Chiraiya Review: 'तू बस चूल्हे की आग बने', Marital Rape पर घरों में बंद भयावहता को सामने लाती 'चिरैया'
'चिरैया' लखनऊ की बैकग्राउंड में बनी एक संवेदनशील कहानी है, जो शादी के बाद महिलाओं की ‘ना’ के मायने को उजागर करती है. यह सीरीज पितृसत्ता, घरेलू दबाव और सहमति जैसे मुद्दों पर सोचने को मजबूर करती है. स्टेट मिरर के लिए ये रिव्यू तनीशा टुटेजा ने किया है.
Chiraiya Review: क्या शादी के बाद भी एक औरत की 'ना' का कोई मतलब रहता है? या फिर शादी होते ही उसकी अपनी इच्छा, उसका शरीर और उसकी सहमति सब कुछ पति का हक बन जाता है? ये सवाल आज भी हमारे समाज में बहुत बड़े और असहज हैं. ज्यादातर लोग इसे 'घर की बात' कहकर टाल देते हैं और खुलकर चर्चा करने से बचते हैं. लेकिन जब कोई कहानी इन मुद्दों को सीधे सामने लाती है, तो हमें सोचना पड़ता है. ऐसी ही एक कहानी है वेब सीरीज 'चिरैया'.
'चिरैया' लखनऊ की बैकग्राउंड पर बनी एक संवेदनशील और साहसिक वेब सीरीज है, जो शादी के बाद महिलाओं की सहमति, मर्यादा, पितृसत्ता और घरेलू दबाव जैसे गहरे मुद्दों को बहुत सादगी से उठाती है. यह सीरीज सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं करती, बल्कि समाज में चली आ रही एक गलत सोच को चुनौती देती है. सीरीज की मुख्य कहानी कमलेश नाम की एक महिला के इर्द-गिर्द घूमती है. कमलेश सालों से ससुराल में रह रही हैं. बाहर से देखने में उनकी जिंदगी पूरी तरह सामान्य और ठीक-ठाक लगती है. वह घर संभालती हैं, रिश्ते निभाती हैं, सबकी बात मानती हैं और ज्यादातर चुप रहती हैं. लेकिन अंदर से वह बहुत कुछ सह रही हैं. वह जो महसूस करती हैं, उसे सालों से दबाए हुए हैं.
मैरिटल रेप को उजागर करती कहानी
कहानी तब और गहरी हो जाती है जब कमलेश की देवरानी पूजा की शादी की पहली रात को जबरदस्ती संबंध बनाए जाते हैं. पूजा रोती है, विरोध करती है, लेकिन घर के लोग उसे समझाने की बजाय कहते हैं, 'ये तो पति का हक है...इतनी बड़ी बात क्या है? ना का तो यहां सवाल ही नहीं होता.' शादी जबरदस्ती करने का लाइसेंस देती है.' ये डायलॉग सिर्फ सीरीज के किरदारों के नहीं हैं, बल्कि हमारे समाज में आज भी कई घरों में सुने जाते हैं.
परिवार की सोच से टकराव
सीरीज इन्हीं बातों को बहुत ईमानदारी से दिखाती है और हमें असहज कर देती है. कमलेश इस पूरे घटनाक्रम को देखती हैं और धीरे-धीरे उनके अंदर कुछ टूटता है. वह समझने लगती हैं कि जो चीजें वे सालों से सामान्य मानकर जी रही थीं, वे असल में गलत हैं. अब वह चुप रहना नहीं चाहती. वह सवाल पूछना शुरू कर देती है. अपनी ही परिवार की सोच से टकराती है. यह उसकी अपनी लड़ाई भी बन जाती है.
औरतों की आवाज को दबाना
सीरीज एक बहुत जरूरी बात साफ-साफ दिखाती है कि पितृसत्ता (पुरुष प्रधान सोच) सिर्फ पुरुषों द्वारा नहीं चलाई जाती. कई बार घर की महिलाएं भी इसी सोच को आगे बढ़ाती हैं. वे खुद औरत होते हुए दूसरी औरतों की आवाज दबाने में लगी रहती हैं. यह दिखाना सीरीज की बहुत बड़ी ताकत है, क्योंकि यह समस्या को सिर्फ एक तरफा नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की समस्या बताता है.
दिव्या दत्ता समेत एक्टर्स की एक्टिंग
एक्टिंग की बात करें तो दिव्या दत्ता इस सीरीज में कमलेश का किरदार निभाकर कमाल कर गई हैं. उनकी एक्टिंग बहुत सादा, सच्चा और दिल को छूने वाली है. आप उनके चेहरे पर दर्द, उलझन, डर और हिम्मत सब कुछ महसूस कर सकते हैं. प्रसन्ना बिष्ट ने पूजा के किरदार में असहायता और पीड़ा को बहुत ईमानदारी से दिखाया है. संजय मिश्रा और सरिता जोशी जैसे अनुभवी कलाकार भी अपने किरदारों में जान डाल देते हैं.
सोचने पर मजबूर करती है सीरीज
निर्देशक शशांत शाह ने इस बेहद संवेदनशील विषय को बहुत बैलेंस्ड तरीके से पेश किया है. उन्होंने इसे सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं की. घर का माहौल, रिश्तों की जटिलताएं और किरदारों की बातचीत सब कुछ बहुत वास्तविक लगता है. हालांकि 6 एपिसोड में कहानी थोड़ी खींची हुई लगी. कुछ हिस्से, खासकर LGBTQ ट्रैक, अधूरे रह गए. क्लाइमैक्स और अंत को और मजबूत बनाया जा सकता था. फिर भी 'चिरैया' एक ऐसी सीरीज है जो आपको हल्का-फुल्का एंटरटेनमेंट नहीं देती. यह आपको सोचने पर मजबूर कर देती है. यह पूछती है कि क्या शादी के नाम पर एक औरत अपनी इच्छा खो देती है? क्या उसके 'ना' कहने का हक शादी के बाद खत्म हो जाता है? ये सवाल आज भी बहुत जरूरी हैं स्टेट मिरर इसे 3/5 रेटिंग देता है.