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जानवरों की हड्डी से बनते हैं शोपीस, मुगल काल से चली आ रही Bone Carving क्या?

जानवरों की हड्डियों से बने खूबसूरत शोपीस आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं. बोन कार्विंग एक ऐसी पारंपरिक कला है, जिसकी शुरुआत मुगल काल से मानी जाती है और जो समय के साथ बदलते हुए आज भी जिंदा है. यह कला न सिर्फ हड्डियों को शानदार कलाकृतियों में बदलती है, बल्कि “वेस्ट से बेस्ट” का बेहतरीन उदाहरण भी पेश करती है.

जानवरों की हड्डी से बनते हैं शोपीस, मुगल काल से चली आ रही Bone Carving क्या?
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हेमा पंत
Edited By: हेमा पंत10 Mins Read

Updated on: 18 March 2026 8:00 AM IST

क्या आपने कभी सोचा है कि जिन जानवरों की हड्डियों को आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, वही किसी कलाकार के हाथों में जाकर लाखों की कीमत वाली कलाकृति बन सकती हैं? सुनने में यह किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में यह हकीकत है. यहां आज भी कुछ कारीगर ऐसी अनोखी कला को जिंदा रखे हुए हैं, जिसे ‘बोन कार्विंग’ यानी हड्डियों पर नक्काशी कहा जाता है.

यह सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा, मेहनत, धैर्य और हुनर की मिसाल है. समय के साथ जहां कई पारंपरिक कलाएं खत्म हो गईं, वहीं यह कला आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है.

लखनऊ की गलियों से शुरू होती है एक अनोखी कला

पुराने लखनऊ की तंग गलियों में जब आप गुजरते हैं, तो कहीं न कहीं छोटे-छोटे वर्कशॉप दिखाई दे जाएंगे. बाहर से देखने पर यह सामान्य दुकानें लगती हैं, लेकिन अंदर बैठे कारीगर बेहद बारीकी से हड्डियों को तराशकर खूबसूरत डिजाइन बना रहे होते हैं. यहां काम करने वाले ज्यादातर कारीगर पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हुए हैं. दादा से पिता और पिता से बेटे तक यह हुनर विरासत में मिलता रहा है. आज भी करीब 200 कारीगर इस कला को जिंदा रखे हुए हैं.

भारत में कितना पुराना है बोन कार्विंग का इतिहास?

भारत में बोन कार्विंग का इतिहास सैकड़ों साल पुराना माना जाता है, खासकर मुगलकाल से इसका संबंध जोड़ा जाता है. हालांकि इससे भी पहले दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में यह कला मौजूद थी.

मुगलकाल से नवाबी दौर तक का सफर

इस कला की जड़ें इतिहास में काफी गहराई तक जाती हैं. माना जाता है कि इसकी शुरुआत मुगलकाल में हुई थी. उस समय हाथी के दांत यानी आइवरी पर नक्काशी की जाती थी. यह शाही शौक माना जाता था और इससे शतरंज की गोटियां, सजावटी सामान और खास गिफ्ट तैयार किए जाते थे. नवाबों के दौर में इस कला को और ज्यादा सम्मान मिला. नवाबों ने कारीगरों को संरक्षण दिया, जिससे यह कला फलती-फूलती रही. उस समय बनाई गई कलाकृतियां शाही महलों की शोभा बढ़ाती थीं.

1980 के बाद आया बड़ा बदलाव

समय के साथ कानून और पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ी. 1980 में वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन कानून लागू होने के बाद हाथी के दांत पर नक्काशी पूरी तरह बंद कर दी गई. यह इस कला के लिए एक बड़ा झटका था, लेकिन कारीगरों ने हार नहीं मानी. उन्होंने ऊंट की हड्डियों पर काम शुरू किया. बाद में जब ऊंट की हड्डियां भी कम मिलने लगीं, तो भैंस की हड्डियों का इस्तेमाल होने लगा. इस बदलाव ने यह साबित किया कि कला परिस्थितियों के साथ खुद को ढाल सकती है.

