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एंटीबायोटिक का दुरुपयोग बढ़ा रहा गंभीर संकट, नहीं चेते तो जुकाम जैसी सामान्‍य बीमारी भी बन जाएगी जानलेवा

भारत के अस्पतालों में एंटीबायोटिक का दुरुपयोग एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन चुका है. सामान्य संक्रमण भी ICU तक पहुंच रहे हैं क्योंकि बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो गए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर अब कॉम्‍बिनेशन दवाइयों और पुराने एंटीबायोटिक तक का सहारा लेने को मजबूर हैं. 2021 में लगभग 2.6 लाख मौतें सीधे Antimicrobial Resistance के कारण हुईं. विशेषज्ञों के अनुसार, समाधान - सख्त संक्रमण नियंत्रण, सही डायग्नोसिस और संतुलित प्रिस्क्रिप्शन है.

एंटीबायोटिक का दुरुपयोग बढ़ा रहा गंभीर संकट, नहीं चेते तो जुकाम जैसी सामान्‍य बीमारी भी बन जाएगी जानलेवा
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( Image Source:  Sora AI )
प्रवीण सिंह
Edited By: प्रवीण सिंह

Published on: 28 Nov 2025 2:38 PM

रोजमर्रा के अस्पतालों का एक दृश्य सोचिए, एक महिला सामान्य छाती के संक्रमण के साथ अस्पताल आती है. शुरुआती दवाओं से आराम मिलना चाहिए था, लेकिन हालत बिगड़ती जाती है. अंततः उसे ICU में भर्ती करना पड़ता है, क्योंकि कोई भी मानक एंटीबायोटिक उस पर प्रभाव नहीं दिखा पा रहा. ड्यूटी डॉक्टर चिंतित होकर ऐसा एंटीमाइक्रोबियल खोजने में जुट जाते हैं जो शायद असर करे. मेडिकल दुनिया के लिए यह कोई असामान्य घटना नहीं. देश के लगभग हर बड़े अस्पताल में, खासकर क्रिटिकल केयर यूनिट्स में, इस तरह के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं - और यह स्थिति एक बड़े स्वास्थ्य संकट की तरफ इशारा करती है.

इस समस्या को विशेषज्ञ एक “हेल्थ इमरजेंसी” मान रहे हैं. मैक्स हेल्थकेयर के इंटरनल मेडिसिन विभाग के निदेशक डॉ. रोममेल टिक्कू बताते हैं, “पिछले कुछ वर्षों में ज्यादातर बैक्टीरिया सामान्य एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधक बन चुके हैं. जब दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो उपचार सीमित हो जाते हैं और मरीजों की हालत ICU तक पहुंच जाती है.”

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) वह स्थिति है जब बैक्टीरिया, वायरस और फंगस जैसे सूक्ष्मजीव उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बनने लगते हैं जिन्हें उन्हें खत्म करने के लिए बनाया गया था. यह प्रतिरोध प्राकृतिक उत्परिवर्तन यानी नेचुरल म्‍यूटेशन से भी होता है, लेकिन इसका खतरा तब कई गुना बढ़ जाता है जब लोग या डॉक्टर एंटीबायोटिक का गलत या जरूरत से ज्यादा उपयोग करते हैं. जब दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, तो सामान्य संक्रमण भी जानलेवा बन जाते हैं.

समस्या कितनी गंभीर है?

अस्पतालों में बढ़ते AMR मामलों ने डॉक्टरों का ध्यान खींचा है. ICMR की एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस रिसर्च एंड सर्विलांस नेटवर्क की प्रमुख डॉ. कामिनी वालिया कहती हैं, “10 साल पहले AMR एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट की समस्या थी, आज यह सीधे डॉक्‍टरों की समस्या बन चुकी है. रोजमर्रा की रिपोर्ट्स में आम एंटीबायोटिक के आगे ‘R’ (Resistant) देखना आम बात हो गई है. जब किसी मरीज के सैंपल में ‘S’ दिखाई देता है (Sensitive), तो राहत मिलती है.” बहु-एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध वाले मरीजों में डॉक्टरों को कई दवाओं का मिश्रण, दोगुनी-तिगुनी खुराक, या पुराने एंटीबायोटिक फिर से इस्तेमाल करने की मजबूरी होती है - ऐसी दवाएं जिनका उपयोग सालों पहले बंद हो चुका है.

