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नेपाल PM बालेन शाह का बड़ा दावा! क्या भारत की जमीन पर भी नेपाल का कब्जा? जानिए लिपुलेख-कालापानी विवाद

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने दावा किया है कि नेपाल ने भी कुछ जगहों पर भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया है. उनके बयान के बाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा विवाद फिर चर्चा में आ गया है.

नेपाल PM बालेन शाह का बड़ा दावा! क्या भारत की जमीन पर भी नेपाल का कब्जा? जानिए लिपुलेख-कालापानी विवाद
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भारत और नेपाल के बीच चल रहा सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में बड़ा बयान देते हुए कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि नेपाल ने भी कई जगह भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया है. उनके इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा विवाद पर नई बहस छिड़ गई है.

बालेन शाह ने कहा कि नेपाल सरकार इस पूरे विवाद को बातचीत और कूटनीतिक तरीके से सुलझाना चाहती है. इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में ब्रिटेन सरकार को भी शामिल किया जाएगा, क्योंकि विवाद की जड़ 1816 की सुगौली संधि से जुड़ी हुई है. अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है और नेपाल बार-बार इन इलाकों पर दावा क्यों करता है?

क्या है बालेन शाह का पूरा दावा?

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद पता चला कि भारत ही नहीं, नेपाल ने भी कुछ भारतीय जमीन पर कब्जा कर रखा है. उन्होंने कहा कि दोनों देशों को दोस्त की तरह बैठकर तथ्यों की जांच करनी चाहिए और विवाद का हल निकालना चाहिए. उन्होंने यह भी दावा किया कि नेपाल ने भारत को आधिकारिक डिप्लोमैटिक नोट भेजा है और दोनों देशों ने इतिहासकारों, सर्वेयर और विशेषज्ञों की मदद से विवाद सुलझाने पर सहमति जताई है.


क्यों चर्चा में आया UK का नाम?

बालेन शाह ने कहा कि नेपाल इस मुद्दे पर यूनाइटेड किंगडम यानी ब्रिटेन से भी बात करेगा. इसकी वजह 1816 की सुगौली संधि है, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी. नेपाल का मानना है कि इसी संधि के आधार पर महाकाली नदी सीमा तय करती है और उसके हिसाब से लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल के हिस्से में आते हैं. इसलिए नेपाल चाहता है कि ब्रिटेन भी इस ऐतिहासिक विवाद में दिलचस्पी ले.

क्या है सुगौली संधि?

1816 में नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सुगौली संधि हुई थी. इसी समझौते के तहत नेपाल की पश्चिमी सीमा महाकाली नदी तय की गई थी. यहीं से विवाद शुरू होता है, क्योंकि दोनों देशों की महाकाली नदी की वास्तविक उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग व्याख्या है. नेपाल कहता है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए उससे जुड़े इलाके नेपाल के हैं. वहीं भारत का दावा है कि वर्तमान सीमा ऐतिहासिक और प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार सही है.

आखिर क्या है लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा विवाद?

1. कालापानी विवाद

कालापानी उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पास स्थित रणनीतिक इलाका है. भारत यहां 1950 के दशक से सुरक्षा चौकी बनाए हुए है. 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद यह इलाका सामरिक रूप से और महत्वपूर्ण हो गया. नेपाल का दावा है कि यह क्षेत्र उसकी सीमा में आता है, क्योंकि महाकाली नदी का मूल स्रोत नेपाल की ओर पड़ता है.

2. लिपुलेख दर्रा क्यों अहम?

लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन के बीच बेहद अहम रणनीतिक और व्यापारिक मार्ग माना जाता है. कैलाश मानसरोवर यात्रा भी इसी रास्ते से होती है. भारत ने यहां सड़क निर्माण किया था, जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताई थी. नेपाल का कहना है कि यह इलाका उसके नक्शे का हिस्सा है.

3. लिम्पियाधुरा पर विवाद

नेपाल का दावा है कि लिम्पियाधुरा महाकाली नदी का असली उद्गम स्थल है. इसी आधार पर वह कालापानी और लिपुलेख पर भी अपना दावा मजबूत करता है. भारत इन दावों को खारिज करते हुए कहता है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं और दशकों से भारतीय प्रशासन के नियंत्रण में हैं.

2020 में क्यों बढ़ गया था विवाद?

2020 में नेपाल की तत्कालीन केपी शर्मा ओली सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था. इस नक्शे में कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया. इसके बाद नेपाल ने नए नोटों और सरकारी दस्तावेजों में भी इन इलाकों को शामिल किया. भारत ने इसे “एकतरफा और कृत्रिम दावा” बताते हुए खारिज कर दिया था.

भारत का क्या है रुख?

भारत लगातार कहता रहा है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं हैं. भारत का कहना है कि सीमा विवाद का समाधान सिर्फ द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में कहा कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग रहा है और यह कोई नया मामला नहीं है.

नेपाल के पूर्व राजदूतों ने क्यों उठाए सवाल?

नेपाल के पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य और दीप कुमार उपाध्याय ने बालेन शाह के बयान पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है. उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल सीमा विवाद का लगभग 97 प्रतिशत हिस्सा पहले ही सुलझाया जा चुका है और बाकी मुद्दों पर बातचीत जारी है.

क्या है ‘Cross-Border Occupation’ वाला नया दावा?

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री के बयान का बचाव करते हुए कहा कि तकनीकी अध्ययन में कुछ जगहों पर ऐसी स्थिति मिली है, जहां नेपाल द्वारा इस्तेमाल की जा रही जमीन भारत की ओर और भारत द्वारा इस्तेमाल की जा रही जमीन नेपाल की ओर पाई गई है. मंत्रालय ने इसे “Cross-Border Occupation” बताया और कहा कि ऐसे मामलों का समाधान बातचीत से ही संभव है.

क्यों संवेदनशील है यह पूरा मामला?

भारत और नेपाल के रिश्ते सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक रूप से बेहद गहरे हैं. दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और लाखों लोग रोजाना आवाजाही करते हैं. ऐसे में सीमा विवाद का मुद्दा राजनीतिक और रणनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है. अब सबकी नजर भारत की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हुई है. देखना होगा कि बालेन शाह के बयान के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत आगे किस दिशा में बढ़ती है.

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