Begin typing your search...

अंग्रेजों का वो कानून जिससे पैदा होते ही बन जाते अपराधी, सेक्स वर्कर बनीं महिलाएं, कहानी दिल्ली से थोड़ी दूर इस गांव की

अंग्रेजों के दौर का एक कानून आज भी कई जिंदगियों पर असर डाल रहा है. 1871 का ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ ऐसा ही कानून था, जिसने कई समुदायों को जन्म से ही अपराधी घोषित कर दिया और उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. दिल्ली से कुछ दूरी पर बसे एक गांव की यह कहानी दिखाती है कि कैसे गरीबी, भेदभाव और इतिहास की गलतियों ने महिलाओं को मजबूरी में सेक्स वर्क की ओर धकेल दिया.

scared woman
X

घेघोली गांव की महिलाएं कैसे बनी सेक्स वर्कर 

हेमा पंत
By: हेमा पंत6 Mins Read

Updated on: 17 April 2026 3:05 PM IST

दिल्ली से महज 3 घंटे की दूरी पर राजस्थान का अलवर जिला है. यहां एक गांव है घेघोली, जहां सड़क के किनारे राजकुमारी जैसे सैकड़ों नाम इंतज़ार करते हैं. गोद में दुधमुंहा बच्चा, घर पर बीमार परिवार और सिर पर कर्ज का बोझ. राजकुमारी कोई एक औरत नहीं, बल्कि भारत की उन 30 लाख सेक्स वर्कर्स में से एक है, जिनके लिए ये पेशा पसंद नहीं, मजबूरी है. ये कहानी सिर्फ जिस्म बेचने की नहीं है.

यह आर्टिकल डीडब्लू के यूट्यूब डॉक्यूमेंट्री में दिखाए गए इंटरव्यू पर आधारित है. ये कहानी है 1871 के ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ की, उस जातिगत भेदभाव की, जिसने कभी नाच-गाने वाले कलाकारों को ‘पैदाइशी अपराधी’ का ठप्पा लगा दिया. ये कहानी है अनिता, रोशनी और सुनिता की, जो स्कूल जाना चाहती हैं, एयर होस्टेस बनना चाहती हैं, लेकिन गरीबी और समाज का तिरस्कार उन्हें उसी दलदल में धकेल देता है.

घेघोली: वो गांव जहां ‘सेक्स वर्क’ विरासत बन गया

अलवर जिले का घेघोली गांव बाहर से किसी आम राजस्थानी गांव जैसा दिखता है, कच्चे-पक्के घर, खेत, और गलियों में खेलते बच्चे. लेकिन यहां की हकीकत अलग है. यहां नट, बेड़िया, बंजारा और कंजर समुदाय की महिलाएं पीढ़ियों से सेक्स वर्क से जुड़ी हैं. अनिता ने अपना असली नाम छुपाने की शर्त पर बात की. उम्र कानूनी तौर पर 18+ है, पर चेहरे से 15 की लगती है. तीन साल पहले इस पेशे में आई.“पसंद से आई हूं,” वो कहती है, “क्योंकि घर में खाने को नहीं था. पापा से पता चला कि बुआ भी यही काम करती थी.” आज अनिता महीने के 60-70 हजार कमाती है. इसी से घर चलता है, बहन की शादी की तैयारी है, और करीब 90 हजार का कर्ज भी उतार चुकी है.“बैंक लोन नहीं देता. बोलते हैं सेक्स वर्क काम नहीं है. फिर साहूकार से पैसा लेना पड़ता है. ब्याज इतना कि गरीबी कभी पीछा नहीं छोड़ती.”

रोशनी की कहानी

रोशनी 7 भाई-बहनों में सबसे बड़ी है. उन्हें15 साल की उम्र में समझ आया था कि मां मुंबई के होटलों में क्यों जाती है.छोटे भाई-बहन भीख मांगते थे. मां अकेली कमाती थी. ऐसे में रोशनी ने एक दिन कहा कि वह सबकुछ संभालेगी. रोशनी ने बताया कि एक बार वह मुंबई में एजेंट के जरिए गई. वहां एक ग्राहक ने पैसे देने के बजाय उसे मारा, कपड़े छीन लिए. वह नंगी सड़क पर उसके पीछे भागी. उससे ज्यादा बेइज्जती कुछ नहीं थी. आज रोशनी की एक ही उम्मीद है कि उसकी बेटी पढ़-लिखकर इस दलदल से निकले.