कैसे बनती है हड्डियों पर नक्काशी?

बोन कार्विंग कोई आसान काम नहीं है. इसके लिए बहुत ज्यादा धैर्य, ध्यान और एक्सपीरियंस की जरूरत होती है. इसे बनाने के लिए सबसे पहले हड्डियों को अच्छी तरह साफ किया जाता है. फिर उन्हें सुखाया जाता है ताकि उनमें कोई नमी न रहे. उसके बाद उन्हें अलग-अलग आकार में काटा जाता है. कारीगर हथौड़ी और छेनी की मदद से बारीक नक्काशी करते हैं और आखिर में उसे पॉलिश और फिनिशिंग दी जाती है. कई बार एक छोटी सी कलाकृति बनाने में भी कई दिन लग जाते हैं, जबकि बड़े मास्टरपीस तैयार करने में हफ्तों का समय लग सकता है.

किन-किन चीजों में बदल जाती हैं हड्डियां?

जब कारीगर अपनी कला दिखाते हैं, तो वही साधारण हड्डियां बेहद खूबसूरत सजावटी सामान में बदल जाती हैं. हड्डियों से बनने वाले आर्ट डिजाइन में सबसे ज्यादा फेमस स्टैंडिंग लैंप, ज्वेलरी बॉक्स, फोटो फ्रेम, चेस बोर्ड, शोपीस और मूर्तियां कान के झुमके (झाला), मोबाइल स्टैंड है. हालांकि, इनमें सबसे ज्यादा मांग ज्वेलरी बॉक्स, फोटो फ्रेम और लैंप की होती है.

कीमत सुनकर चौंक जाएंगे

इस कला की खासियत यह है कि इसकी कीमत बहुत कम से लेकर बहुत ज्यादा तक हो सकती है. छोटे झुमके करीब 100 रुपये में मिल जाते हैं. वहीं, मीडियम डेकोरेशन आइटम का सामान हजार रुपये से शुरू है, लेकिन जरा थमिए. स्टैंडिंग लैंप यानी मास्टरपीस की कीमत सुन आप दंग रह जाएंगे. देखने में भले ही आपको सिर्फ लैंप लगे, लेकिन यह चीज मार्केट में 2 लाख रुपये में बिकती है. करीब 5 फीट ऊंचे स्टैंडिंग लैंप पर की गई नक्काशी इतनी बारीक होती है कि देखने वाला दंग रह जाता है.

देश से विदेश तक है डिमांड

जब कारीगर अपनी मेहनत से हड्डियों को तराशकर खूबसूरत कलाकृतियों में बदलते हैं, तो शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं होता कि उनका बनाया सामान कितनी दूर तक जाएगा. छोटी-सी वर्कशॉप में तैयार हुआ एक ज्वेलरी बॉक्स या फोटो फ्रेम सिर्फ किसी लोकल दुकान तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि अपनी खास पहचान के साथ बड़े शहरों की शो-रूम तक पहुंच जाता है. इन नाजुक नक्काशी वाले प्रोडक्ट्स का सफर देश की सीमाओं को भी पार कर जाता है. कभी ये अमेरिका के किसी घर की शोभा बढ़ाते हैं, तो कभी दुबई या सऊदी अरब के शानदार इंटीरियर का हिस्सा बनते हैं. हांगकांग जैसे शहरों में भी इनकी मांग बनी रहती है.

क्या इसके लिए जानवरों को मारा जाता है?

यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है. असलियत यह है कि इस कला में जानवरों को मारकर हड्डियां नहीं ली जातीं. कारीगर सिर्फ स्लॉटर हाउस से मिलने वाली हड्डियां या प्राकृतिक रूप से मरे जानवरों की हड्डियां का ही इस्तेमाल करते हैं. इसलिए यह कला पूरी तरह से रिसाइकलिंग पर आधारित मानी जाती है.

क्या यह पर्यावरण के लिए फायदेमंद है?

