Begin typing your search...

जलती सिगरेट और कीलें चुभाना, पिता के सामने फिलिस्तीनी बच्चों को क्यों और कैसे टॉर्चर कर रहा इजराइल?

गाजा पट्टी में एक 18 महीने के मासूम बच्चे के साथ बर्बरता की गई. बच्चे के शरीर को जलती सिगरेट से दागा गया. वहीं, उन पर कीले चुभाईं गई. इतना ही नहीं, यह सबकुछ उनके पिता के सामने किया गया.

जलती सिगरेट और कीलें चुभाना, पिता के सामने फिलिस्तीनी बच्चों को क्यों और कैसे टॉर्चर कर रहा इजराइल?
X
( Image Source:  ANI )
हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत4 Mins Read

Updated on: 28 March 2026 4:09 PM IST

गाजा में जारी संघर्ष के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है. एक मासूम बच्चे को उसके पिता के सामने ही कथित तौर पर अमानवीय यातनाएं दी गईं, जलती सिगरेट से दागना और शरीर में नुकीली चीजें चुभाना जैसे गंभीर आरोप सामने आए हैं. इस घटना ने न सिर्फ युद्ध की क्रूरता को उजागर किया है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा किया है कि आखिर बच्चों को निशाना बनाकर इस तरह की कार्रवाई क्यों की जा रही है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस तरह की यातनाओं का मकसद परिजनों पर दबाव बनाकर उनसे जबरन जानकारी या कबूलनामा हासिल करना बताया जा रहा है. हालांकि, इन आरोपों को लेकर अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी दलीलें हैं, लेकिन इस घटना ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है.

मासूम को निशाना बनाकर पिता पर दबाव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बच्चे को उसके पिता से अलग कर दिया गया और फिर उसे उनके सामने ही प्रताड़ित किया गया. मकसद था पिता से जबरन कबूलनामा लेना. एक बेबस पिता अपने बच्चे को दर्द में तड़पते हुए देखता रहा, लेकिन कुछ कर नहीं सका. यह मानसिक और शारीरिक दोनों तरह का अत्याचार था.

जलती सिगरेट से दागे बच्चों के शरीर

सबसे भयावह हिस्सा यह रहा कि बच्चे के नन्हे और कोमल शरीर को भी नहीं बख्शा गया. जलती सिगरेट से उसे बार-बार दागा गया, जिससे उसके पैरों और शरीर पर गोल-गोल गहरे जलने के निशान उभर आए. हद तो तब हो गई जब दर्द से तड़पते उस मासूम की चीखें भी इन क्रूर हरकतों को रोक नहीं सकीं. यह सिर्फ शारीरिक यातना नहीं, बल्कि इंसानियत की सारी सीमाओं को पार कर देने वाली अमानवीय क्रूरता की मिसाल है.

नुकीली चीजें चुभाई

इतना ही नहीं, सामने आई रिपोर्ट्स के मुताबिक उस मासूम को और भी अमानवीय यातना दी गई. उसके नाजुक शरीर में नुकीली चीजें चुभाई गईं, जिससे उसे असहनीय दर्द सहना पड़ा. वह बच्चा घंटों तक तड़पता रहा, लेकिन यह क्रूरता रुकने का नाम नहीं ले रही थी. हद तो तब हो गई जब यह सिलसिला कुछ मिनटों का नहीं, बल्कि कई घंटों तक चलता रहा.

घंटों तक चला टॉर्चर

करीब 10 घंटे तक चली इस भयावह यातना के बाद आखिरकार उस मासूम बच्चे को उसके परिवार को सौंप दिया गया, लेकिन तब तक वह पूरी तरह से टूट चुका था. मेडिकल जांच में उसके शरीर पर जलने के गहरे निशान, सूजन और कई जगह चोटों की पुष्टि हुई, जो इस बात का सबूत हैं कि उसने कितनी भयानक पीड़ा झेलीय लेकिन असली नुकसान सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं है. इतनी छोटी उम्र में झेला गया डर, दर्द और भय उसके मन पर गहरी छाप छोड़ सकता है.

सिर्फ एक घटना नहीं, बड़ा सवाल

यह मामला अकेला नहीं है. युद्ध के दौरान कई बार ऐसे आरोप सामने आए हैं कि कैदियों से जानकारी निकालने के लिए अमानवीय तरीकों का इस्तेमाल किया गया. खासकर बच्चों को निशाना बनाना इस पूरे संघर्ष को और भी क्रूर बना देता है. युद्ध हमेशा सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को पहुंचाता है, जिनका उससे कोई लेना-देना नहीं होता है. यह घटना बताती है कि संघर्ष की कीमत सिर्फ जमीन या राजनीति नहीं, बल्कि इंसानियत भी चुकाती है. अब सवाल यह है कि क्या ऐसी घटनाओं पर वैश्विक स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएंगे या ये कहानियां सिर्फ खबर बनकर रह जाएंगी.

अगला लेख