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'50 साल में ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी' 68 मौतें, डूबते गांव और बर्बाद ज़िंदगियां; देखिए असम बाढ़ की भयावह तस्वीरें

असम के कई जिलों में आई भीषण बाढ़ ने हजारों परिवारों को बेघर और किसानों को बर्बाद कर दिया. 68 मौतों और लाखों प्रभावित लोगों के बीच अब राहत से ज्यादा चर्चा स्थायी समाधान और बेहतर बाढ़ प्रबंधन की हो रही है.

50 साल में ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी 68 मौतें, डूबते गांव और बर्बाद ज़िंदगियां; देखिए असम बाढ़ की भयावह तस्वीरें
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'50 साल में ऐसी बाढ़ कभी नहीं देखी...' यह सिर्फ एक बुजुर्ग किसान की पीड़ा नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की आवाज है जिनकी दुनिया कुछ दिनों की बारिश में उजड़ गई. असम में बाढ़ कोई नई घटना नहीं है. हर मानसून के साथ ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां अपना रौद्र रूप दिखाती हैं. लेकिन इस बार कहानी अलग है. चराईदेऊ, शिवसागर, नाज़िरा और जोरहाट जैसे वे इलाके भी पानी में डूब गए जिन्हें दशकों से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता था.

इतिहास बताता है कि लगभग 700 वर्ष पहले आहोम साम्राज्य के संस्थापक चाओलुंग सुकाफा ने अपनी राजधानी इसी क्षेत्र में इसलिए बसाई थी क्योंकि यहां बाढ़ का खतरा कम था. आज वही इलाका पानी, कीचड़ और तबाही की तस्वीर बन चुका है.

68 मौतें, लाखों ज़िंदगियां प्रभावित

सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस बाढ़ में अब तक 68 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 6.5 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. पानी उतरने के बाद गांवों में लौट रहे लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल है-अब शुरुआत कहां से करें? जहां कभी घर थे, वहां टूटी दीवारें हैं. जहां धान की फसल लहलहाती थी, वहां मोटी रेत और गाद की परतें बिछी हैं. कई परिवारों की वर्षों की कमाई कुछ दिनों में खत्म हो गई.

खेत बचे नहीं, रोज़गार भी चला गया

इस आपदा का सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ा है. हजारों एकड़ कृषि भूमि पर रेत और गाद जम गई है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इन खेतों को दोबारा उपजाऊ बनाने में लंबा समय लग सकता है. यानी केवल इस साल की फसल नहीं गई, बल्कि आने वाले कई मौसम भी प्रभावित हो सकते हैं.

मवेशी बहे, छोटे कारोबार भी खत्म

ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिर्फ खेती पर नहीं चलती. गाय, भैंस, बकरियां और अन्य पशु हजारों परिवारों की आय का प्रमुख साधन थे. बाढ़ में बड़ी संख्या में पशुधन के नुकसान ने लोगों की आर्थिक स्थिति और खराब कर दी. उधर छोटे दुकानदारों की दुकानें मलबे और कीचड़ में दब गईं. जिन कारोबारों को खड़ा करने में वर्षों लगे, वे कुछ घंटों में खत्म हो गए.

राहत शिविरों में हजारों परिवार

बाढ़ का पानी घट जरूर रहा है, लेकिन संकट अभी खत्म नहीं हुआ. हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में रह रहे हैं. कई परिवारों के सामने यह सवाल है कि वे अपने बच्चों को लेकर दोबारा घर कब लौट पाएंगे और लौटेंगे भी तो क्या बचा होगा? स्थानीय लोगों का कहना है कि राहत सामग्री मिल रही है, लेकिन नुकसान इतना बड़ा है कि केवल तत्काल सहायता पर्याप्त नहीं होगी.

आखिर ऊपरी असम में इतनी बड़ी बाढ़ क्यों आई?

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने नागालैंड में क्लाउडबर्स्ट की पुष्टि नहीं की है.उन्होंने बताया कि जुलाई के दौरान नागालैंड और अपर असम के कई इलाकों में सामान्य से 435% से 490% तक अधिक वर्षा दर्ज की गई. चराईदेऊ जिले में लगभग 490% अतिरिक्त बारिश हुई, जबकि नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग और वोखा जिलों में भी रिकॉर्ड वर्षा हुई. सरकार का कहना है कि इसी असाधारण वर्षा का पानी तेजी से निचले इलाकों में पहुंचा और बाढ़ की स्थिति बनी. लेकिन कई सवाल अभी भी बाकी हैं.

  • प्राकृतिक आपदा अपनी जगह है, लेकिन विशेषज्ञ वर्षों से कुछ दूसरी समस्याओं की ओर भी इशारा करते रहे हैं.
  • कई स्थानों पर पुराने मिट्टी के तटबंध भारी दबाव नहीं झेल पाए.
  • नदी तंत्र और जल निकासी व्यवस्था पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं.
  • पर्यावरण विशेषज्ञ वेटलैंड संरक्षण, नदी की गाद सफाई (Desilting) और दीर्घकालिक नदी प्रबंधन की जरूरत बताते रहे हैं.

भारी वर्षा की स्थिति में समय रहते चेतावनी और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय को लेकर भी चर्चा होती रही है. इन मुद्दों पर सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा की गई है, जबकि आलोचकों का कहना है कि इनके प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए.

चुनावी वादे और जमीनी हकीकत

बीते वर्षों में बाढ़ प्रबंधन को लेकर कई घोषणाएं की गईं. इनमें ब्रह्मपुत्र नदी की ड्रेजिंग, नए तटबंध, आधुनिक चेतावनी प्रणाली, रिमोट सेंसिंग, नदी बेसिन प्रबंधन और तकनीक आधारित निगरानी जैसे कई वादे शामिल रहे.हालांकि विपक्ष और कई विशेषज्ञों का कहना है कि इन योजनाओं का असर जमीन पर अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देता. सरकार का कहना है कि कई परियोजनाओं पर चरणबद्ध तरीके से काम चल रहा है.

सबसे बड़ा सवाल

क्या हर साल बाढ़ आने के बाद राहत शिविर खोल देना ही पर्याप्त समाधान है? या फिर अब समय आ गया है कि असम के लिए दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन, वैज्ञानिक नदी नीति, मजबूत तटबंध, प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम और बेहतर अंतरराज्यीय समन्वय को प्राथमिकता दी जाए?

असम की यह त्रासदी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है. 68 मौतें सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि 68 परिवारों की हमेशा के लिए बदल चुकी जिंदगी हैं. बाढ़ प्राकृतिक हो सकती है, लेकिन उसके प्रभाव को कम करना प्रशासन, नीति और तैयारी पर भी निर्भर करता है. यही कारण है कि हर बड़ी बाढ़ के बाद राहत कार्यों के साथ-साथ दीर्घकालिक समाधान, बुनियादी ढांचे की मजबूती और आपदा प्रबंधन की प्रभावशीलता पर चर्चा भी उतनी ही जरूरी हो जाती है.

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