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चार जिले और 88 मौतें-500 घायल, एक के बाद एक 14 धमाके... 18 साल पहले सीरियल ब्लास्ट से कैसे दहला था असम

18 साल पहले 30 अक्टूबर 2008 में असम की धरती बम के धमाकों से दहल गई थी. एक नहीं बल्कि 14 अलग-अलग जगहों पर ब्लास्ट हुए थे. इस मामले में रंजन डाइमरी समेत 10 लोगों को हत्या और दूसरे आरोपों में उम्रकैद की सजा सुनाई.

bomb blast
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असम बम ब्लास्ट का इतिहास
( Image Source:  x-@Sagar4BJP )
हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत7 Mins Read

Updated on: 30 Oct 2026 11:35 AM IST

30 अक्टूबर 2008 का दिन असम के लोगों के लिए कभी न भूल पाने वाला दर्द बन गया. उस दिन राज्य के अलग-अलग इलाकों में एक के बाद एक हुए बम धमाकों ने हर तरफ तबाही मचा दी थी. सड़कों पर चल रहे लोग अचानक इन धमाकों की चपेट में आ गए. कहीं गाड़ियों के परखच्चे उड़ गए, तो कहीं दुकानों और आसपास की इमारतों को नुकसान पहुंचा.

इस हमले में 88 लोगों की मौत हो गई, जबकि 500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. चार जिलों में हुए इन धमाकों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. शुरुआत में शक अलग-अलग आतंकी संगठनों पर गया, लेकिन जांच आगे बढ़ी तो कहानी की कड़ियां एक ऐसे संगठन तक पहुंचीं, जिसका नाम पहले इस तरह के बड़े हमले से नहीं जुड़ा था. यह संगठन था नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (NDFB).

30 अक्टूबर को असम में क्या हुआ था?

असम में 30 अक्टूबर 2008 को आतंकियों ने अलग-अलग जगहों पर सीरियल ब्लास्ट किए. चार जिलों में हुए इन धमाकों में बड़ी संख्या में आम लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए. गुवाहाटी में भी कई जगह कार बम के जरिए धमाके किए गए थे. इनकी ताकत इतनी ज्यादा थी कि आसपास खड़ी गाड़ियों और इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा.

हमले के बाद पूरे राज्य में डर और अफरा-तफरी का माहौल था. अस्पतालों में घायलों को पहुंचाया जा रहा था. परिवार अपने लोगों को तलाश रहे थे. किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतनी बड़ी तबाही कैसे मच गई. यह हमला भारत के सबसे बड़े बम हमलों में गिना जाता है. इससे पहले 1993 में मुंबई में हुए धमाकों और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए विस्फोटों में इससे ज्यादा लोगों की जान गई थी.

शुरुआत में इस्लामी संगठनों पर गया शक

धमाकों के बाद पुलिस और जांच एजेंसियों ने मामले की पड़ताल शुरू की. शुरुआती दिनों में देश में यह चर्चा थी कि इसके पीछे किसी इस्लामी आतंकी संगठन का हाथ हो सकता है. हमले के एक दिन बाद एक अनजान व्यक्ति ने फोन कर 'इस्लामिक सिक्योरिटी फोर्स-इंडियन मुजाहिदीन' नाम के संगठन की ओर से जिम्मेदारी लेने का दावा भी किया था. पुलिस ने प्रतिबंधित संगठन उल्फा और बांग्लादेश में सक्रिय हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी यानी HuJI की भूमिका की आशंका पर भी जांच की. असम पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) को जांच सौंपी गई. उस समय टीम की अगुवाई आर. चंद्रनाथन कर रहे थे. उनके मुताबिक, शुरुआती जांच में कुछ ऐसे संकेत मिले, जिनसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI और NDFB की भूमिका की आशंका सामने आई. हालांकि, यह मामला केवल शक और दावों तक सीमित नहीं था. जांच अधिकारियों को सबूत जुटाने थे और यह पता लगाना था कि धमाकों की योजना किसने बनाई थी.

