ढाका नहीं, वॉशिंगटन में हुई थी इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी जीत! आखिर ऐसा क्या हुआ कि निक्सन भारत से डरने लगा?
1971 में इंदिरा गांधी और रिचर्ड निक्सन की व्हाइट हाउस मुलाकात क्यों इतिहास बन गई? जानिए व्हाइट हाउस टेप्स, हेनरी किसिंजर, बांग्लादेश युद्ध और भारत की कूटनीतिक जीत की पूरी कहानी.
कल्पना कीजिए... दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति का राष्ट्रपति व्हाइट हाउस में बैठा है और सामने आने वाली हैं भारत की प्रधानमंत्री. माहौल औपचारिक है, लेकिन हवा में तनाव घुला हुआ है. बाद में सार्वजनिक हुए व्हाइट हाउस टेप्स से पता चला कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने निजी बातचीत में भारत और इंदिरा गांधी के प्रति बेहद अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया था, लेकिन सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति भारत पर दबाव बनाने के बावजूद अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकी?
तो क्या 1971 की सबसे बड़ी जीत ढाका में नहीं, बल्कि वॉशिंगटन में हुई थी? और क्या आज डोनाल्ड ट्रंप के दौर में भारत-अमेरिका रिश्तों में दिख रही तल्खी कहीं उस इतिहास की हल्की-सी झलक फिर दिखाती है? आइए, उस पूरी कहानी को सिलसिलेवार समझते हैं.
Credit : U.S. National Archives
27 जुलाई 1982 की यात्रा ने क्यों ताजा कर दी 1971 की यादें?
दरअसल, 27 जुलाई 1982 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तीसरी और अंतिम बार अमेरिका के दौरे पर गई थीं. इस बार व्हाइट हाउस में उनके मेजबान राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन थे, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा 1971 की उनकी उस यात्रा की थी, जब व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन बैठे थे. दोनों दौरों के बीच 11 साल का अंतर जरूर था, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों पर 1971 की छाया अभी भी मौजूद थी. कहा जाता है कि नवंबर 1971 में निक्सन ने इंदिरा गांधी को करीब 45 मिनट तक इंतजार कराया था, जिसे अपमानजनक माना गया था.
क्या निक्सन ने की थीं इंदिरा के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियां?
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश संकट के दौरान सार्वजनिक हुए डीक्लासिफाइड (गोपनीयता हटाए गए) White House Tapes से यह साफ हुआ था कि अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने निजी बातचीत में इंदिरा गांधी और भारतीयों के बारे में अपमानजनक तथा नस्लवादी टिप्पणियां की थीं. यह बातचीत इंदिरा गांधी के व्हाइट हाउस से जाने के बाद हुई थी और बाद में The New York Times सहित कई स्रोतों के माध्यम से सार्वजनिक हुई.
नवंबर 1971 में इंदिरा गांधी वॉशिंगटन के आधिकारिक दौरे पर थीं. उन्होंने निक्सन से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचारों और भारत में आए लाखों शरणार्थियों के संकट पर चर्चा की. बैठक समाप्त होने के बाद ओवल ऑफिस में हुई निजी बातचीत में निक्सन ने इंदिरा गांधी के लिए "Old Witch" (बूढ़ी चुड़ैल) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जबकि हेनरी किसिंजर ने उन्हें "Bitch" कहकर संबोधित किया. निक्सन ने किसिंजर से कहा, "We slobbered over the old witch." इस पर किसिंजर ने जवाब दिया, "While she was a bitch, we got what we wanted." ये टिप्पणियां सार्वजनिक मंच पर नहीं, बल्कि दोनों नेताओं के बीच निजी बातचीत का हिस्सा थीं.
यही नहीं, डीक्लासिफाइड टेप्स से यह भी सामने आया कि निक्सन केवल इंदिरा गांधी के प्रति ही नहीं, बल्कि भारतीयों के प्रति भी गहरे पूर्वाग्रह रखते थे. जून 1971 की एक रिकॉर्डेड बातचीत में उन्होंने भारतीय महिलाओं को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की और भारतीयों को "pathetic", "sexless" जैसे शब्दों से संबोधित किया. एक अन्य बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि भारतीय "reproduce" यानी संबंध कैसे बनाते हैं. वहीं निक्सन और किसिंजर ने भारतीयों के लिए "slippery and treacherous", "scavenging people" और "bastards" जैसे अपमानजनक शब्दों का भी इस्तेमाल किया.
