पंजाब में बघेल जो 1.5 साल में नहीं कर पाए वो सचिन पायलट ने 25 दिन में कैसे कर दिया, राहुल गांधी यूं नहीं ओल्ड गार्ड के खिलाफ
पंजाब कांग्रेस में 25 दिन में बड़ा बदलाव हुआ. बघेल की जगह पायलट आए और वड़िंग का इस्तीफा हुआ. क्या राहुल गांधी अब पुराने नेताओं के बजाय नई टीम पर भरोसा कर रहे हैं?
पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी गुटबाजी 30 सितंबर 2026 को उस मोड़ पर पहुंच गई, जब प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि ठीक 25 दिन पहले, 5 सितंबर को कांग्रेस ने भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट (Sachin Pilot) को पंजाब का प्रभारी बनाया था. कुछ महीने बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में राहुल गांधी ने किसी ओल्ड गार्ड को नहीं बल्कि पायलट के सामने वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच चल रहे विवाद को संभालने की चुनौती दी थी.
पार्टी (Congress) को गुटबाजी से बाहर निकालने और चुनाव से पहले एकजुट करने की कोशिश के तहत उन्होंने जिम्मेदारी संभालने के बाद अलग-अलग नेताओं से बातचीत की. 15 सितंबर को चन्नी, वड़िंग और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक ही मंच पर नजर आए. इसके बाद पायलट ने पंजाब कांग्रेस की स्थिति पर हाईकमान को रिपोर्ट दी. पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इसके बाद वड़िंग के नेतृत्व में बदलाव का रास्ता साफ हुआ.
पायलट का 25 दिन वाला प्लान क्या?
5 सितंबर को सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया. उस समय पार्टी के भीतर अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के खेमों में खींचतान चल रही थी. पायलट ने जिम्मेदारी संभालने के बाद तुरंत किसी एक गुट का पक्ष लेने के बजाय अलग-अलग नेताओं से बातचीत शुरू की. उनका फोकस संगठन की स्थिति समझने और नेताओं की शिकायतें जानने पर रहा.
15 सितंबर को चन्नी, वड़िंग और सुखजिंदर सिंह रंधावा एक ही मंच पर दिखाई दिए. इसके बाद पायलट ने पंजाब कांग्रेस की स्थिति को लेकर हाईकमान को रिपोर्ट दी. 30 सितंबर को वड़िंग के इस्तीफे के साथ करीब 25 दिनों के भीतर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व में बदलाव हो गया.
पंजाब में कैसे बदली कांग्रेस की कहानी?
पंजाब कांग्रेस में विवाद की मुख्य धुरी अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच नेतृत्व को लेकर मतभेद थे. वड़िंग प्रदेश अध्यक्ष थे, जबकि चन्नी खेमे की ओर से नेतृत्व में बदलाव की मांग उठ रही थी. सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे वरिष्ठ नेता भी वड़िंग के नेतृत्व पर सवाल उठा चुके थे.
5 सितंबर को पायलट की एंट्री के बाद उन्होंने अलग-अलग नेताओं से संपर्क किया. 15 सितंबर को चन्नी, वड़िंग और रंधावा का एक मंच पर आना इस घटनाक्रम में अहम पड़ाव रहा. इसके बाद पायलट ने राहुल गांधी से मुलाकात कर पंजाब की स्थिति पर रिपोर्ट साझा करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई.
पायलट ने वड़िंग को कैसे मनाया?
कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को निजी बातचीत में किस तरह इस्तीफे के लिए राजी किया, इसकी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है. इसलिए यह कहना ठीक नहीं होगा कि पायलट ने अकेले बातचीत करके वड़िंग से इस्तीफा लिया. पार्टी सूत्रों के मुताबिक पायलट ने पंजाब कांग्रेस के नेताओं से बातचीत की, संगठन की स्थिति समझी और हाईकमान को रिपोर्ट भेजी.
पंजाब कांग्रेस सूत्रों के हवाले से आई रिपोर्टों में कहा गया कि इस रिपोर्ट में वड़िंग के कामकाज और पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी का जिक्र था. इसके बाद 30 सितंबर को वड़िंग ने प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ दिया. अब नए प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर चर्चा होनी है.
बघेल क्यों नहीं सुलझा पाए संकट?
भूपेश बघेल के पंजाब प्रभारी रहते भी वड़िंग को लेकर विवाद जारी रहा. कांग्रेस के भीतर एक धड़ा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहा था, जबकि हाईकमान ने उन्हें पद पर बनाए रखा था. बघेल ने पंजाब के नेताओं से बातचीत की और दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ. जुलाई और अगस्त में वड़िंग के नेतृत्व को लेकर असहमति सार्वजनिक बैठकों तक पहुंच गई. इसके बाद 5 सितंबर को कांग्रेस ने बघेल को पंजाब प्रभारी पद से हटाकर असम की जिम्मेदारी दी और सचिन पायलट को पंजाब भेज दिया.
क्या बघेल सबको खुश रखना चाहते थे?
हकीकत यह है कि भूपेश बघेल सबको खुश रखना चाहते थे. वो चाहते थे कि पार्टी में असंतोष को बढ़ावा न मिले. लेकिन उनके कार्यकाल में कांग्रेस ने वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा और चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान से जुड़ी जिम्मेदारी दी.
