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जांघों के बीच प्राइवेट पार्ट रगड़कर किया Ejaculation रेप नहीं, रेप की कोशिश; फिर कोर्ट ने क्यों सुनाई पांच साल की सजा

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 के एक चर्चित यौन अपराध मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने आरोपी की रेप की सजा को बदलते हुए कहा कि मेडिकल और अन्य साक्ष्य वास्तविक दुष्कर्म साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

जांघों के बीच प्राइवेट पार्ट रगड़कर किया Ejaculation रेप नहीं, रेप की कोशिश; फिर कोर्ट ने क्यों सुनाई पांच साल की सजा
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सागर द्विवेदी
By: सागर द्विवेदी4 Mins Read

Updated on: 18 July 2026 10:20 PM IST

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने वर्ष 2016 के एक चर्चित यौन अपराध मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने आरोपी की रेप की सजा को बदलते हुए कहा कि मेडिकल और अन्य साक्ष्य वास्तविक दुष्कर्म साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. हालांकि, कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी ने दुष्कर्म करने की साफ और गंभीर कोशिश की थी. इसी आधार पर अदालत ने रेप की दोषसिद्धि को 'दुष्कर्म के प्रयास' में बदल दिया और 10 साल की सजा घटाकर 5 साल के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दी.

यह मामला जुलाई 2016 का है. पुलिस थाना कलामाबाद में शोकत अहमद सीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई थी. आरोप था कि उसने एक नाबालिग लड़की को खेतों से बहला-फुसलाकर पास के जंगल में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया. घटना के समय पीड़िता के पिता सेना में पोर्टर के रूप में ड्यूटी पर तैनात थे.

मामले की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रणबीर दंड संहिता (RPC) की धारा 376 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी. इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की.

मेडिकल रिपोर्ट ने क्या बताया?

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजय परिहार ने मेडिकल रिपोर्ट का विस्तार से अध्ययन किया. रिपोर्ट में पाया गया कि पीड़िता का हाइमन (Hymen) सुरक्षित था और शारीरिक जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि उसके साथ वास्तविक यौन संबंध (Penetration) बनाया गया था. मेडिकल अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि दुष्कर्म (Coitus) का कोई चिकित्सीय प्रमाण नहीं मिला.

गवाही में भी सामने आए विरोधाभास

पीड़िता ने अपने बयान में कहा था कि आरोपी उसे खेतों से घसीटकर जंगल ले गया था. लेकिन मेडिकल जांच में उसके शरीर पर घसीटे जाने या संघर्ष के कोई चोट के निशान नहीं मिले. हाईकोर्ट ने पीड़िता की मां की गवाही पर भी सवाल उठाए.

उन्होंने दावा किया था कि उन्होंने आरोपी को पीड़िता के ऊपर लेटा हुआ देखा था. लेकिन अदालत ने पाया कि शुरुआती बयान में उन्होंने खुद कहा था कि घटना के समय वह दवा लेने बाजार गई थीं. ऐसे में उनका घटनास्थल पर मौजूद होना संदेहास्पद माना गया.

फिर भी आरोपी को क्यों नहीं मिली राहत?

हालांकि अदालत ने माना कि दुष्कर्म साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य साक्ष्यों से यह साफ हुआ कि आरोपी ने अपराध करने की पूरी कोशिश की थी. मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर के संवेदनशील हिस्से (Perineum) पर चोट पाई गई. वहीं पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि आरोपी ने उसके कपड़े फाड़े, उसे निर्वस्त्र किया और यौन हमला करने की कोशिश की.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति संजय परिहार ने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति पीड़िता को निर्वस्त्र कर उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाने की कोशिश करता है, लेकिन वास्तविक प्रवेश (Penetration) साबित नहीं होता, तो यह दुष्कर्म का प्रयास (Attempt to Commit Rape) माना जाएगा.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि 'रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य दुष्कर्म को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन इससे यह स्पष्ट रूप से साबित होता है कि आरोपी ने दुष्कर्म करने का गंभीर प्रयास किया था.'

हाईकोर्ट का अंतिम फैसला

हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को धारा 376 (रेप) से बदलकर धारा 376 सहपठित धारा 511 (रेप का प्रयास) के तहत कर दिया. साथ ही अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई 10 साल की कठोर कैद को घटाकर 5 साल का कठोर कारावास कर दिया. इसके अलावा आरोपी पर 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. यदि वह जुर्माना नहीं भरता है, तो उसे तीन महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी. कोर्ट ने सजा कम करते समय यह भी ध्यान में रखा कि घटना के समय आरोपी की उम्र अपेक्षाकृत कम थी और वह पहले ही काफी समय जेल में बिता चुका है.

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