि नीति का मुद्दा केंद्र में था, जबकि अग्निपथ आंदोलन में सैन्य भर्ती, रोजगार और युवाओं के भविष्य का सवाल प्रमुख रहा. इस दौर में आंदोलन की पहचान किसी नेता से अधिक किसी नीति, कानून या मांग से बनने लगी. सोशल मीडिया और हैशटैग ने इस बदलाव को और तेज किया.

‘छात्रों की गूंज’ किस नई राजनीतिक भाषा को सामने ला रही है?

2026 में कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए पेपर लीक, परीक्षा में अनियमितता, भर्ती में देरी, शिक्षा की बढ़ती लागत और रोजगार जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा है. अभियान की शुरुआत कोटा से हुई और इसे देश के अन्य प्रमुख छात्र केंद्रों तक ले जाने की योजना बनाई गई. अगस्त 2026 में इसे 800 शहरों तक विस्तार देने की रणनीति सामने आई.

इसकी खासियत यह है कि यह एक स्वतंत्र छात्र आंदोलन के बजाय एक राजनीतिक दल द्वारा संचालित राष्ट्रव्यापी अभियान है. इसका नाम भी व्यक्ति-केंद्रित न होकर सीधे ‘छात्रों’ और उनकी समस्याओं को केंद्र में रखता है.

1974 के छात्र आंदोलन और 2026 की ‘छात्रों की गूंज’ में क्या समानता है?

दोनों के मुद्दों में समय का अंतर होने के बावजूद एक महत्वपूर्ण समानता दिखाई देती है- युवा और रोजगार का संकट. 1974 में बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार छात्रों की बड़ी चिंताएं थीं; आज पेपर लीक, भर्ती में देरी, परीक्षा व्यवस्था और रोजगार युवाओं की चिंता हैं. अंतर यह है कि 1974 का आंदोलन धीरे-धीरे गैर-दलीय व्यापक राजनीतिक आंदोलन और ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान में बदल गया था, जबकि ‘छात्रों की गूंज’ एक स्थापित राजनीतिक दल का अभियान है.

2014 के बाद कौन कौन से आंदोलन?

2015 पाटीदार आरक्षण आंदोलन - हार्दिक पटेल के नेतृत्व में गुजरात में पाटीदार समुदाय के लिए आरक्षण की मांग.

2016 जाट आरक्षण आंदोलन - हरियाणा सहित उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में जाट समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन.

2016 दलित आंदोलन-ऊना आंदोलन - गुजरात के ऊना में दलित युवकों की पिटाई की घटना के बाद दलित अधिकार और सम्मान को लेकर व्यापक आंदोलन.

2016 जेएनयू छात्र आंदोलन - JNU में छात्र राजनीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस और विरोध-प्रदर्शन.

2018 भीमा कोरेगांव के बाद दलित आंदोलन - महाराष्ट्र में दलित संगठनों द्वारा विरोध और बंद; जाति एवं सामाजिक न्याय के प्रश्न प्रमुख रहे.

2019–20 CAA-NRC विरोधी आंदोलन - नागरिकता संशोधन कानून और प्रस्तावित NRC को लेकर देशभर में प्रदर्शन; शाहीन बाग इसका सबसे चर्चित केंद्र बना.

2020–21 किसान आंदोलन - तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का लंबा आंदोलन; नवंबर 2021 में केंद्र सरकार ने तीनों कानून वापस लेने की घोषणा की.

2022 अग्निपथ विरोधी आंदोलन - सेना की नई अग्निपथ भर्ती व्यवस्था के खिलाफ युवाओं का देशव्यापी विरोध, विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना आदि में.

2023 पहलवान आंदोलन - महिला पहलवानों ने तत्कालीन WFI प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन किया.

2024 NEET-UG/पेपर लीक विरोध - NEET-UG परिणाम, कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्रों का व्यापक विरोध.

2024–25 – रोजगार/परीक्षा व्यवस्था से जुड़े छात्र आंदोलन - UPSC, SSC, रेलवे, राज्य भर्ती परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों पर अलग-अलग राज्यों में छात्र विरोध लगातार दिखाई दिए.

2025–26 – छात्र-केंद्रित कॉकरोच जनता पार्टी का राजनीतिक अभियान - पेपर लीक, भर्ती में देरी, शिक्षा की लागत और रोजगार को लेकर राजनीतिक दलों ने छात्र मुद्दों को संगठित अभियान के रूप में उठाना शुरू किया. अब इसी क्रम में ‘छात्रों की गूंज’ को देखा जा सकता है.