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कब है मकर संक्रांति का पर्व? जानिए सूर्य उपासना, तिल दान और इस त्योहार से जुड़ी मान्यताएं

हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का पर्व विशेष महत्व रखता है. हर साल 14 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार सूर्य देव की उपासना, दान-पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जिसे शुभ परिवर्तन और सकारात्मक ऊर्जा का संकेत माना जाता है.

कब है मकर संक्रांति का पर्व? जानिए सूर्य उपासना, तिल दान और इस त्योहार से जुड़ी मान्यताएं
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( Image Source:  AI SORA )
State Mirror Astro
By: State Mirror Astro

Updated on: 14 Jan 2026 6:30 AM IST

हिंदू धर्म में एक वर्ष में 12 संक्रांतियां आती है जिसमें माघ माह में पड़ने वाली संक्रांति का विशेष महत्व होता है. इस महीने की संक्राति को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है. सूर्य जब धनु से मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसको मकर संक्राति कहते हैं. सूर्य एक राशि में एक माह तक रहते हैं फिर इसके बाद दूसरी राशि में गोचर करते हैं.

इस तरह से सूर्य के संक्रमण को संक्रांति के नाम से जाना जाता है. संक्रांति पर्व को उत्तरायण भी कहते हैं. सूर्य के उत्तरायण होने पर दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं. आइए जानते हैं सूर्य मकर संक्रांति का महत्व और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं.

सूर्यदेव होते हैं दक्षिणायन से उत्तरायण

मकर संक्रांति के दिन से सूर्यदेव मकर राशि में प्रवेश करते हैं जिससे सूर्यदेव की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन होता है. सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण होते है. जिससे दिन बढ़े और रातें छोटी होने लगती है. उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है. मकर संक्रांति के दिन से सूर्य के उत्तरायण को बहुत बहुत ही शुभ माना जाता है.

देवता का दिन की होती है शुरुआत

हिंदू धर्म शास्त्रों में सूर्य के उत्तरायण को देवताओं का दिन जबकि दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि माना गया है. उत्तरायण काल के 6 महीने देवताओं के जागने का समय होता है. ऐसी मान्यता है कि उत्तरायण काल में देव त्यागने पर व्यक्ति को पुनर्जन्म से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस तरह के मकर संक्रांति मोक्ष पाने का पर्व माना जाता है.

मकर संक्राति पर सूर्य-शनि का मिलन

धर्म ग्रंथों के अनुसार सूर्यदेव के पुत्र शनिदेव होते हैं. मकर राशि के स्वामी शनिदेव होते हैं और मकर संक्रांति पर सूर्यदेव अपने पुत्र शनि की राशि मकर में प्रवेश करते हैं. जहां पर ये एक माह के लिए रहते हैं. ऐसी मान्यता है कि सूर्यदेव और शनिदेव के मिलन होने से सूर्य के तेज के आगे शनिदेव का कठोर प्रभाव शांत हो जाता है. ऐसे में इस दिन सूर्य और शनि से जुड़ी चीजों के दान का विशेष महत्व होता है.

मकर संक्रांति से जुड़ी दूसरी कथाएं

ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई थी. जिससे राजा भगीरथ के प्रयासों के कारण सगर पुत्रों को मुक्ति मिली थी. जिसके चलते मकर संक्रांति पर गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व होता है. इसके अलावा मकर संक्रांति की कथा महाभारत काल से भी जुड़ी हुई हैं. भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए इसी दिन प्राण त्यागे थे.

स्नान, दान और पुण्य का महत्व

मकर संक्रांति पर स्नान, दान और पुण्य कर्म करने का विशेष महत्व होता है. इस दिन गंगा स्नान करने से सभी तरह पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं. इसके अलावा मकर संक्रांति पर तिल, गुड़, ऊनी वस्त्र, कंबल और खिचड़ी का दान बहुत ही फलदायी माना गया है.

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