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Ramayana: यश ने किया रावण तांडव, क्या है 'शिव तांडव स्तोत्र' और जानें हर लाइन का मतलब

फिल्म रामायण में यश के दमदार ‘रावण तांडव’ ने दर्शकों का ध्यान खींचा है, लेकिन इस प्रस्तुति के पीछे छिपा शिव स्तोत्र का अर्थ भी बेहद खास है. शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव की शक्ति, उनके अद्भुत रूप और प्रचंड तांडव की स्तुति है, जिसे रावण की शिवभक्ति से जोड़कर देखा जाता है.

Ramayana: यश ने किया रावण तांडव, क्या है शिव तांडव स्तोत्र और जानें हर लाइन का मतलब
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( Image Source:  youtube snap- T-Series )
हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत11 Mins Read

Updated on: 21 Oct 2026 2:12 PM IST

रावण का नाम आते ही आमतौर पर रामायण में उसके अहंकार, शक्ति और भगवान राम से युद्ध की याद आती है, लेकिन उसकी एक पहचान भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी रही है. मान्यता है कि रावण ने ही शिव तांडव स्तोत्र की रचना की थी और उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे चंद्रहास तलवार का वरदान दिया था. अब इसी भक्ति और रावण के पराक्रम को बड़े पर्दे पर दिखाने की कोशिश की गई है.

दशहरे के मौके पर फिल्म रामायण के मेकर्स ने ‘रावण तांडव’ रिलीज किया. वीडियो की शुरुआत यश से होती है, जो रावण की भूमिका निभा रहे हैं. जटाएं, धोती, रुद्राक्ष के आभूषण और माथे पर भस्म लगाए यश का अंदाज उन्हें एक तपस्वी और शक्तिशाली शिवभक्त के रूप में पेश करता है. शिव तांडव स्तोत्र है, जिसमें भगवान शिव की जटाओं, गले में विराजमान नाग, तीसरे नेत्र, तांडव नृत्य और उनकी महिमा का वर्णन किया गया है. चलिए जानते हैं शिव तांडव स्तोत्र की हर लाइन का हिंदी में आसान मतलब.

शिव तांडव स्तोत्र

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले

गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्.

डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं

चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥1॥

अर्थ: भगवान शिव की जटाओं से बहने वाली गंगा की धारा उनके शरीर को पवित्र करती है. उनके गले में विशाल नागों की माला लटक रही है. वे डमरू को डम-डम बजाते हुए प्रचंड तांडव करते हैं. ऐसे भगवान शिव हम सभी का कल्याण करें और हमारे जीवन में शुभता लाएं.

जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी.

विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि.

धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके

किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥2॥

अर्थ: भगवान शिव की विशाल जटाओं में गंगा की धारा तेजी से घूमती हुई बह रही है. उसकी लहरें उनकी जटाओं में सुंदर दिखाई देती हैं. उनके मस्तक पर तीसरे नेत्र की अग्नि धधक रही है और सिर पर बाल चंद्रमा सुशोभित हैं. मेरा मन हर पल ऐसे चंद्रशेखर भगवान शिव में लगा रहे.

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-

स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि

कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

अर्थ: पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं. उनके साथ रहने से शिवजी का स्वरूप और भी सुंदर दिखाई देता है. उनका मन संसार में आनंद फैलाने वाला है. उनकी कृपा भरी दृष्टि कठिन से कठिन संकटों को दूर करने की शक्ति रखती है. ऐसे दिगंबर भगवान शिव में मेरा मन आनंद और शांति पाए.

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-

कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे

मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥

अर्थ: भगवान शिव की जटाओं में रहने वाले भूरे रंग के नाग के फन पर लगी मणि चमकती रहती है. उसकी रोशनी दिशाओं को ऐसे प्रकाशित करती है, मानो वे सिंदूर से सजी हों. भगवान शिव ने मदमस्त हाथी की खाल को वस्त्र की तरह धारण किया है. समस्त प्राणियों का पालन करने वाले ऐसे अद्भुत शिव में मेरा मन आनंद पाए.

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-

प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः

श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥

अर्थ: इंद्र सहित अनेक देवता भगवान शिव के चरणों में फूल चढ़ाते हैं. उन फूलों की धूल से उनके चरणों का स्थान पवित्र और धूसर हो जाता है. शिवजी की जटाओं में नागराज की माला सुशोभित है और उनके सिर पर चंद्रमा विराजमान हैं. ऐसे भगवान शिव हमें लंबे समय तक सुख, समृद्धि और मंगल प्रदान करें.

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-

निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं

महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥

अर्थ: भगवान शिव के मस्तक पर स्थित तीसरे नेत्र की अग्नि ने कामदेव को भस्म कर दिया था. इसी कारण देवताओं के स्वामी भी उनके सामने नतमस्तक होते हैं. उनके सिर पर अमृत जैसी शीतलता देने वाला चंद्रमा सुशोभित है. महाकपालि भगवान शिव की जटाएं हमारे लिए कल्याण और समृद्धि का कारण बनें.

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-

द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-

प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥

अर्थ: भगवान शिव के मस्तक पर स्थित तीसरा नेत्र प्रचंड अग्नि से जलता रहता है. इसी अग्नि ने कामदेव के पांच बाणों की शक्ति को समाप्त कर दिया था. वे माता पार्वती के सौंदर्य को निखारने वाले और तीन नेत्रों वाले महादेव हैं. मेरी बुद्धि और मेरा मन सदैव उन्हीं भगवान शिव में लगा रहे.