कैसे खुलने लगी हमले की कड़ियां

जांच में पहला अहम सुराग नीलिम डाइमरी की गिरफ्तारी से मिला. उसे मेघालय में भारत-बांग्लादेश सीमा के पास पकड़ा गया था. शुरुआत में पूछताछ के बाद उसे क्लीन चिट दे दी गई, लेकिन SIT ने दोबारा उससे सवाल किए तो उसके मोबाइल फोन से बांग्लादेश में मौजूद NDFB के कुछ नेताओं के संपर्क नंबर मिले. इसके बाद जांच की दिशा बदल गई. पुलिस की नजर नीलिम से मिले नंबरों के जरिए NDFB के दूसरे सदस्यों तक पहुंची. इसी कड़ी में संगठन के एक सदस्य थुंगरी बोड़ो का नाम सामने आया. जांच टीम को शक था कि उसका भी धमाकों में हाथ था. लेकिन पूछताछ से पहले ही वह बांग्लादेश चला गया, जहां कुछ समय बाद उसकी गोली लगने से मौत हो गई. हालांकि, उसका मोबाइल फोन असम के कोकराझार से बरामद कर लिया गया. उसमें मिले नंबरों की मदद से पुलिस ने NDFB के कई अन्य सदस्यों का पता लगाया और कुछ ही हफ्तों में गिरफ्तारियां शुरू हो गईं.

25 से 30 किलो RDX का हुआ इस्तेमाल

बाद में मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई. CBI ने भी SIT की ओर से जुटाए गए कई अहम सुरागों की पुष्टि की. जांच में सामने आया कि गुवाहाटी में कार बम धमाकों के लिए भारी मात्रा में विस्फोटक इस्तेमाल किया गया था. फॉरेंसिक जांच के अनुसार, हर कार बम में करीब 25 से 30 किलो RDX के साथ अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल किया गया था.

किसने रची थी धमाकों की साजिश?

जांच में NDFB के तत्कालीन प्रमुख रंजन डाइमरी का नाम सामने आया. उस समय संगठन का एक धड़ा बांग्लादेश में सक्रिय था. रिपोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया कि धमाकों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में NDFB के सदस्यों की भूमिका थी. इस मामले में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के कुछ अधिकारियों की भूमिका होने के दावे भी सामने आए. कुछ खुफिया अधिकारियों का मानना था कि एजेंसी के भीतर मौजूद कुछ असंतुष्ट लोग भारत में हमलों के जरिए हालात बिगाड़ना चाहते थे. हालांकि, ISI की भूमिका को लेकर सामने आए इन दावों और अलग-अलग सिद्धांतों को लेकर पूरी तस्वीर सार्वजनिक रूप से साफ नहीं हो सकी.

रंजन डाइमरी को लेकर क्या कहा?

हमले के पीछे रंजन डाइमरी की मंशा को लेकर भी अलग-अलग बातें कही गईं. एक आशंका यह थी कि वह भारत सरकार के साथ शांति वार्ता की कोशिशों से नाराज था और अपनी मंजूरी के बिना बातचीत आगे बढ़ने नहीं देना चाहता था. दूसरी संभावना यह जताई गई कि संगठन कमजोर पड़ रहा था और वह बाहरी मदद के जरिए अपनी ताकत दोबारा बढ़ाना चाहता था. कुछ अधिकारियों ने यह भी माना कि उस पर दूसरे संगठनों और विदेशी एजेंसियों का दबाव हो सकता था. इन वजहों में से असली वजह क्या थी, यह आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.

किन-किन लोगों को हुई सजा

इस मामले में CBI ने कुल 22 लोगों के खिलाफ आरोप लगाए थे. इनमें से सात लोगों को फरार घोषित किया गया था. रंजन डाइमरी को 2010 में बांग्लादेश में पकड़े जाने के बाद भारत लाया गया था. जनवरी 2019 में गुवाहाटी की विशेष अदालत ने रंजन डाइमरी समेत 10 लोगों को हत्या और दूसरे आरोपों में उम्रकैद की सजा सुनाई. बाद में डाइमरी को सरकार के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दिल्ली जाने की अनुमति मिली और उसे चार हफ्तों की अंतरिम जमानत दी गई थी. हालिया कानूनी घटनाक्रम में असम की एक अदालत ने डाइमरी की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा. वहीं, उसके चार साथियों को गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत पांच से सात साल तक की जेल की सजा सुनाई गई.

इस हमले में जान गंवाने वाले 88 लोगों के परिवारों के लिए यह सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं, बल्कि ऐसा दर्द है जिसकी याद आज भी उन्हें झकझोर देती है. जिन लोगों ने अपने करीबियों को खोया और जो घायल होकर जिंदगी भर के लिए जख्म लेकर लौटे, उनके लिए 30 अक्टूबर का दिन कभी सामान्य तारीख नहीं बन सकता.

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