Nasir Husain से बेइंतहा प्यार करती थीं Asha Parekh, फिर भी क्यों नहीं की शादी? मां इकट्ठा कर लिया था दहेज़

बॉलीवुड के मशहूर फिल्ममेकर नासिर हुसैन और एक्ट्रेस आशा पारेख के बीच गहरा रिश्ता था. लेकिन शादीशुदा होने की वजह से आशा ने कभी उनका घर नहीं तोड़ा और जिंदगीभर अकेले रहने का फैसला किया.

( Image Source:  Instagram: ashaparekhfc )
Edited By :  रूपाली राय
Updated On : 13 March 2026 6:30 AM IST

नासिर हुसैन (Nasir Husain) हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के एक बहुत बड़े और सफल फिल्ममेकर थे.  वे प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और लेखक के रूप में जाने जाते हैं.  उनकी जिंदगी और करियर की कहानी बहुत रोचक है. नासिर हुसैन का जन्म 16 नवंबर 1926 को भोपाल में हुआ था. उनके पिता जाफर हुसैन खान इतिहास के टीचर थे और मां आमना हाउस वाइफ थी. वे पांच भाई-बहनों में चौथे नंबर पर थे. उनका परिवार काफी रूढ़िवादी था, जहां फिल्में और थिएटर को बुरा माना जाता था. लेकिन नासिर को बचपन से ही नाटक और कहानियां लिखने का शौक था.

वे छुप-छुपाकर लोकल स्तर पर नाटक करते थे. वे किताबें पढ़ने के भी बहुत शौकीन थे. जब वे कम उम्र के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया. इसके बाद उन्हें ज्यादा आजादी मिली. वे लखनऊ चले गए और वहां से बीए की डिग्री ली. लखनऊ में उन्होंने कई छोटी कहानियां और रेडियो नाटक लिखे, कभी-कभी खुद एक्टिंग भी किया. एक उर्दू मैगजीन 'आज खल' में छपी उनकी कहानी को पहला अवार्ड मिला. बाद में उन्होंने इसी कहानी को 1967 की फिल्म 'बहारों के सपने' में इस्तेमाल किया. 

सेक्रेटरी की नौकरी करते थे नासिर  

कुछ समय तक वे सेक्रेटरी के रूप में नौकरी करते रहे. फिर वे मुंबई आ गए और फिल्म इंडस्ट्री में शामिल हुए. यहां उनकी मुलाकात फिल्ममेकर ससाधर मुखर्जी से हुई. ससाधर ने उनकी लिखने की काबिलियत देखी और उन्हें फिल्मिस्तान स्टूडियो में नौकरी दे दी. नासिर ने 1940 के अंत और 1950 के दशक में कई फिल्मों के लिए कहानी और डायलॉग लिखे. जैसे:

  • चांदनी रात (1949)
  • शबनम (1949)
  • शबिस्तान (1951)
  • शर्त (1954)

उनकी लिखी 'अनारकली' (1953) बहुत हिट हुई. लेकिन असली नाम कमाया 'मुनीम जी' (1955) और 'पेइंग गेस्ट' (1957) जैसी कॉमेडी फिल्मों से 'मुनीम जी' की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात असिस्टेंट कोरियोग्राफर मार्गरेट फ्रांसीना लुईस से हुई. दोनों को प्यार हो गया और उन्होंने शादी कर ली. मार्गरेट ने अपना नाम बदलकर आयशा खान रख लिया. उनके दो बच्चे हुए- बेटा मंसूर खान (जो बाद में डायरेक्टर बने) और बेटी नुज़हत खान. ससाधर मुखर्जी ने नासिर को पहली बार डायरेक्टर बनने का मौका दिया. फिल्म थी 'तुमसा नहीं देखा' (1957). इस फिल्म में शम्मी कपूर स्टार बने और फिल्म सुपरहिट हुई. नासिर की स्टाइल थी - खुशमिजाज हीरो, अच्छे गाने, हीरोइन को इंप्रेस करना, विलेन को हराना और हैप्पी एंडिंग. फिर आई 'दिल देके देखो' (1959) - जिसमें आशा पारेख ने डेब्यू किया. इस फिल्म ने आशा को बड़ा स्टार बना दिया. नासिर ने आशा के साथ कुल 7 फिल्में कीं:

  • जब प्यार किसी से होता है (1961)
  • फिर वही दिल लाया हूं (1963)
  • तीसरी मंजिल (1966) - (विजय आनंद ने डायरेक्ट की, लेकिन नासिर ने लिखा और प्रोड्यूस किया)
  • बहारों के सपने (1967)
  • प्यार का मौसम (1969)
  • कारवां (1971)

जब आशा पारेख को हो गया था प्यार 

नासिर और आशा पारेख के बीच गहरा प्यार हो गया. लेकिन नासिर पहले से शादीशुदा थे और बच्चे भी थे. इसलिए आशा ने कभी शादी का सोचा नहीं. वे किसी का घर नहीं तोड़ना चाहती थीं. दोनों का रिश्ता दशकों तक चला, लेकिन प्रोफेशनल तरीके से. आशा ने कभी शादी नहीं की और नासिर को अपना 'एकमात्र सच्चा प्यार' कहा. उस दौरा में भले आशा पर कितने ही लोग फ़िदा हो लेकिन आशा पारेख की जिंदगी में प्यार सिर्फ एक ही शख्स के लिए था. फिल्म निर्माता और निर्देशक नासिर हुसैन.

होम ब्रेकर नहीं बनना चाहती थी आशा 

कुल मिलाकर उन्होंने 7 फिल्मों में साथ काम किया. आशा पारेख को नासिर हुसैन से बहुत गहरा प्यार हो गया था. लेकिन एक बड़ी बात थी - नासिर हुसैन पहले से ही शादीशुदा थे और उनके बच्चे भी थे. आशा जी ने कभी भी यह नहीं चाहा कि किसी का घर टूटे या किसी को दुख पहुंचे. इसलिए उन्होंने कभी शादी का ख्याल तक नहीं किया. वे किसी का घर तोड़ने वाली नहीं बनना चाहती थी. अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द हिट गर्ल' में उन्होंने इस बारे में खुलकर बात की.

जब आशा ने खुलेआम कर दिया था हुसैन के लिए इजहार 

किताब लॉन्च के समय उन्होंने कहा था, 'हां, नासिर साहब ही एकमात्र ऐसे शख्स थे जिनसे मैंने सच में प्यार किया. अगर मैं अपनी जिंदगी के अहम लोगों के बारे में न लिखूं, तो ऑटोबायोग्राफी लिखना बेकार होता.' एक मैगजीन को दिए इंटरव्यू में उन्होंने और साफ कहा, 'मैं एक शादीशुदा आदमी से प्यार करती थी, लेकिन मैं उनका घर नहीं तोड़ना चाहती थी. मैं कभी उनके परिवार को दुखी नहीं करना चाहती थी, खासकर उनके बच्चों को इसलिए मेरे लिए अकेले रहना ज्यादा आसान और अच्छा लगा. अकेले रहना मेरे सबसे अच्छे फैसलों में से एक था.' आशा पारेख ने यह भी बताया कि वे शादी करना चाहती थीं, लेकिन सही इंसान नहीं मिला. उनकी मां को उनकी शादी की बहुत फिक्र थी. मां ने तो दहेज का सामान भी पहले से तैयार कर रखा था. कई लड़कों से मिलना-जुलना हुआ, लेकिन हर बार यही लगा कि वो उनके लिए सही नहीं हैं. बाद में नासिर ने मूवी जेम्स नाम की कंपनी शुरू की, जिसमें आशा भी शामिल हुईं. उन्होंने कई फिल्में डिस्ट्रीब्यूट कीं 'ज़बरदस्त' (1985) - ये उनकी आखिरी डायरेक्टेड फिल्म थी. 

दिल का दौरा पड़ने से निधन 

उन्हें 1996 में स्पेशल फिल्मफेयर अवॉर्ड और 2000 में ज़ी सिने लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड मिला. उनकी पत्नी आयशा का निधन 2001 में हुआ. उसके बाद आशा ने उनसे मिलना बंद कर दिया, क्योंकि नासिर पहले जैसे नहीं रहे थे. लेकिन फोन पर बात होती रही. 13 मार्च 2002 को दिल का दौरा पड़ने से नासिर हुसैन का निधन हो गया. आशा उनके अंतिम संस्कार में गईं. बाद में 2017 में अपनी किताब 'द हिट गर्ल' में उन्होंने अपनी प्रेम कहानी खुलकर बताई. 

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