यानी पार्टी ने दोनों नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारी देकर संतुलन बनाने का रास्ता अपनाया. इसके बावजूद चन्नी खेमे की ओर से वड़िंग को हटाने की मांग जारी रही और वड़िंग समर्थक भी अपने रुख पर कायम रहे. सितंबर में बघेल की जगह पायलट को जिम्मेदारी देने के बाद कांग्रेस ने पंजाब संगठन को नए तरीके से संभालने की कोशिश में जुटी है. वडिंग के इस्तीफे से प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी पर विराम लगता नजर आने लगा है.
राहुल ने पायलट से क्या कहा था?
सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के बाद राहुल गांधी के साथ पंजाब संगठन को लेकर बातचीत हुई. पायलट ने अपनी पहली पंजाब यात्रा के बाद राहुल गांधी को रिपोर्ट देने की बात कही थी. 15 सितंबर को चन्नी, वड़िंग और रंधावा का एक मंच पर आना पायलट की शुरुआती कोशिशों में अहम माना गया. इसके बाद पायलट ने कहा कि कांग्रेस 2027 का पंजाब विधानसभा चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ेगी और चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरे का ऐलान नहीं किया जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि राहुल गांधी चुनाव अभियान का नेतृत्व करेंगे.
पुराने चेहरे क्यों अहम हैं?
पंजाब कांग्रेस में पुराने नेताओं की राजनीतिक पकड़ इस विवाद में लगातार दिखाई दी. चरणजीत सिंह चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री हैं. सुखजिंदर सिंह रंधावा लंबे समय से पंजाब कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं. अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग 2022 से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे और लुधियाना से सांसद हैं. प्रताप सिंह बाजवा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं.
ऐसे में किसी एक नेता को हटाने या आगे बढ़ाने का असर सिर्फ संगठन के पद तक सीमित नहीं रहता. अलग-अलग नेताओं के समर्थक और राजनीतिक समीकरण भी इससे जुड़े होते हैं. इसलिए कांग्रेस के लिए सभी पुराने चेहरों के बीच संतुलन बनाना लगातार चुनौती रहा है.
कांग्रेस में पुराने नेताओं की उपयोगिता के उदाहरण सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं हैं. पार्टी के कई राज्यों में पुराने नेताओं के पास संगठन का अनुभव, स्थानीय नेटवर्क और लंबे समय से बने राजनीतिक संपर्क हैं. पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, चरणजीत सिंह चन्नी और प्रताप सिंह बाजवा जैसे चेहरों की भूमिका अलग-अलग समय पर पार्टी की रणनीति में महत्वपूर्ण रही है.
यही पुराने राजनीतिक समीकरण कई बार नेतृत्व परिवर्तन को कठिन भी बनाते हैं. पंजाब का मौजूदा संकट इसी सवाल को सामने रखता है कि चुनाव से पहले पार्टी पुराने चेहरों को साथ रखकर संगठन में बदलाव कैसे करे.
विवाद आखिर शुरू कहां हुआ?
पंजाब कांग्रेस का मौजूदा विवाद कई महीने पुराना था. 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी थी. इसके बाद अप्रैल 2022 में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया. 2026 में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ वड़िंग के नेतृत्व को लेकर फिर सवाल उठने लगे. चन्नी खेमे की ओर से संगठन में बदलाव की मांग तेज हुई.
कांग्रेस ने पहले वड़िंग को बनाए रखा और चन्नी को चुनाव अभियान से जुड़ी जिम्मेदारी दी, लेकिन विवाद खत्म नहीं हुआ. इसके बाद 5 सितंबर को बघेल की जगह पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया गया. करीब 25 दिन बाद 30 सितंबर को वड़िंग ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.
कब क्या हुआ?
कांग्रेस आलाकमान ने 5 सितंबर 2026 को सचिन पायलट पंजाब प्रभारी नियुक्ति किया. इसके बाद उन्होंने पंजाब के नेताओं से बातचीत शुरू की. 15 सितंबर को चन्नी, वड़िंग और रंधावा एक मंच पर आए. इसके बाद पायलट ने पंजाब संगठन की स्थिति पर हाईकमान को रिपोर्ट दी. 30 सितंबर को वड़िंग ने इस्तीफा दे दिया. इसलिए 25 दिनों का यह घटनाक्रम सिर्फ एक इस्तीफे की कहानी नहीं है. इसमें लंबे समय से चल रहा नेतृत्व विवाद, पुराने नेताओं के बीच संतुलन, पायलट की बातचीत और हाईकमान का फैसला जैसी कड़ियां जुड़ी हुई हैं.
कांग्रेस में ओल्ड गार्ड कमजोर कैसे?
कांग्रेस में पुराने यानी ‘ओल्ड गार्ड’ नेताओं की पकड़ कमजोर होने के पीछे पीढ़ीगत बदलाव, संगठन में नई टीम को बढ़ती जगह और राज्यों में गुटबाजी जैसे कई कारण नजर आते हैं. पंजाब इसका ताजा उदाहरण है, जहां लंबे समय से चल रहे गुटीय विवाद के बीच पहले प्रभारी बदले गए और अब प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को हटाने का फैसला हुआ.
उत्तर प्रदेश में प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के काम करने के तरीके को लेकर मतभेद सामने आए हैं. इससे सवाल उठता है कि पार्टी नेतृत्व विवादों को शुरुआती स्तर पर सुलझाने के बजाय फैसले तब क्यों करता है, जब मतभेद सार्वजनिक हो चुके होते हैं. पंजाब में वड़िंग और चरणजीत सिंह चन्नी के बीच संतुलन बनाने की पिछली कोशिश भी विवाद खत्म नहीं कर सकी.




