Maa Adibadri Bhagwati Temple Fire: जहां मां भगवती ने राक्षस निशुंभ का किया था वध, उसी मंदिर में नवरात्रि में लगी भीषण आग, ऐसी है कहानी
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के बडियाकोट स्थित ऐतिहासिक मां भगवती मंदिर में नवरात्रि के दौरान भीषण आग लग गई. हादसे में मंदिर की मूर्ति और लकड़ी से बना अधिकांश ढांचा नष्ट हो गया. अपनी बारीक नक्काशी और पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. आग लगने के कारणों की जांच जारी है.
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के बडियाकोट स्थित ऐतिहासिक मां भगवती मंदिर में गुरुवार को भीषण आग लग गई. इसके कारण भारी नुकसान हुआ है. आग की चपेट में आने से मंदिर की मूर्ति और लकड़ी से बना अधिकांश ढांचा नष्ट हो गया. अपनी अनूठी लकड़ी की नक्काशी और धार्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर में नवरात्रि के छठे दिन श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचे थे. घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोग दुख जता रहे हैं. आग लगने के कारणों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. इसी स्थान की खास बात है कि यहां पर माता ने असुर निशुंभ का वध भी किया था.
बागेश्वर जिले के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में स्थित मां भगवती मंदिर स्थानीय लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है. मंदिर की पहचान इसकी पारंपरिक लकड़ी की बनावट, बारीक नक्काशी और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी है.
यहां दूर-दराज के गांवों के अलावा दूसरे क्षेत्रों से भी श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. नवरात्रि के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक उत्साह रहता है और भक्त मां भगवती की आराधना करते हैं. ऐसे में नवरात्रि के पावन अवसर पर मंदिर में आग लगने की घटना से स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं को गहरा झटका लगा है. आग तेजी से लकड़ी के ढांचे में फैल गई, जिससे मंदिर को भारी नुकसान पहुंचा.
इस स्थान पर किया था निशुंभ राक्षस का वध
स्थानीय मान्यता के अनुसार,मां भगवती ने इसी स्थान पर राक्षस निशुम्भ का वध किया था.इसी मान्यता के आधार पर इस क्षेत्र का पुराना नाम 'वधकोट'बताया जाता है, जो समय के साथ बदलकर बडियाकोट के रूप में प्रचलित हुआ.
पौराणिक कथाओं में निशुम्भ और उसके भाई शुम्भ को ऐसे असुरों के रूप में वर्णित किया गया है, जिन्होंने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था. इसके बाद देवताओं ने आदिशक्ति से मदद मांगी. देवी महात्म्य में देवी दुर्गा और इन असुरों के बीच हुए युद्ध का वर्णन मिलता है. स्थानीय धार्मिक परंपरा में मां भगवती मंदिर को इसी पौराणिक प्रसंग से जोड़कर देखा जाता है. यही मान्यता मंदिर को क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व देती है.
कुमाऊं क्षेत्र में यह अकेला ऐसा अनूठा मंदिर माना जाता है, जहां मां भगवती (नंदा भगवती) के साथ-साथ तिब्बतियों के हूण देवता और लाटू देवता की भी संयुक्त रूप से पूजा-अर्चना की जाती है. हर साल विशेषकर नवरात्रि और नंदा अष्टमी के पावन पर्व पर यहां विशाल मेलों का आयोजन होता है, जहां दूर-दूर से श्रद्धालु माता का आशीर्वाद लेने आते हैं. यह मंदिर न केवल स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और सामाजिक समरसता की अमूल्य विरासत को भी संजोए हुए है.
बागेश्वर से सड़क मार्ग द्वारा आप टैक्सी या बस से कपकोट (लगभग 23 किमी) पहुंचेंगे। कपकोट से आगे का सफर पहाड़ी रास्तों से होते हुए बदियाकोट गांव तक जाता है, जो कपकोट से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह मार्ग बेहद खूबसूरत वादियों, घने जंगलों और पिंडर घाटी के मनमोहक दृश्यों से होकर गुजरता है, जो आपकी धार्मिक यात्रा को और भी रोमांचक बना देता है.
दुर्गम इलाके में आग बुझाना बना चुनौती
मंदिर में आग लगने की सूचना मिलते ही पुलिस और दमकलकर्मी मौके पर पहुंचे. हालांकि, मंदिर की दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण राहत और बचाव कार्य में चुनौतियां सामने आईं. बडियाकोट, कपकोट से लगभग 50 किलोमीटर दूर पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है, जहां अग्निशमन सुविधाओं तक पहुंचना आसान नहीं है.
स्थानीय स्तर पर पूजा के दौरान जलाए गए दीपक से आग लगने की आशंका जताई गई. बिजली के शॉर्ट सर्किट को भी संभावित कारण बताया गया है.उपमंडल मजिस्ट्रेट अनिल चान्याल के अनुसार, अधिकारी घटना की जांच कर रहे हैं.
कपकोट ब्लॉक के पूर्व प्रमुख गोविंद सिंह दानू और स्थानीय लोगों ने आग लगने की उच्चस्तरीय जांच कराने और मंदिर को हुए नुकसान का सही आकलन करने की मांग की है.
आग की लपटों के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद कई लोगों ने ऐतिहासिक मंदिर को हुए नुकसान पर दुख जताया. कुछ लोगों ने इस घटना को धार्मिक दृष्टि से देखते हुए अपनी प्रतिक्रियाएं दीं, जबकि कुछ ने इसे स्थानीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी क्षति बताया.




