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सिंधु जल संधि पर भारत ने फिर लगाई पाकिस्तान की फटकार, रिजेक्ट किया हेग कोर्ट का फैसला- 10 Point में समझें नापाक की 'बेकरारी'

सिंधु जल संधि पर हेग की अदालत के फैसले को भारत ने खारिज कर दिया है. जानिए 1960 की संधि, पहलगाम हमले के बाद विवाद और भारत के रुख की पूरी कहानी.

सिंधु जल संधि पर भारत ने फिर लगाई पाकिस्तान की फटकार, रिजेक्ट किया हेग कोर्ट का फैसला- 10 Point में समझें नापाक की बेकरारी
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( Image Source:  ANI )

भारत और पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर करीब 66 साल पुरानी व्यवस्था एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय विवाद के केंद्र में है. हेग स्थित Permanent Court of Arbitration यानी मध्यस्थता अदालत ने सिंधु जल संधि को लेकर भारत के खिलाफ टिप्पणी करते हुए कहा है कि 1960 में हुई यह संधि अभी भी प्रभावी है और भारत इसके तहत अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता. लेकिन भारत ने इस फैसले को मानने से साफ इनकार कर दिया है.

भारत सरकार का कहना है कि जिस तथाकथित मध्यस्थता अदालत ने यह टिप्पणी की है, उसके पास भारत के संप्रभु फैसलों पर फैसला सुनाने का कोई अधिकार ही नहीं है. विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत ने इस निकाय को कभी कानूनी तौर पर मान्यता नहीं दी और न ही उसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया है. इसलिए अदालत का फैसला भारत की कार्रवाई को प्रभावित नहीं करेगा. यानी मामला सिर्फ पानी बांटने का नहीं है. इसके पीछे भारत-पाकिस्तान के बीच आतंकवाद, संप्रभुता, जल संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को लेकर एक बड़ा टकराव खड़ा हो गया है.

आखिर सिंधु जल संधि क्या है और 1960 में इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर सितंबर 1960 में हुई थी. विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते का मकसद सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के बीच स्पष्ट व्यवस्था बनाना था. संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों के पानी के इस्तेमाल को दोनों देशों के बीच बांटने की व्यवस्था की गई. इस समझौते ने कई दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच जल संबंधों के लिए एक ढांचा उपलब्ध कराया. लेकिन समय के साथ इस संधि से जुड़े प्रावधानों और भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर विवाद बढ़ता गया.

इस कहानी में सबसे बड़ा मोड़ 22 अप्रैल 2025 को आया, जब जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकवादी हमला हुआ. इस हमले में 26 लोगों की मौत हुई. हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई कड़े कदम उठाए. इन्हीं फैसलों में सिंधु जल संधि को भी तत्काल प्रभाव से रोकना यानी 'abeyance' में रखना शामिल था. भारत ने इसके साथ अपना रुख साफ कर दिया कि आतंकवाद और पानी के बीच सामान्य संबंध बनाए रखना संभव नहीं है.

भारत का संदेश था-'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते.'

नई दिल्ली ने कहा कि जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन से संचालित होने वाले सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क के खिलाफ सत्यापन योग्य और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक संधि से जुड़ी सामान्य व्यवस्था बहाल नहीं की जाएगी.

अब हेग की अदालत ने क्या कहा?

इसी विवाद के बीच हेग स्थित Court of Arbitration ने सिंधु जल संधि को लेकर अपना रुख सामने रखा. अदालत ने कहा कि भारत के पास संधि को निलंबित या समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं है और संधि अभी भी पूरी तरह लागू है. अदालत ने भारत से संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने को कहा. मामला केवल संधि के अस्तित्व तक सीमित नहीं रहा. अदालत ने भारत की जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े कुछ अंतरिम उपाय भी बताए.

अदालत के अनुसार, भारत को Ratle Hydroelectric Project यानी RHEP के बांध की दीवार और पावर इंटेक स्ट्रक्चर को कुछ निर्धारित स्तरों से ऊपर कंक्रीट करने पर अस्थायी रोक का पालन करना होगा. यह प्रतिबंध Neutral Expert के अंतिम फैसले के 90 दिन बाद तक लागू रहने की बात कही गई है. Neutral Expert के अंतिम निर्णय की अपेक्षा जुलाई 2027 में बताई गई है.

1. भारत ने क्यों कहा- 'इस अदालत के पास कोई अधिकार नहीं'?

यहीं से विवाद और गंभीर हो जाता है. भारत का कहना है कि यह Court of Arbitration खुद ही उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसे भारत शुरू से अवैध और संधि के प्रावधानों के खिलाफ मानता आया है. विदेश मंत्रालय के मुताबिक, इस तथाकथित अदालत का गठन विश्व बैंक ने संधि की शर्तों का उल्लंघन करते हुए किया. भारत ने इसलिए न तो इस निकाय की वैधता स्वीकार की और न ही इसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया. भारत का तर्क है कि संधि में जल विवादों को सुलझाने के लिए पहले से एक निर्धारित व्यवस्था मौजूद है.

2. भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद आखिर है किस बात पर?

पाकिस्तान ने भारत की कुछ जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन को लेकर आपत्ति जताई थी. खास तौर पर Kishenganga और Ratle Hydroelectric Projects को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद सामने आया. पाकिस्तान ने इन मतभेदों को Court of Arbitration के सामने उठाया. भारत का कहना है कि इस तरह के तकनीकी विवादों के समाधान के लिए संधि में Neutral Expert की व्यवस्था है. ऐसे में उसी मामले को समानांतर रूप से Court of Arbitration के सामने ले जाना संधि में तय विवाद समाधान प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है. यही वजह है कि भारत शुरुआत से ही इस मध्यस्थता प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहा है.

