देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया था, लेकिन अमृत से पहले हलाहल विष निकला. इस विष को शिवजी ने कंठ में धारण कर लिया. यह शक्ति आगे चलकर द्वापर युग में अश्वत्थामा के रूप में प्रकट हुई. इन्हें विष पुरुष का पुनर्जन्म भी कहा जाता है.