लोकतंत्र के इस बड़े महापर्व का सबसे निर्णायक दौर अब आ गया है. असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव प्रचार का शोर अब थम चुका है. शाम ढलते ही लाउडस्पीकर भी शांत हो गए हैं और अब बारी है जनता के खामोश फैसले की. लेकिन इस सन्नाटे के पीछे सियासी गलियारों में हलचल तेज है, जिसने कई बड़े नेताओं की नींद उड़ा दी है. इन तीनों राज्यों के नतीजे सिर्फ यहां की राजनीति का भविष्य तय नहीं करेंगे, बल्कि देश की सियासत का संतुलन भी बदल सकते हैं. अगर कांग्रेस पार्टी की बात करें, तो उसके लिए यह चुनाव किसी अस्तित्व की लड़ाई जैसा है. केरल और असम जैसे राज्यों में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी दल नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर चल रही खींचतान और अंदरूनी कलह है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट बंटवारे से लेकर स्थानीय नेताओं के बीच टकराव तक, यह अंदरूनी संघर्ष कांग्रेस की चुनावी रणनीति को नुकसान पहुंचा सकता है. अगर कार्यकर्ताओं की यह नाराजगी मतदान के दिन ‘अंदरूनी नुकसान’ में बदल गई, तो कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.