3. भारत का सबसे बड़ा तर्क क्या है?

भारत के रुख को तीन बड़े हिस्सों में समझा जा सकता है.

पहला- संधि पर भारत का फैसला.

भारत का कहना है कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को abeyance में रखने का फैसला भारत का संप्रभु निर्णय है.

दूसरा- अदालत की वैधता.

भारत इस Court of Arbitration को कानूनी रूप से मान्यता नहीं देता और इसलिए उसके आदेशों को बाध्यकारी नहीं मानता.

तीसरा- आतंकवाद.

भारत का कहना है कि पाकिस्तान की धरती से सीमा पार आतंकवाद जारी रहने की स्थिति में पहले जैसी जल-साझेदारी व्यवस्था सामान्य रूप से नहीं चल सकती.

4. विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस तथाकथित Court of Arbitration के पास भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है. भारत ने कहा कि इस निकाय के भविष्य के किसी भी फैसले का भारत द्वारा अपनी परियोजनाओं को लेकर किए जा रहे कार्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. नई दिल्ली ने यह भी दोहराया कि सिंधु जल संधि को abeyance में रखने का भारत का निर्णय अभी भी प्रभावी है.

5.पाकिस्तान इस संधि को लेकर इतना चिंतित क्यों है?

सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. पाकिस्तान की कृषि, सिंचाई और जल उपलब्धता का बड़ा हिस्सा इस नदी प्रणाली पर निर्भर करता है. ऐसे में भारत द्वारा संधि को रोकने के फैसले ने पाकिस्तान में पानी को लेकर चिंता बढ़ा दी. हालांकि भारत ने यह संकेत नहीं दिया है कि वह तत्काल पाकिस्तान का पूरा जल प्रवाह रोक रहा है. भारत का मौजूदा रुख संधि की व्यवस्था को abeyance में रखने और अपने अधिकारों के इस्तेमाल को लेकर है. यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

6. क्या भारत अब सिंधु नदी का पूरा पानी रोक सकता है?

यह सवाल सोशल मीडिया और राजनीतिक बहस में अक्सर उठता है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम को सीधे 'भारत ने पाकिस्तान का पूरा पानी रोक दिया' कहना सही तस्वीर नहीं देता. विवाद इस बात पर है कि 1960 की संधि के तहत निर्धारित व्यवस्था अब किस तरह लागू होगी और भारत अपने जल संसाधनों तथा जलविद्युत परियोजनाओं का किस सीमा तक इस्तेमाल कर सकता है. भारत का कहना है कि संधि को abeyance में रखने का उसका निर्णय लागू है, जबकि Court of Arbitration ने संधि को प्रभावी बताते हुए भारत से उसके प्रावधानों का पालन करने को कहा है.

7.Court of Arbitration और Neutral Expert में क्या अंतर है?

यह पूरे मामले को समझने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है. सिंधु जल संधि में विवादों के समाधान के लिए अलग-अलग स्तरों की व्यवस्था है. तकनीकी प्रकृति के सवालों के लिए Neutral Expert की भूमिका महत्वपूर्ण है, जबकि कुछ परिस्थितियों में Court of Arbitration की व्यवस्था भी संधि में मौजूद है. भारत का तर्क है कि Kishenganga और Ratle परियोजनाओं से जुड़े विवाद तकनीकी प्रकृति के हैं और इन्हें Neutral Expert के जरिए देखा जाना चाहिए. पाकिस्तान ने दूसरी ओर इन्हीं मुद्दों को Court of Arbitration के सामने भी उठाया. यहीं से 'एक ही विवाद पर दो समानांतर प्रक्रियाओं' को लेकर भारत की आपत्ति शुरू होती है.

8. Ratle Project पर क्यों टिकी है नजर?

Ratle Hydroelectric Project जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर प्रस्तावित/निर्माणाधीन भारत की महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है. पाकिस्तान ने इसके डिजाइन को लेकर आपत्तियां जताई हैं. भारत का कहना है कि परियोजना सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुरूप है. अब Court of Arbitration के अंतरिम निर्देशों में इस परियोजना के बांध और पावर इंटेक स्ट्रक्चर से जुड़े निर्माण पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं. भारत हालांकि इन निर्देशों को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं मानता, क्योंकि वह इस निकाय के अधिकार क्षेत्र को ही अस्वीकार करता है.

9. 2027 में क्या होने वाला है?

मामले में Neutral Expert के अंतिम निर्णय की अपेक्षा जुलाई 2027 में बताई गई है. Court of Arbitration ने अपने अंतरिम उपायों को Neutral Expert के अंतिम फैसले से जोड़ते हुए कुछ समयसीमा भी निर्धारित की है. इसलिए आने वाले महीनों में यह मामला भारत-पाकिस्तान के बीच सिर्फ कूटनीतिक मुद्दा नहीं रहेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जल कानून और संधि की व्याख्या को लेकर भी महत्वपूर्ण बना रहेगा.

10. क्या सिंधु जल संधि का भविष्य अब खतरे में है?

पहलगाम हमले के बाद भारत द्वारा संधि को abeyance में रखना और अब Court of Arbitration के फैसले को ठुकराना इस बात का संकेत है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच पुरानी व्यवस्था गंभीर दबाव में है. एक तरफ अदालत संधि को प्रभावी बता रही है, दूसरी तरफ भारत उसके अधिकार क्षेत्र और फैसले दोनों को खारिज कर रहा है. इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में विवाद केवल 'पानी कितना मिलेगा' तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून, संधि की वैधता और भारत के संप्रभु अधिकार जैसे मुद्दे भी जुड़े रहेंगे.

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