क्या होता है डिजिटल अरेस्ट, क्या पैसा गंवाने पर बैंक देगा मुआवजा और सुप्रीम कोर्ट ने RBI से क्यों मांगा जवाब? 10 FAQ
डिजिटल अरेस्ट ठगी पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंक या वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल में कमी मिलने पर पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए. अदालत ने संदिग्ध ट्रांजैक्शन रोकने, असामान्य गतिविधियों की तुरंत रिपोर्टिंग और RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा पर जोर दिया.
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों की करोड़ों रुपये की जमा-पूंजी लूटने वाले साइबर ठगों पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही पर जोर दिया है. गुरुवार को सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि जांच में धोखाधड़ी की वजह बैंक या वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल (Due Diligence) में कमी पाई जाती है, तो पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए. अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि संदिग्ध लेनदेन होने के बाद सिर्फ रिपोर्ट तैयार करने से क्या फायदा, जब समय रहते पैसा ट्रांसफर होने से रोका जा सकता है.
डिजिटल अरेस्ट और बैंक की जवाबदेही: 10 जरूरी FAQ
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल अरेस्ट को लेकर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की और RBI से जवाब मांगा. आखिर डिजिटल अरेस्ट क्या होता है और क्या पैसा गंवाने पर बैंक मुआवजाद देगा... आइए ऐसे ही अक्सर पूछे जाने वाले सवाल और उनके जवाब जानते हैं...
डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी का एक तरीका है, जिसमें ठग खुद को पुलिस, CBI, कस्टम, अदालत या किसी दूसरी जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं. वे फोन, वीडियो कॉल या मैसेज के जरिए फर्जी गिरफ्तारी, मनी लॉन्ड्रिंग या किसी अपराध में शामिल होने की धमकी देते हैं. इसके बाद कथित जांच या सत्यापन के नाम पर पीड़ित से बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर कराए जाते हैं. यह असली कानूनी गिरफ्तारी नहीं, बल्कि डर और दबाव के जरिए की जाने वाली धोखाधड़ी है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि धोखाधड़ी की जांच में बैंक या वित्तीय संस्थान की उचित जांच-पड़ताल में कमी सामने आती है, तो पीड़ित को मुआवजा देने की व्यवस्था होनी चाहिए. हालांकि, अदालत ने अभी सभी मामलों में मुआवजा देने का अंतिम आदेश नहीं दिया है. जिम्मेदारी तय करने के लिए बैंक की भूमिका, लागू नियमों और मामले के तथ्यों को देखना होगा.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने ने संदिग्ध लेनदेन को समय रहते रोकने और धोखाधड़ी की आशंका होने पर तुरंत कार्रवाई करने की जरूरत बताई. पीठ ने असामान्य ट्रांजैक्शन पर अस्थायी रोक, संदिग्ध गतिविधियों की स्वचालित रिपोर्टिंग और लेनदेन की वास्तविकता की पुष्टि जैसे उपायों पर जोर दिया. इन उपायों का उद्देश्य पीड़ित की रकम ठगों तक पहुंचने से पहले संभावित धोखाधड़ी को रोकना है.
सुनवाई में पेश जानकारी के मुताबिक, RBI के प्रस्तावित KYC संशोधन निर्देश, 2026 को 30 नवंबर तक अधिसूचित करने और 31 दिसंबर तक लागू करने की योजना है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह इन प्रस्तावित निर्देशों की समीक्षा करेगा. इसलिए इन्हें अभी से लागू नियम या अंतिम न्यायिक आदेश नहीं माना जाना चाहिए.
बैंक किसी ग्राहक के सामान्य लेनदेन के पैटर्न से अचानक होने वाले बड़े या असामान्य ट्रांसफर को जांच के लिए चिह्नित कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, लंबे समय से सीमित लेनदेन करने वाले खाते से अचानक बड़ी रकम कई नए खातों में भेजी जाए, तो अतिरिक्त सत्यापन की जरूरत हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के निवारक उपायों पर विचार करने को कहा है. हालांकि, हर असामान्य ट्रांजैक्शन धोखाधड़ी नहीं होता; जांच और उचित सत्यापन जरूरी है.
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने डिजिटल अरेस्ट के नाम पर लोगों के ठगे जाने पर नाराजगी जताई. LiveLaw की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने टिप्पणी की कि लोकतांत्रिक देश में कोई व्यक्ति मोबाइल पर गिरफ्तारी की बात सुनकर उसे सच कैसे मान सकता है. अदालत की चिंता यह थी कि जागरूकता अभियानों और मीडिया में लगातार खबरें आने के बावजूद लोग ऐसे जाल में फंस रहे हैं.
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने बताया कि पिछले वर्ष की तुलना में रिपोर्ट किए गए डिजिटल अरेस्ट मामलों में करीब 50 प्रतिशत की कमी आई है. इसके बावजूद मुख्य न्यायाधीश ने इस साल लगभग 800 करोड़ रुपये के नुकसान का उल्लेख किया. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल I4C और गृह मंत्रालय की स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक, 1 जनवरी से 31 अगस्त 2026 के बीच डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी की 21,900 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें 647 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम शामिल थी.
दिल्ली में जनकपुरी के एक शख्स को 2.10 करोड़ रुपये की कथित डिजिटल अरेस्ट ठगी का निशाना बनाया गया. इस मामले से जुड़े म्यूल बैंक खाते में 98,592 रुपये आने की बात सामने आई. हैदराबाद में 63 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मचारी और उनकी बेटी से कथित तौर पर 29.17 लाख रुपये ठगे गए. वहीं, केरल के कोझिकोड में 57 वर्षीय महिला ने कथित तौर पर 1.35 करोड़ रुपये गंवाए. इन मामलों में ठगों ने खुद को जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराया.
दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर तालुक के 62 वर्षीय किसान को कथित तौर पर मुंबई पुलिस और एंटी-टेररिज्म स्क्वॉड के अधिकारी बनकर फोन किया गया. उन्हें पहलगाम आतंकी हमले के एक संदिग्ध को पैसे ट्रांसफर करने से जोड़कर डराया गया. पुलिस के मुताबिक, किसान को 2 सितंबर से 6 अक्टूबर 2026 तक डिजिटल अरेस्ट के नाम पर दबाव में रखा गया और अलग-अलग बैंक खातों में 1.31 करोड़ रुपये ट्रांसफर कराए गए. यह मामला दिखाता है कि ठग राष्ट्रीय सुरक्षा और गंभीर अपराधों का नाम लेकर भी लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं.
डिजिटल अरेस्ट का फोन आने पर घबराकर किसी खाते में पैसे ट्रांसफर न करें. वीडियो कॉल पर पुलिस या जांच एजेंसी का दावा करने वाले व्यक्ति को अपनी बैंकिंग जानकारी, OTP या पासवर्ड न दें. याद रखें कि फोन या वीडियो कॉल पर कोई व्यक्ति आपको कानूनी रूप से गिरफ्तार नहीं कर सकता. कॉल काटकर संबंधित पुलिस या सरकारी एजेंसी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से जानकारी सत्यापित करें. यदि पैसे ट्रांसफर हो गए हैं, तो तुरंत अपने बैंक को सूचित करें और भारत के साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें. शिकायत राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी दर्ज की जा सकती है.




