नहीं बन रहे काम-हो रही तबीयत खराब-लग रही नजर, शनिवार को करें हनुमान जी से जुड़ा ये उपाय, दूर होगा दोष
अक्सर खुशी और तरक्की के समय पर नजर लगना आम बात होती है. शनिवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में जाकर प्रभु के कंधे का सिंदूर माथे पर तिलक के रूप में लगाने से नजर दूर हो जाती है.
नजर दोष दूर करने के लिए शनिवार का उपाय
कई लोग मानते हैं कि जब बिना किसी साफ वजह के बार-बार काम बिगड़ने लगें, मन बेचैन रहे, बच्चों का बार-बार रोना या अचानक तबीयत खराब होना जैसी बातें होने लगें, तो इसे नजर दोष से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे समय में लोग धार्मिक उपायों का सहारा लेते हैं.
शनिवार के दिन हनुमान जी के मंदिर में जाकर पूजा करें और परंपरा के अनुसार प्राप्त हनुमान जी के कंधे का सिंदूर नजर दोष से प्रभावित व्यक्ति के माथे पर तिलक लगाने से फायदा हो सकता है.
क्या है यह पारंपरिक उपाय?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान जी के मंदिर में जाकर उनकी प्रतिमा के कंधे पर लगा सिंदूर श्रद्धा के साथ लाया जाता है. इसके बाद उस सिंदूर का छोटा-सा तिलक नजर दोष से परेशान माने जाने वाले व्यक्ति के माथे पर लगाया जाता है. मान्यता है कि इससे नकारात्मक प्रभाव कम होने की प्रार्थना की जाती है.
कब करना शुभ माना जाता है?
इस उपाय के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन सबसे शुभ माना जाता है. इन दोनों दिनों को हनुमान जी की पूजा के लिए विशेष माना जाता है. सुबह या शाम की पूजा के समय यह उपाय श्रद्धा और नियम के साथ किया जा सकता है.
कैसे करें यह उपाय?
- सबसे पहले हनुमान जी के मंदिर जाएं.
- श्रद्धा के साथ पूजा करें और दीपक या अगरबत्ती जलाएं.
- मंदिर की परंपरा का सम्मान करते हुए हनुमान जी के कंधे का सिंदूर प्राप्त करें.
- घर आकर नजर दोष से प्रभावित माने जाने वाले व्यक्ति के माथे पर हल्का तिलक लगाएं.
- तिलक लगाते समय हनुमान जी का स्मरण करें या 'ॐ हनुमते नमः' मंत्र का जाप करें.
इन बातों का रखें ध्यान
यह उपाय पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ ही करें. मंदिर के नियमों का पालन करें और बिना अनुमति किसी भी धार्मिक सामग्री को न लें. साथ ही, अगर किसी व्यक्ति को लगातार स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो रही है, तो केवल धार्मिक उपायों पर निर्भर न रहें और डॉक्टर से सलाह भी जरूर लें.
नोट: यह उपाय लाल किताब पर आधारित है. इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. अलग-अलग लोगों की आस्था और विश्वास अलग हो सकते हैं.




