मौत के कुछ दिन बाद आखिर कौन हथियाने में जुटा अजीत पवार की पार्टी? महाराष्ट्र की सियासत को हिलाने वाली NCP-AP का किस्सा क्या

अजीत पवार की मौत के बाद NCP-AP में सत्ता की जंग तेज हो गई है. सुनेत्रा पवार, तटकरे और पटेल के बीच कंट्रोल को लेकर उठे सवालों की पूरी कहानी पढ़ें.

( Image Source:  Suneytra praful and sunil facebook )
Curated By :  धीरेंद्र कुमार मिश्रा
Updated On : 27 March 2026 11:11 AM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में 28 जनवरी 2026 के बाद सब कुछ जैसे अचानक बदल गया. जिस पार्टी को सत्ता के गलियारों में ‘किंगमेकर’ कहा जाता था, उसी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी अजित के भीतर सन्नाटा भी था और सियासी हलचल भी. वजह थी - अजीत पवार की अचानक मौत. लेकिन राजनीति में खाली जगह कभी खाली नहीं रहती. और यही वह पल था, जब शुरू हुई एक ऐसी अंदरूनी कहानी, जिसने पूरे महाराष्ट्र की सियासत को हिला दिया.

क्यों तेज हुईं सियासी चालें?

अजीत पवार के निधन के कुछ ही दिनों के भीतर पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर तेजी से फैसले हुए. उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को पहले उपमुख्यमंत्री बनाया गया, फिर पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी भी सौंप दी गई. बाहर से देखने पर यह सब ‘सहमति’ का फैसला लग रहा था, लेकिन अंदरखाने कई परतें थीं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता (सुनील तटकरे और प्रफुल्ल पटेल) अचानक ज्यादा सक्रिय दिखने लगे. चुनाव आयोग को पत्राचार, संगठनात्मक फैसले और कानूनी रणनीति, सब कुछ उनके इर्द-गिर्द घूमता नजर आया. यहीं से शुरू हुई वह चर्चा, जिसने सियासी गलियारों में आग लगा दी. क्या पार्टी का असली कंट्रोल कहीं और शिफ्ट हो रहा है?

क्यों लगे ‘मगरमच्छ के आंसू’ वाले आरोप?

इस पूरे घटनाक्रम को और हवा तब मिली जब रोहित पवार ने आरोप लगाया कि तटकरे और पटेल, सुनेत्रा पवार से पार्टी का नियंत्रण छीनने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने इसके लिए चुनाव आयोग को लिखे गए पत्रों का हवाला दिया और कहा कि यह एक “सोची-समझी रणनीति” है.

लेकिन जवाब भी उतना ही तीखा आया. NCP-AP खेमे ने रोहित पवार के आरोपों को “मगरमच्छ के आंसू” बताया. उनका कहना था, “उन्हें अपनी पार्टी पर ध्यान देना चाहिए.” यह सीधा संकेत था कि यह सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि दो धड़ों के बीच खुली राजनीतिक जंग है.

क्या है पत्रों की राजनीति और असली खेल?

पूरे विवाद का केंद्र बना भारतीय चुनाव आयोग (ECI) को लिखा गया पत्र. सुनेत्रा पवार ने अपने पत्र में साफ लिखा कि एक निश्चित तारीख के बाद पार्टी की ओर से किसी और का पत्राचार अमान्य माना जाए. रोहित पवार ने इसी लाइन को पकड़कर आरोपों की नींव रखी.

लेकिन तटकरे और पटेल खेमे का तर्क अलग था. उनका कहना था कि जब तक अजीत पवार जीवित थे, तब से ही चुनाव आयोग से जुड़े मामलों का जिम्मा प्रफुल्ल पटेल संभाल रहे थे. इसलिए उनके निधन के बाद भी वही प्रक्रिया जारी रही. सवाल उठता है - क्या यह महज प्रशासनिक निरंतरता थी या सत्ता संतुलन बनाए रखने की रणनीति?

क्या यह परिवार बनाम संगठन की जंग है?

इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प पहलू है - परिवार और संगठन के बीच की खींचतान. एक तरफ सुनेत्रा पवार और उनके बेटे पार्थ पवार को तेजी से राजनीतिक ताकत दी गई, उन्हें राज्यसभा भेजा गया, नेतृत्व सौंपा गया. दूसरी तरफ पार्टी के अनुभवी नेता खुद को निर्णय प्रक्रिया का असली केंद्र बनाए रखना चाहते थे.

यही वजह है कि विपक्षी खेमे का आरोप है कि सुनेत्रा पवार “चेहरा” हैं, जबकि असली फैसले कहीं और से हो रहे हैं. हालांकि NCP-AP के नेता इसे सिरे से खारिज करते हैं और कहते हैं कि पार्टी में कोई मतभेद नहीं है.

पार्टी की अंदरूनी दरारें क्या?

सिर्फ बड़े आरोप ही नहीं, छोटे-छोटे घटनाक्रम भी इस बात के संकेत दे रहे हैं कि सब कुछ सामान्य नहीं है. जैसे - रूपाली चाकणकर को लेकर विवाद. पार्टी के भीतर इस बात पर मतभेद सामने आए कि उन्हें पद से हटाया जाए या नहीं. अंततः बहुमत ने हटाने का फैसला किया, लेकिन इस प्रक्रिया ने यह दिखा दिया कि पार्टी के भीतर राय एक जैसी नहीं है.

क्या यह पुरानी कहानी, नया किरदार भर है?

महाराष्ट्र की राजनीति में यह पहली बार नहीं हो रहा. शिवसेना भी इसी तरह टूट चुकी है. एक धड़ा उद्धव ठाकरे के साथ और दूसरा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में. वहां भी लड़ाई सिर्फ नेतृत्व की नहीं थी, बल्कि पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और असली विरासत की थी.

NCP में भी अब वही सवाल - असली वारिस कौन?

अगर इस पूरी कहानी को समझें, तो NCP के भीतर इस समय तीन ताकतें काम कर रही हैं. पहली सत्ता में बैठा अजीत पवार का गुट, जो हर हाल में नियंत्रण बनाए रखना चाहता है. दूसरी शरद पवार के वफादार, जो पार्टी की मूल पहचान बचाने की कोशिश में हैं. तीसरी वे नेता, जो परिस्थितियों के हिसाब से अपना पक्ष बदलने को तैयार हैं.

आगे क्या?

आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह अंदरूनी खींचतान खुलकर सामने आएगी या समझौते के जरिए दबा दी जाएगी. चुनाव आयोग और अदालत में चल रहे मामलों का फैसला भी इसमें अहम भूमिका निभाएगा.

लेकिन एक बात तय है. यह सिर्फ एक पार्टी की कहानी नहीं है. यह उस सियासत की कहानी है, जहां सत्ता, परिवार, वफादारी और महत्वाकांक्षा एक साथ टकराते हैं.

अजीत पवार की मौत ने सिर्फ एक नेता की कमी नहीं छोड़ी, बल्कि एक ऐसा सियासी शून्य पैदा कर दिया है, जिसे भरने की कोशिश में पूरी पार्टी खुद ही बिखरने के कगार पर खड़ी नजर आ रही है. महाराष्ट्र की राजनीति के लिए यह एक निर्णायक मोड़ है, जहां से या तो एक नया नेतृत्व उभरेगा, या फिर एक और बड़ी राजनीतिक टूट की कहानी लिखी जाएगी.

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