DUSU Election में चारों खाने चित हुई NSUI, न भुना पाई माहौल, टिकट बंटवारे में भी गड़बड़ी, सवालों में क्यों कन्हैया कुमार?
DUSU Election 2026 में NSUI की हार क्यों हुई? Ticket Distribution, Rebel Candidates, Gen Z Vote, Campus Strategy और Kanhaiya Kumar पर उठे सवाल समझिए.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजों ने एक बार फिर कांग्रेस समर्थित छात्र संगठन NSUI के सामने संगठन, उम्मीदवार चयन और कैंपस रणनीति से जुड़े कई सवाल खड़े कर दिए हैं. ऐसा इसलिए कि एक बार फिर एबीवीपी ने डूसू चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल कर सबको चौंका दिया है तो दूसरी तरफ चुनाव परिणाम आने के बाद से एनएसयूआई के दफ्तर से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक पर सन्नाटा है. जंतर मंतर पर सीजेपी प्रोटेस्ट, पेपर लीक, राहुल गांधी द्वारा पीएम आवास के बाहर प्रदर्शन, डीयू साउथ कैंपस के सामने सत्य निकेतन की दर्दनाक घटना व अन्य पहलुओं की वजह से माहौल पक्ष में होने के बाद भी इसे न भुनाने को लेकर अब तरह तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं.
फिलहाल, डूसू अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने 21,109 वोट लेकर NSUI के विजय शंकर मीणा को 555 वोट से हराया. सचिव और संयुक्त सचिव पद भी ABVP के खाते में गए. वहीं उपाध्यक्ष पद पर NSUI से अलग होकर निर्दलीय उतरे दीपांशु शौकीन ने 27,501 वोट लेकर जीत दर्ज की. संयुक्त सचिव पद पर NSUI से जुड़े रहे विशेष यादव भी 14,045 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे.
यहां इस बात का जिक्र कर दें कि विशेष यादव और दीपांशु शौकीन दोनों एनएसयूआई से जुड़े रहे हैं. ऐसे में अगर इस दोनों को सीटे मिलती तो हो सकता था कि एनएसयूआई डूसू के चार में से तीन पदों पर जीत हासिल करने में सफल होती. ऐसा इसलिए कि अध्यक्ष पद के लिए बहुत वोटों हारने वाले विजय शंकर मीणा को भी दोनों का लाभ मिलता है और वो जीत हासिल करने में सफल होते.
क्या NSUI की सबसे बड़ी चूक टिकट बंटवारे में हुई?
चुनाव से पहले NSUI ने अध्यक्ष पद के लिए विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष के लिए वीर चतरथ, सचिव के लिए नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव के लिए गोपाल चौधरी को मैदान में उतारा. इसी दौरान दीपांशु शौकीन और विशेष यादव जैसे संगठन से जुड़े प्रमुख चेहरों ने टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया.
दोनों ने चुनाव प्रचार में अपने पुराने संगठन के खिलाफ खुलकर मोर्चा लिया. नतीजों ने इस फैसले को और चर्चा में ला दिया. दीपांशु को 27,501 वोट मिले, जबकि NSUI के वीर चतरथ केवल 3,827 वोट पर रह गए. विशेष यादव ने 14,045 वोट हासिल किए, जबकि NSUI के गोपाल चौधरी को 13,829 वोट मिले.
क्या दीपांशु शौकीन टिकट न दे NSUI की बड़ी भूल की?
दीपांशु शौकीन की जीत DUSU 2026 की सबसे बड़ी घटनाओं में रही. NSUI से जुड़े रहे दीपांशु टिकट कटने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे और उन्होंने संगठन के अधिकृत उम्मीदवार से कई गुना ज्यादा वोट हासिल किए. उनकी 27,501 वोट की जीत ने यह सवाल जरूर खड़ा किया कि NSUI ने जिस चेहरे को टिकट नहीं दिया, वह स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर इतना बड़ा समर्थन कैसे जुटा गया. इससे संगठन के भीतर उम्मीदवार चयन और जमीनी नेटवर्क को लेकर बहस तेज होना स्वाभाविक है.
ABVP इस बार भी मजबूत क्यों रही?
ABVP ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पदों पर जीत दर्ज की. यश डबास को 21,109, रिया छबाड़ी को 18,366 और लक्ष्य राज सिंह को 14,156 वोट मिले. इसके पीछे कैंपस स्तर पर संगठन की लगातार मौजूदगी, कॉलेज यूनियनों में नेटवर्क और छात्र मुद्दों पर लंबे समय से चल रहा अभियान महत्वपूर्ण कारक माने जा रहे हैं.