AMR: सिर्फ दवाओं की नाकामी नहीं, जानलेवा खतरा

भारत में 2021 में लगभग 2.6 लाख लोगों की मौत सीधे AMR के कारण हुई, यानी संक्रमण का इलाज संभव होता तो मौत नहीं होती. कुल 9.8 लाख लोग ऐसे मरे जिनके शरीर में मौजूद संक्रमण दवाओं के प्रति प्रतिरोधी था, ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ स्टडी के आंकड़ों के अनुसार. दुनिया में AMR के कारण हर साल 10 लाख से अधिक लोग जान गंवा रहे हैं. महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि जहां 1990 में सबसे ज्यादा AMR मौतें 5 साल से कम उम्र के बच्चों में थीं, वहीं 2021 में 70 वर्ष से ऊपर के बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए - यानी संक्रमण प्रतिरोध उम्र के साथ अधिक घातक रूप ले चुका है.

गंभीर संकट की जड़ - गलत और जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक का उपयोग

नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज कंट्रोल द्वारा भारत के 20 अस्पतालों में किए गए सर्वे ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे:

  • 75% मरीजों को एंटीबायोटिक लिखी गई
  • इनमें से 50% एंटीबायोटिक संक्रमण के इलाज के लिए नहीं, बल्कि ‘एहतियातन’ दी गईं
  • 57% दवाएं Watch Group से थीं - ऐसे एंटीबायोटिक जिनका उपयोग सावधानी से करना चाहिए
  • सिर्फ 6% एंटीबायोटिक सटीक इलाज के लिए दी गईं, बाकी 94% “संभावना के आधार पर”

यानी उपचार वास्तविक संक्रमण के आधार पर नहीं, बल्कि डॉक्टर के अनुमान पर हो रहा था और यही AMR का सबसे बड़ा कारण बन रहा है.

समाधान क्या है? इलाज नहीं - सिस्टम बदलना होगा

विशेषज्ञों का कहना है कि AMR किसी एक मरीज या अस्पताल की समस्या नहीं, बल्कि चिकित्सकीय व्यवहार और सिस्टम से जुड़ा संकट है. डॉ. वालिया कहती हैं कि...

  • अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण मजबूत होना चाहिए
  • बाहरी “प्रोफिलैक्टिक एंटीबायोटिक” का उपयोग बंद होना चाहिए
  • जल्दी और सटीक परीक्षण उपलब्ध होने चाहिए
  • हर अस्पताल में “इंफेक्शियस डिजीज स्पेशलिस्ट” अनिवार्य हों
  • दवाओं का अंधाधुंध उपयोग रोकना ही असली इलाज है - न कि ज्यादा दवाएं लिखना.

कोविड के बाद जागरूकता बढ़ी है, पर रास्ता लंबा है

सर गंगा राम अस्पताल के वरिष्ठ संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. चंद वत्ताल बताते हैं कि कोविड-19 के बाद अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की गंभीरता बढ़ी है. ICU संक्रमणों को रोकने के लिए कई अस्पताल - सरकारी और निजी - NABH और अन्य सर्टिफिकेशन के तहत वेंटिलेटर-संबंधी संक्रमण, कैथेटर-संबंधी संक्रमण, सर्जिकल साइट संक्रमण जैसे सूचकांकों की निगरानी कर रहे हैं और इन्हें कम करने के लक्ष्य तय कर रहे हैं. सरकारी प्रयास भी इन्हीं लाइनों पर आगे बढ़ रहे हैं. अस्पतालों में इंफेक्शन प्रिवेंशन, एंटीमाइक्रोबियल उपयोग की निगरानी और डॉक्टरों के लिए प्रोटोकॉल पर ध्‍यान दिया जा रहा है.

सामान्य संक्रमण भी खतरे में बदल सकता है

यदि एंटीबायोटिक के गलत उपयोग पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में सामान्य सर्दी–बुखार, हल्का छाती संक्रमण और छोटा ऑपरेशन भी जीवन के लिए खतरा बन सकता है. AMR हमें यह याद दिला रहा है कि दवाइयां जितनी शक्तिशाली होती हैं, उनका गलत उपयोग उतना ही विनाशकारी साबित होता है. संक्रमण से लड़ाई का पहला हथियार एंटीबायोटिक नहीं बल्कि जिम्मेदारी, जागरूकता और वैज्ञानिक उपचार पद्धति है.

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