IIT से निकाले गए, नोबेल ठुकराया और बन गए सत्ता के सबसे विवादित खिलाड़ी! Subramanian Swamy की कैसे हुई राजनीति में Entry?
IIT से निकाले जाने से लेकर नोबेल प्राइज ठुकराने तक, जानिए सुब्रमण्यम स्वामी का पूरा राजनीतिक सफर, विवाद और सत्ता के खेल की अनसुनी कहानी.
भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिन्हें आप चाहें तो पसंद करें या नापसंद, लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते. सुब्रमण्यम स्वामी उन्हीं में से एक हैं. कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर आलोचक रहे स्वामी आज उसी विचारधारा के करीब माने जाते हैं. इस बीच उन्होंने स्टेट मिरर हिंदी से बातचीत करते हुए अपने कुछ राजनीतिक दिनों के खुलासे किए हैं तो आइए एक नजर डालते हैं उन्होंने क्या कुछ कहा है?
क्या है स्वामी के राजनीतिक सफर की सबसे बड़ी खासियत?
स्वामी का राजनीतिक जीवन लगातार बदलते रिश्तों और विचारों का आईना है. कभी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के करीबी माने जाने वाले स्वामी आज कांग्रेस पार्टी के सबसे मुखर आलोचकों में गिने जाते हैं. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत लेफ्ट-लिबरल झुकाव के साथ की थी, लेकिन समय के साथ उनका रुख पूरी तरह बदल गया. आज वे भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हैं और संघ परिवार के करीब माने जाते हैं.
IIT से निकाले जाने के बाद कैसे बदली जिंदगी?
स्टेट मिरर से बातचीत करते हुए स्वामी ने दावा है कि उनका जीवन उस समय पूरी तरह बदल गया, जब उन्हें आईआईटी दिल्ली से बाहर कर दिया गया. वे बताते हैं कि उस दौर में उन्हें न सिर्फ नौकरी से निकाला गया, बल्कि दूसरी जगह काम करने से भी रोका गया. हालांकि अदालत ने बाद में उनके पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन तब तक हालात बदल चुके थे. यही वह मोड़ था, जहां उन्होंने अकादमिक दुनिया से हटकर राजनीति की राह चुन ली.
नोबेल प्राइज छोड़कर भारत लौटने का फैसला क्यों किया?
सुब्रमण्यम स्वामी ने आगे कहा कि 'अगर मैं प्रोफेसर नहीं होता, तो शायद राजनीति में भी नहीं आता…” स्वामी का यह बयान उनके जीवन की दिशा को समझाता है. वे बताते हैं कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी रिसर्च इतनी मजबूत थी कि उन्हें नोबेल प्राइज तक का संकेत मिला. उनके गाइड ने कहा था. 'एक-दो साल और रुक जाओ, तुम्हें नोबेल मिल सकता है.' लेकिन स्वामी ने जवाब दिया कि 'नोबेल लेकर क्या करूंगा? मुझे भारत लौटना है.' यही फैसला उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.
राजनीति में एंट्री कैसे हुई?
भारत लौटने के बाद जब हालात उनके खिलाफ हो गए, तब स्वामी ने राजनीति में कदम रखा. इस दौरान नानाजी देशमुख ने उनकी अहम मदद की. स्वामी के मुताबिक, 'संघ ने मुझे सपोर्ट किया और नानाजी देशमुख को मेरे पास भेजा, जिन्होंने कहा कि हम आपको सांसद बना देंगे.' इसके बाद वे 1974 में संसद पहुंचे और सक्रिय राजनीति की शुरुआत हुई. इमरजेंसी के समय स्वामी का नाम चर्चा में आया. वे अमेरिका से भारत आए, संसद सत्र में हिस्सा लिया और फिर वापस लौट गए. यह दौर उनके राजनीतिक करियर का अहम हिस्सा बना, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई.
कैलाश मानसरोवर को लेकर क्या है उनका नजरिया?
कैलाश मानसरोवर को लेकर स्वामी का जुड़ाव बचपन से रहा है. वे बताते हैं कि उनकी मां उन्हें कैलाश मानसरोवर के बारे में कहानियां सुनाती थीं, जिससे यह स्थान उनके मन में गहराई से बस गया. स्वामी का मानना है कि यह धार्मिक स्थल भारत की आस्था से जुड़ा है, लेकिन चीन के कब्जे में होना उन्हें हमेशा खटकता रहा. उन्होंने यह भी कहा कि हार्वर्ड में पढ़ाते समय कई चीनी छात्र उनके संपर्क में आए, लेकिन उन्होंने खुद को “एंटी-कम्युनिस्ट” बताते हुए भी संवाद का रास्ता चुना.