निक्सन और किसिंजर भारत के इतने खिलाफ क्यों थे?
इतिहासकारों के अनुसार इसके पीछे केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं, बल्कि उस दौर की भू-राजनीतिक (Geopolitical) रणनीति थी. निक्सन प्रशासन पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याह्या खान को चीन के साथ अमेरिका के गुप्त संपर्क का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम मानता था. जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के रास्ते ही गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे थे, जिससे अमेरिका-चीन संबंधों का नया अध्याय शुरू हुआ. इसलिए पूर्वी पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई के बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन जारी रखा और भारत पर संयम बरतने का दबाव बनाया. दूसरी ओर भारत ने अगस्त 1971 में सोवियत संघ के साथ मैत्री संधि कर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत कर ली थी.
इंदिरा गांधी ने अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी नीति नहीं बदली. उन्होंने शरणार्थी संकट को केवल भारत-पाकिस्तान का मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे मानवीय और अंतरराष्ट्रीय प्रश्न के रूप में दुनिया के सामने रखा. दिसंबर 1971 के युद्ध में भारत की जीत और बांग्लादेश के गठन के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत ने अपनी विदेश नीति किसी महाशक्ति के दबाव में नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय की थी. यही कारण है कि 1971 की घटनाओं को भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है.
वर्ष 2005 में जब व्हाइट हाउस टेप्स सार्वजनिक हुए, तब इन टिप्पणियों पर काफी चर्चा हुई. बाद के वर्षों में हेनरी किसिंजर ने इन टिप्पणियों पर खेद व्यक्त करते हुए कहा कि वे शीत युद्ध के तनावपूर्ण माहौल में कही गई बातें थीं और उन्होंने इंदिरा गांधी को एक महत्वपूर्ण तथा प्रभावशाली नेता माना.
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पूर्वी पाकिस्तान का संकट भारत की सबसे बड़ी चुनौती क्यों बना?
कहानी की शुरुआत 25 मार्च 1971 से होती है. पाकिस्तान की सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया. बंगाली राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलने के लिए ढाका विश्वविद्यालय, बुद्धिजीवियों, छात्रों और आम नागरिकों पर व्यापक कार्रवाई की गई. देखते ही देखते लाखों लोग जान बचाकर भारत की सीमा में आने लगे.
एक अनुमान के मुताबिक लगभग एक करोड़ शरणार्थी पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम, मेघालय और बिहार पहुंच गए. उस समय भारत पहले से आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था. ऐसे में यह केवल मानवीय संकट नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी सवाल बन गया. संसद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक इंदिरा गांधी लगातार कह रही थीं कि यह केवल पाकिस्तान का आंतरिक मामला नहीं रह गया है.
युद्ध शुरू होने से पहले इंदिरा गांधी दुनिया क्यों घूमीं?
यहीं इंदिरा गांधी ने वह कदम उठाया, जिसने आगे चलकर युद्ध का परिणाम भी प्रभावित किया. उन्होंने समझ लिया था कि केवल सेना के भरोसे लड़ाई नहीं जीती जाएगी. अगर दुनिया भारत की बात नहीं समझेगी, तो संयुक्त राष्ट्र में युद्धविराम का दबाव भारत की पूरी रणनीति बिगाड़ सकता है.
इसी सोच के साथ उन्होंने 1971 में मॉस्को, लंदन, पेरिस, बॉन, ब्रुसेल्स, ओटावा और वॉशिंगटन का दौरा किया. हर मंच पर उन्होंने एक ही बात दोहराई- भारत युद्ध नहीं चाहता, लेकिन एक करोड़ शरणार्थियों का बोझ अनिश्चितकाल तक नहीं उठा सकता. यही वह कूटनीतिक तैयारी थी, जिसने आगे चलकर भारत की सबसे बड़ी ताकत का काम किया.
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व्हाइट हाउस में आखिर क्या हुआ था?
4 नवंबर 1971 को इंदिरा गांधी की राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से मुलाकात हुई. बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई दिया, लेकिन असली कहानी बाद में सामने आई. वर्षों बाद सार्वजनिक हुई White House Tapes से पता चला कि बैठक खत्म होने के बाद ओवल ऑफिस में निक्सन और उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर ने इंदिरा गांधी और भारत के बारे में बेहद अपमानजनक टिप्पणियां की थीं. यही वह रिकॉर्ड था, जिसने दुनिया को बताया कि व्हाइट हाउस के भीतर भारत को किस नजर से देखा जा रहा था.