जब कलाकार ‘अपराधी’ बना दिए गए

घेघोली की औरतें अचानक सेक्स वर्क में नहीं आईं. इसकी जड़ें 1871 में हैं, जब अंग्रेजों ने ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ लागू किया. ब्रिटिश सरकार को खानाबदोश जातियों नट, बेड़िया, बंजारा, कंजर से खतरा लगता था. ये लोग नाच-गाना, कलाबाजी, जादू दिखाकर पेट पालते थे. घुमंतू होने की वजह से अंग्रेजों का उन पर कंट्रोल नहीं था. इसलिए 1871 में इन्हें ‘जन्मजात अपराधी’ घोषित कर दिया गया.

असर क्या हुआ?

इन जातियों के लोगों को पुलिस थाने में हाजिरी देनी पड़ती थी. बिना इजाजत गांव छोड़ नहीं सकते थे. बच्चे पैदा होते ही ‘अपराधी’ का ठप्पा लग जाता था. 1947 में आज़ादी के बाद ये कानून हटा, लेकिन समाज की सोच नहीं बदली. इन जातियों को आज भी ‘नीची जात’ कहकर दुत्कारा जाता है. नौकरी कोई नहीं देता. स्कूल में बच्चे के बगल में कोई नहीं बैठता. राशन कार्ड, पहचान पत्र बनवाने में मुश्किल होती है, क्योंकि कई बच्चों को पिता का नाम नहीं पता.

घेघोली में बदलते हालात

NGO की मदद से घेघोली में कुछ बच्चे पढ़ रहे हैं. टीचर गुड्डू नागर खुद इसी समुदाय से हैं. उन्होंने बताया कि 'मेरे 4 भाई अनपढ़ हैं. मैं खुद पढ़ा, फिर रिश्तेदारों को पढ़ाया.' आज उनकी वजह से एक लड़की पुलिस में है, दो लड़कियां डॉक्टर बन रही हैं. उनके परिवार की कोई महिला अब सेक्स वर्क नहीं करती.

प्रॉस्ट्यूशन का काला सच

सेक्स वर्क की सबसे क्रूर सच्चाई बुढ़ापे में दिखती है. जहां सुनीता की इकलौती बेटी भी सेक्स वर्कर थी. सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज से उसकी मौत हो गई. वह बताती है कि अब उनका कोई नहीं है.

भारत में सेक्स वर्क: कानून क्या कहता है?

भारत में सेक्स वर्क को लेकर बहुत कन्फ्यूजन है. अगर आप बालिग हैं और अपनी मर्जी से कर रहे हैं तो कानूनी है. सार्वजनिक जगह पर ग्राहक ढूंढना, वेश्यालय चलाना, दलाली/पिम्पिंगगैर गैर कानूनी है. ह्यूमन ट्रैफिकिं गंभीर अपराध की कैटगरी में आता है. यानी राजकुमारी का सड़क पर खड़ा होना गैर-कानूनी है, लेकिन बंद कमरे में काम करना कानूनी है. इसी दोहरेपन की वजह से पुलिस का शोषण, वसूली और हिंसा आम है.

पेशा कितना पुराना है?

हालांकि, इस पेशे को लेकर कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है, लेकिन UNAIDS और NGO की रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में 15 से 35 साल की उम्र की करीब 30 लाख महिलाएं सेक्स वर्क में हैं. इनमें से बड़ी संख्या राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, यूपी के नट-बेड़िया समुदायों से है. सेक्स वर्क दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक माना जाता है. भारत में देवदासी प्रथा, मुगलकाल में तवायफ कल्चर इसके उदाहरण हैं. लेकिन घेघोली जैसी जगहों पर ये ‘कला’ से ‘मजबूरी’ 1871 के बाद बना, जब क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने इनके पारंपरिक पेशे छीन लिए.

आखिर में उड़ने’ का हक सबको है. राजकुमारी आज भी सड़क पर ग्राहक का इंतज़ार कर रही है.घर पर बच्चा भूखा है. लेकिन घेघोली में 8 साल की सुनिता का सपना भी जिंदा है, “मैं एयर होस्टेस बनूंगी.” क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने इनसे इनकी कला छीनी, पहचान छीनी. आज गरीबी और जातिगत भेदभाव इन्हें सेक्स वर्क के लिए मजबूर करता है.ये कहानी शर्म की नहीं, सिस्टम की नाकामी की है. बदलाव धीमा है, पर नामुमकिन नहीं. जिस दिन सुनिता सच में उड़ जाएगी, उस दिन घेघोली की सैकड़ों राजकुमारियों को लगेगा कि जंजीरें टूट सकती हैं. तब तक, ये लड़ाई जारी है, कलम से, किताब से, और हिम्मत से.


स्टेट मिरर स्पेशल
अगला लेख