दरअसल, DUSU चुनाव में संगठन की मशीनरी के साथ उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ भी अहम होती है और इस बार ABVP इन दोनों मोर्चों पर प्रभावी दिखाई दी.
क्या NSUI माहौल को वोट में नहीं बदल पाई?
चुनाव से पहले छात्रों के बीच हॉस्टल, कैंपस सुरक्षा, सत्य निकेतन की घटना, लाइब्रेरी, परिवहन और छात्र सुविधाओं जैसे मुद्दे चर्चा में थे. NSUI ने भी अपने अभियान में इन मुद्दों को प्रमुखता दी. कांग्रेस और राहुल गांधी से जुड़े प्रदर्शन तथा जंतर-मंतर जैसे राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच राष्ट्रीय राजनीति का माहौल भी चर्चा में रहा. लेकिन DUSU का चुनाव सीधे छात्रों के कैंपस अनुभव और स्थानीय संगठन से जुड़ा होता है. ऐसे में बड़ा सवाल यही रहा कि NSUI इन मुद्दों को छात्रों के वोट में प्रभावी तरीके से क्यों नहीं बदल पाई.
क्या जाट, पंजाबी और बिहारी छात्रों की उपेक्षा भारी पड़ी?
डीयू में देश के अलग-अलग हिस्सों से छात्र आते हैं और सामाजिक-क्षेत्रीय पहचान कैंपस राजनीति में एक कारक हो सकती है. चुनावी चर्चाओं में जाट, पंजाबी और बिहार से आने वाले छात्रों के समीकरण की भी चर्चा रही.
कन्हैया कुमार पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
NSUI कांग्रेस की छात्र इकाई है, इसलिए चुनाव में संगठन की रणनीति और कांग्रेस से जुड़े प्रमुख चेहरों की भूमिका पर चर्चा होना स्वाभाविक है. इसी क्रम में कन्हैया कुमार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. उनके खिलाफ सवाल यह उठ रहे हैं कि जब दीपांशु को टिकट दे दिया गया था, तो फिर वापस क्यों लिया? उसी दीपांशु ने निर्दलीय चुनाव लड़कर कांग्रेसस के नेताओं को चौंका दिया. विशेष यादव ने टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला लिया.
DUSU 2026 का सबसे बड़ा संदेश क्या?
DUSU 2026 में ABVP ने चार में से तीन केंद्रीय पद जीते, जबकि NSUI कोई केंद्रीय पद नहीं जीत सकी. दूसरी ओर NSUI से अलग होकर निर्दलीय मैदान में उतरे दीपांशु शौकीन ने उपाध्यक्ष पद पर सबसे ज्यादा 27,501 वोट हासिल किए. ऐसे में NSUI के लिए यह चुनाव केवल सीटों की हार नहीं, बल्कि टिकट चयन, संगठनात्मक एकजुटता, बागी उम्मीदवारों और कैंपस स्तर की चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल छोड़ गया है.
डूसू चुनाव 2026 में Gen Z का झुकाव NSUI के पक्ष में क्यों नहीं दिखा?
इसका जवाब केवल राष्ट्रीय राजनीति में तलाशना सही नहीं होगा. दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के लिए हॉस्टल, PG की सुरक्षा, किराया, मेट्रो पास, कैंपस सुविधाएं और रोजगार जैसे सीधे मुद्दे अहम रहे. NSUI ने इन मुद्दों को घोषणापत्र में जगह दी, लेकिन उन्हें वोट में बदलने में कामयाबी नहीं मिली.
दूसरी बड़ी चुनौती संगठन के भीतर की बगावत रही. NSUI से टिकट न मिलने के बाद दीपांशु शौकीन निर्दलीय उतरे और 27,501 वोट लेकर उपाध्यक्ष बने, जबकि NSUI उम्मीदवार वीर चतरथ को सिर्फ 3,827 वोट मिले. इससे व्यक्तिगत लोकप्रियता और संगठन के बीच अंतर सामने आया.
Gen Z सोशल मीडिया पर भी सक्रिय है, लेकिन सिर्फ डिजिटल कैंपेन पर्याप्त नहीं दिखा. DUSU 2026 का परिणाम संकेत देता है कि कैंपस के स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और संगठनात्मक एकजुटता मिलकर वोटिंग व्यवहार को प्रभावित करते हैं.




