Hariyali Teej: जानिए क्यों मनाया जाता है हरियाली तीज का पर्व, क्या है इसकी धार्मिक परंपरा?
हरियाली तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और अखंड वैवाहिक सुख का प्रतीक माना जाता है. इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखी दांपत्य जीवन के लिए व्रत रखती हैं.
क्यों मनाया जाता है हरियाली तीज
हरियाली तीज सावन मास के सबसे प्रमुख और उल्लासपूर्ण पर्वों में से एक है. यह त्योहार मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है. चारों ओर फैली हरियाली, रिमझिम बारिश और प्रकृति की सुंदरता के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से व्रत रखती हैं.
वहीं अविवाहित कन्याएं भगवान शिव जैसा योग्य जीवनसाथी पाने की इच्छा से व्रत और पूजा करती हैं. हरियाली तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है. इसके साथ ही महिलाएं झूला झूलती हैं, सावन के पारंपरिक गीत और मल्हार गाती हैं तथा पूरे उत्साह के साथ इस पर्व का आनंद लेती हैं.
शिव और पार्वती के दिव्य मिलन का पर्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन की स्मृति में मनाई जाती है. पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी. उनकी अटूट भक्ति और कठिन साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने श्रावण शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया. इसी कारण हरियाली तीज को अखंड सौभाग्य, प्रेम और अटूट वैवाहिक रिश्ते का प्रतीक माना जाता है. यह पर्व पति-पत्नी के बीच विश्वास, समर्पण और आपसी सम्मान को मजबूत करने का संदेश भी देता है.
हरियाली तीज की परंपरा
हरियाली तीज का पर्व भारतीय लोक संस्कृति और परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है. इस दिन महिलाएं हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हरी चूड़ियां पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं और सोलह श्रृंगार करके माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं. गांवों और शहरों में पेड़ों पर झूले डाले जाते हैं, जहां महिलाएं और युवतियां सखियों के साथ झूला झूलती हैं और सावन के पारंपरिक गीत गाती हैं. यह पर्व केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि सामाजिक मेल-मिलाप और पारिवारिक स्नेह का भी प्रतीक माना जाता है.
सिंजारा की परंपरा
हरियाली तीज पर नवविवाहित महिलाओं के लिए सिंजारा भेजने की परंपरा विशेष महत्व रखती है. विवाह के बाद पहले सावन में बेटी को मायके बुलाया जाता है. वहीं ससुराल की ओर से सिंजारा के रूप में कपड़े, आभूषण, श्रृंगार का सामान, मेहंदी, चूड़ियां, घेवर, फैनी और अन्य मिठाइयां भेजी जाती हैं. यह परंपरा बेटी के प्रति स्नेह और सम्मान का प्रतीक मानी जाती है.