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-

त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः

कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

अर्थ: भगवान शिव का कंठ नए बादलों के समूह की तरह गहरा और आकर्षक दिखाई देता है. उनका स्वरूप अमावस्या की घनी रात के अंधकार जैसा गंभीर है. वे अपनी जटाओं में गंगा को धारण करते हैं और हाथी की खाल पहनते हैं. चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले तथा संसार का भार संभालने वाले भगवान शिव हमें सुख, वैभव और समृद्धि प्रदान करें.

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-

विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं

गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

अर्थ: भगवान शिव का कंठ खिले हुए नीले कमल की गहरी आभा जैसा दिखाई देता है. वे कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार के बंधनों और यज्ञ में उत्पन्न अहंकार का नाश करने वाले हैं. उन्होंने गजासुर और अंधकासुर का भी अंत किया तथा मृत्यु के भय पर विजय पाने वाले हैं. मैं ऐसे भगवान शिव की आराधना करता हूं, जो बुराइयों और बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं.

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-

रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं

गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

अर्थ: भगवान शिव अहंकार से दूर रहने वाले और समस्त मंगल के स्रोत हैं. उनकी महिमा अनेक कलाओं और गुणों से भरी हुई है, जो मधुर रस की तरह आनंद देती है. वे कामदेव, त्रिपुरासुर, संसार के बंधनों, अनुचित यज्ञ, गजासुर और अंधकासुर का अंत करने वाले हैं. मैं मृत्यु के भय को जीतने वाले भगवान शिव को नमन करता हूं.

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-

द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-

ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

अर्थ: भगवान शिव की जटाओं में घूमते हुए नाग चमक रहे हैं और उनके मस्तक पर स्थित तीसरे नेत्र से अग्नि की लपटें निकल रही हैं. मृदंग की धिमि-धिमि ध्वनि और अन्य मंगलमय वाद्यों की गूंज के बीच उनका प्रचंड तांडव आरंभ होता है. ऐसे शक्तिशाली और दिव्य नृत्य करने वाले भगवान शिव की जय हो.

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-

र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः

समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

अर्थ: भगवान शिव के लिए पत्थर और सुंदर बिस्तर, सांप और मोतियों की माला, कीमती रत्न और मिट्टी का ढेला समान हैं. वे मित्र और शत्रु में भी भेदभाव नहीं करते. उनकी दृष्टि में घास और कमल, सामान्य व्यक्ति और महान राजा सभी समान हैं. मैं कब अपने मन में ऐसा समभाव लाकर सदाशिव की भक्ति कर पाऊंगा?

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌

विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः

शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌कदा सुखी भवाम्यहम्‌॥13॥

अर्थ: भक्त प्रार्थना करता है कि वह कब गंगा के किनारे किसी शांत स्थान पर रहकर अपने मन के बुरे विचारों से मुक्त हो पाएगा. वह हमेशा हाथ जोड़कर भगवान शिव को प्रणाम करना चाहता है. सांसारिक मोह से दूर होकर, माथे पर शिव के स्मरण और मन में उनकी भक्ति के साथ वह लगातार ‘शिव’ मंत्र का जाप करना चाहता है. भक्त की इच्छा है कि इस तरह उसे सच्चा सुख और शांति प्राप्त हो.

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-

निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं

परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

अर्थ: भगवान शिव के सिर पर देवताओं की नगरी के सुंदर पुष्पों से सजी माला सुशोभित है. उनके स्वरूप की दिव्य आभा और पुष्पों की सुगंध मन को आनंदित करती है. शिवजी की यह सुंदरता और दिव्यता हमारे मन में दिन-रात प्रसन्नता बनाए रखे. उनकी कृपा से हमें आंतरिक आनंद और आध्यात्मिक शांति प्राप्त हो.

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी

महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः

शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

अर्थ: इस श्लोक में भगवान शिव की प्रचंड शक्ति और दिव्य महिमा का वर्णन है. उनकी शक्ति समुद्र में उठने वाली विशाल अग्नि की तरह प्रभावशाली है. वे महान सिद्धियों के स्वामी हैं और सांसारिक मोह से परे हैं. शिव मंत्र उनकी दिव्य पहचान और शक्ति का प्रतीक है. ऐसी शिवभक्ति संसार में शुभता, विजय और कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे.

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं

पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं

विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥

अर्थ: जो व्यक्ति इस उत्तम स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, इसका स्मरण करता है और इसे श्रद्धा से बोलता है, उसका मन शुद्ध होता है. उसके भीतर भगवान शिव और गुरु के प्रति भक्ति बढ़ती है. यह स्तोत्र शिवजी की महिमा का चिंतन करने और मन को सांसारिक मोह से हटाकर आध्यात्मिक मार्ग पर लगाने की प्रेरणा देता है.

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं

यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां

लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌॥

अर्थ: इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रदोष काल में भगवान शंभु की पूजा के समय इस स्तोत्र का पाठ करता है, उस पर शिवजी की कृपा बनी रहती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ऐसे भक्त को स्थिर सुख, समृद्धि और वैभव प्रदान करते हैं. प्राचीन समय में रथ, हाथी और घोड़े संपन्नता के प्रतीक माने जाते थे, इसलिए यहां इनका उल्लेख धन-वैभव के रूप में किया गया है.

शिव तांडव स्तोत्र का मुख्य भाव: यह स्तोत्र भगवान शिव की शक्ति, सौंदर्य, वैराग्य और दिव्य तांडव का गुणगान करता है. इसके माध्यम से भक्त शिवजी की शरण में जाकर मन की शांति, अहंकार से मुक्ति और जीवन में शुभता की कामना करता है.

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