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रूस से तेल खरीदना भारत के लिए बनेगा मुसीबत! US में पास हुआ सैंक्शन पैकेज, ट्रंप के 100% टैरिफ वाले मास्टरप्लान का आखिर क्या है मकसद?

अमेरिकी सीनेट ने रूस की ऊर्जा आय पर लगाम लगाने वाला सैंक्शन पैकेज पास किया है। रूस से तेल खरीदने वाले भारत पर 100% तक टैरिफ का खतरा क्यों मंडरा रहा है और ट्रंप का क्या है पूरा प्लान, जानें.

रूस से तेल खरीदना भारत के लिए बनेगा मुसीबत! US में पास हुआ सैंक्शन पैकेज, ट्रंप के 100% टैरिफ वाले मास्टरप्लान का आखिर क्या है मकसद?
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अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को रूस की ऊर्जा से होने वाली आय पर लगाम लगाने के उद्देश्य से एक व्यापक प्रतिबंध पैकेज पारित किया है. इस प्रस्तावित कानून के दायरे में भारत और चीन भी आ सकते हैं, क्योंकि दोनों देश रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं. अगर यह बिल कानून बनता है, तो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखने वाले देशों पर अमेरिका भारी टैरिफ लगा सकता है.

इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं. इसके अलावा, रूस के अधिकारियों, अरबपतियों, वित्तीय संस्थानों और उस तथाकथित 'शैडो फ्लीट' पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल मॉस्को के तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को दरकिनार करने के लिए किया जाता है.

अब यह विधेयक अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा. हालांकि, कांग्रेस के गर्मियों की छुट्टी के कारण वहां इस पर मतदान सितंबर की शुरुआत से पहले होने की उम्मीद नहीं है.

क्यों करना चाहता है अमेरिका ऐसा?

इस विधेयक के समर्थकों का कहना है कि रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई को निशाना बनाना यूक्रेन में युद्ध के लिए राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की सरकार की फंडिंग क्षमता को सीमित करने का एक अहम तरीका है. प्रस्तावित पैकेज के तहत ट्रंप को रूस से होने वाले आयात पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार भी दिया जा सकता है. इसमें रूसी तेल और गैस भी शामिल हैं. इसके साथ ही अमेरिका को उन देशों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए व्यापक अधिकार मिलेंगे, जो रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं.

अगर यह बिल मंजूर होकर कानून बन जाता है, तो रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अन्य वरिष्ठ रूसी अधिकारियों पर भी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. इस बिल का नाम दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है. उन्होंने इस कानून के लिए समर्थन जुटाने में एक साल से अधिक समय बिताया था. 11 जुलाई को उनकी मृत्यु के बाद भी इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया गया.

क्या मॉस्को हो जाएगा बातचीत के लिए मजबूर?

डेमोक्रेटिक सीनेटर जीन शाहीन ने कहा कि प्रस्तावित उपाय रूस के ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्रों पर गंभीर असर डालेंगे. शाहीन ने कहा, "व्लादिमीर पुतिन केवल ताकत को समझते हैं और वह केवल दबाव का जवाब देते हैं." उन्होंने कहा कि यह कानून मॉस्को को बातचीत की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर सकता है. उन्होंने आगे कहा, "यह कानून आखिरकार रूस की युद्ध मशीन को घुटनों पर लाने और पुतिन को बातचीत की मेज पर लाने का हमारा सबसे अच्छा मौका है."

क्या रूस पर बढ़ रहा अंतरराष्ट्रीय दबाव?

रूस के वॉशिंगटन स्थित दूतावास ने इस विधेयक की आलोचना की है. दूतावास ने कहा कि इससे अमेरिकी प्रशासन को नुकसान पहुंचेगा. इस बीच रूस पर यूरोप की ओर से भी दबाव बढ़ रहा है. यूरोपीय संघ ने हाल ही में रूस के खिलाफ अपना 21वां प्रतिबंध पैकेज मंजूर किया है. इसमें वित्तीय नेटवर्क, क्रिप्टो कंपनियों और रूस के कई अन्य अधिकारियों को निशाना बनाया गया है.

यूरोपीय संघ के नए उपायों में रूसी तेल से होने वाली आय पर प्रतिबंधों को बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है. हालांकि, इसमें आर्कटिक क्षेत्र से रूसी लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) ले जाने वाली कुछ शिपिंग कंपनियों के लिए कुछ छूट का प्रावधान भी रखा गया है.

इस तरह अमेरिका और यूरोप दोनों ही रूस की ऊर्जा आय और वित्तीय नेटवर्क पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मॉस्को की आर्थिक क्षमता और यूक्रेन में युद्ध के लिए उसकी फंडिंग को प्रभावित किया जा सके.

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