लेकिन इसके पीछे वजह केवल व्यक्तिगत नाराजगी नहीं थी. उस समय अमेरिका पाकिस्तान के सैन्य शासक जनरल याह्या खान के जरिए चीन के साथ अपने गुप्त संबंध बना रहा था. जुलाई 1971 में हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के रास्ते गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे थे. इसलिए निक्सन प्रशासन किसी भी कीमत पर पाकिस्तान को कमजोर नहीं होने देना चाहता था.
फिर भी इंदिरा गांधी पीछे क्यों नहीं हटीं?
इंदिरा गांधी ने अमेरिकी दबाव के बावजूद अपनी रणनीति नहीं बदली. अगस्त 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ Indo-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation पर हस्ताक्षर किए. यह सैन्य गठबंधन नहीं था, लेकिन इससे दुनिया को साफ संकेत मिला कि यदि भारत पर बाहरी दबाव बढ़ा तो उसके पास एक मजबूत रणनीतिक सहारा मौजूद है. यही संधि आगे चलकर भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक ढाल साबित हुई.
सातवां बेड़ा आया, लेकिन भारत नहीं रुका
3 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया और युद्ध शुरू हो गया. कुछ ही दिनों बाद अमेरिका ने अपना Seventh Fleet और विमानवाहक पोत USS Enterprise बंगाल की खाड़ी की ओर भेज दिया. इसका उद्देश्य भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना था.
लेकिन इंदिरा गांधी पीछे नहीं हटीं. दूसरी तरफ सोवियत नौसेना की मौजूदगी भी हिंद महासागर में बढ़ गई. भारत ने अपना सैन्य अभियान जारी रखा और केवल 13 दिनों में भारतीय सेना तथा मुक्ति वाहिनी ने ढाका को घेर लिया. 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल ए.ए.के. नियाज़ी ने लगभग 93 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया.
क्या असली जीत वॉशिंगटन में मिली थी?
ढाका में जीत सेना ने हासिल की, लेकिन उसकी नींव महीनों पहले कूटनीति में रखी जा चुकी थी. अगर भारत बिना अंतरराष्ट्रीय तैयारी के युद्ध शुरू करता, तो संयुक्त राष्ट्र में तत्काल युद्धविराम का दबाव अभियान को अधूरा छोड़ सकता था. इंदिरा गांधी ने पहले दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि भारत आक्रामक नहीं, बल्कि शरणार्थी संकट और अपनी सुरक्षा की मजबूरी में कार्रवाई कर रहा है.
इसी दौरान ढाका स्थित अमेरिकी महावाणिज्यदूत आर्चर ब्लड ने प्रसिद्ध Blood Telegram भेजकर पाकिस्तान की कार्रवाई की आलोचना की. इससे अमेरिकी प्रशासन की आधिकारिक नीति और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर भी दुनिया के सामने आया.
1971 ने भारत को क्या सिखाया?
1971 की जीत ने केवल बांग्लादेश का निर्माण नहीं किया, बल्कि भारत की विदेश नीति की दिशा भी बदल दी. दुनिया ने पहली बार देखा कि भारत किसी महाशक्ति की इच्छा से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले लेने की क्षमता रखता है. बाद के दशकों में चाहे परमाणु परीक्षण हों, कारगिल युद्ध हो या आज की Strategic Autonomy, उसकी बुनियाद कहीं न कहीं 1971 के उसी आत्मविश्वास में दिखाई देती है.
इंदिरा गांधी के राजनीतिक जीवन को लेकर मतभेद हो सकते हैं और आपातकाल जैसे फैसलों की आलोचना भी इतिहास का हिस्सा है, लेकिन 1971 के संकट प्रबंधन, कूटनीतिक तैयारी और सैन्य नेतृत्व को भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है. शायद इसलिए कई इतिहासकार मानते हैं कि 1971 की सबसे बड़ी गूंज केवल ढाका में नहीं, बल्कि वॉशिंगटन के उन बंद कमरों में भी सुनाई दी, जहां दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति भारत का इरादा बदलने में नाकाम रही.




