जब रावण ने हिला दिया कैलाश पर्वत, तब भगवान शिव ने ऐसे चूर किया उसका घमंड, जानिए पौराणिक कथा
रावण ने कैलाश पर्वत उठाने की कोशिश क्यों की? जानिए कैसे भगवान शिव ने अंगूठे से उसका अहंकार चूर किया और फिर उसे वरदान दिया.
सावन का पवित्र महीना चल रहा है. इस महीने भगवान शिव की पूजा, व्रत, जप, तप और कथा सुनने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं और हर तरह की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. भगवान शिव के नाम भोलेनाथ भी है, जो थोड़ी सी पूजा में ही प्रसन्न हो जाते हैं. सावन के पवित्र महीने में आज हम आपको रावण के अंहकार को तोड़ने में भगवान शिव की कथा के बारे में बताने जा रहे हैं, जब भोलेनाथ ने रावण के घमंड को तोड़ा था.
पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि विश्रवा के पुत्र रावण अत्यंत विद्वान, पराक्रमी और वेद-शास्त्रों का ज्ञाता था. लेकिन अपार शक्ति और लगातार मिलती सफलताओं ने उसे अहंकारी बना दिया. उसने कुबेर से लंका का राज्य और पुष्पक विमान छीन लिया तथा अनेक लोकों पर विजय प्राप्त कर स्वयं को सबसे शक्तिशाली मानने लगा.
कैलाश पर्वत पर हुआ सामना
एक बार रावण पुष्पक विमान से कैलाश पर्वत के ऊपर से गुजर रहा था. तभी अचानक उसका विमान आगे बढ़ने के बजाय वहीं रुक गया. आश्चर्यचकित रावण नीचे उतरा तो वहां भगवान शिव के परम गण नंदी ने उसे बताया कि यह भगवान शिव का पवित्र धाम है और यहां बिना अनुमति आगे नहीं बढ़ा जा सकता. रावण अपने अहंकार में इतना डूब चुका था कि उसने नंदी का उपहास उड़ाया और भगवान शिव के सामर्थ्य पर भी प्रश्न उठाने लगा. उसने क्रोध में आकर यह निश्चय किया कि वह कैलाश पर्वत को ही उखाड़कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करेगा.
भगवान शिव ने पलभर में तोड़ा घमंड
रावण ने पूरे बल के साथ कैलाश पर्वत को उठाने का प्रयास किया. उसके प्रयास से पर्वत डोलने लगा, जिससे माता पार्वती चिंतित हो उठीं. तब भगवान शिव ने बिना क्रोधित हुए केवल अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को हल्का-सा दबा दिया. उसी क्षण पर्वत का भार इतना बढ़ गया कि रावण उसके नीचे दब गया और चाहकर भी स्वयं को मुक्त नहीं कर सका. उसी पल उसे अपनी भूल और अहंकार का एहसास हुआ.
रावण की भक्ति और भगवान शिव का वरदान
कैलाश पर्वत के नीचे दबे हुए रावण ने भगवान शिव का स्मरण और स्तुति करना शुरू कर दिया. कहा जाता है कि उसने लंबे समय तक कठोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया. उसकी सच्ची भक्ति और पश्चाताप देखकर माता पार्वती ने भी भगवान शिव से उसे क्षमा करने का आग्रह किया. इसके बाद भगवान शिव रावण के सामने प्रकट हुए, उसे पर्वत के नीचे से मुक्त किया और उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर कई वरदान प्रदान किए. तभी से रावण भगवान शिव का परम भक्त माना जाने लगा और उसने जीवनभर महादेव की आराधना की.