जी हां, कई मायनों में यह कला पर्यावरण के लिए फायदेमंद है. बेकार हड्डियों का दोबारा उपयोग होता है. कचरा कम होता है प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल होता है. यह एक तरह से “वेस्ट टू बेस्ट” का शानदार उदाहरण है.

दुनिया में कितनी पुरानी है यह कला?

अगर वैश्विक स्तर पर देखें, तो हड्डियों पर नक्काशी हजारों साल पुरानी है. प्रागैतिहासिक काल में भी हड्डियों से औजार और मूर्तियां बनाई जाती थीं वैज्ञानिकों को लगभग 50,000 साल पुरानी हड्डी की नक्काशी के प्रमाण मिले हैं मध्यकालीन यूरोप में भी इसका खूब इस्तेमाल होता था इससे साफ है कि यह कला इंसानी सभ्यता के साथ-साथ विकसित हुई है.

रोजगार का बड़ा जरिया कैसे है यह कला?

आज के दौर में बोन कार्विंग सिर्फ एक पारंपरिक कला भर नहीं रह गई है, बल्कि यह कई परिवारों की रोजी-रोटी का मजबूत आधार बन चुकी है. लखनऊ में इस कला से जुड़े कारीगरों को सीधे तौर पर काम मिलता है, जिससे उन्हें स्थायी आय का सहारा मिलता है. खास बात यह है कि यह हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ रहा है, जिससे नई पीढ़ी को भी इसे सीखने और अपने करियर के रूप में अपनाने का मौका मिल रहा है. लखनऊ में करीब 200 परिवार इसी कला के जरिए अपना गुजारा कर रहे हैं, जो यह दिखाता है कि पारंपरिक हुनर आज भी आधुनिक समय में रोजगार का बड़ा जरिया बन सकता है.

चुनौतियां भी कम नहीं हैं

यह कला आज भी अपनी पहचान बनाए हुए है, लेकिन इसके सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं. सबसे बड़ी समस्या यह है कि नई पीढ़ी का रुझान धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. युवा अब पारंपरिक कामों की बजाय जल्दी कमाई वाले मॉर्डन ऑप्शन को ज्यादा चुन रहे हैं, जिससे इस हुनर को आगे बढ़ाने वाले हाथ कम होते जा रहे हैं. इसके अलावा बाजार में मशीन से बने सस्ते और तेजी से तैयार होने वाले प्रोडक्ट्स ने भी कारीगरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. हाथ से बनी कलाकृतियों में समय और मेहनत ज्यादा लगती है, लेकिन ग्राहक अक्सर सस्ते विकल्प चुन लेते हैं. साथ ही कच्चे माल की कमी और सीमित बाजार तक पहुंच भी इस कला की रफ्तार को धीमा कर रही है. अगर इन समस्याओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह अनमोल विरासत धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच सकती है.

क्या किया जा सकता है इसे बचाने के लिए?

इस खास कला को बचाने के लिए कुछ आसान और जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं. सरकार अगर कारीगरों को मदद और योजनाएं दे, तो उन्हें काम जारी रखने में सहारा मिलेगा. साथ ही, इस कला को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाया जाए, ताकि ज्यादा लोग इसके बारे में जान सकें और इसे खरीदें. कारीगरों को नई ट्रेनिंग और आर्थिक मदद देना भी बहुत जरूरी है. इसके अलावा, स्कूल और कॉलेज में इस कला के बारे में जागरूकता बढ़ाई जाए, ताकि नई पीढ़ी भी इसे समझे और सीखे.

बोन कार्विंग सिर्फ हड्डियों पर की जाने वाली नक्काशी नहीं है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और कला का खूबसूरत मेल है. यह हमें सिखाती है कि जिन चीजों को हम बेकार समझते हैं, उनमें भी बहुत संभावनाएं छिपी होती हैं. लखनऊ की यह अनोखी कला आज भी अपनी अलग पहचान रखती है. जरूरत है इसे समझने, सराहने और आगे बढ़ाने की, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस खास हुनर को देख सकें और सीख सकें.

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