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BRICS Summit में ईरान के साथ खड़ा हुआ भारत, US Sanctions पर हमला, इजरायल को सीधे घेरा! क्या बदल गया मोदी सरकार का रुख?

18वें BRICS Summit की संयुक्त घोषणा में एकतरफा Sanctions, West Asia, Gaza और Lebanon को लेकर कड़ा रुख दिखा. US का नाम लिए बिना प्रतिबंधों की आलोचना और Israel से Lebanon से सेना हटाने की मांग के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के रुख में बदलाव आया है.

BRICS Summit में ईरान के साथ खड़ा हुआ भारत, US Sanctions पर हमला, इजरायल को सीधे घेरा! क्या बदल गया मोदी सरकार का रुख?
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शनिवार को नई दिल्ली में 18वें BRICS Summit की संयुक्त घोषणा जारी की गई. इस घोषणा में एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों (Sanctions) और पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर काफी कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया गया है. हालांकि, इस दस्तावेज पर BRICS के सभी 11 सदस्यों की सहमति बनाना भारत के लिए बड़ी चुनौती थी. खासकर पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर समूह के देशों के बीच अलग-अलग राय थी.

लेकिन सिर्फ सहमति बनना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि घोषणा में इस्तेमाल किए गए शब्द भी काफी अहम हैं. इसी वजह से यह सवाल उठ रहा है कि क्या BRICS Declaration भारत के रुख में किसी बदलाव का संकेत देता है?

US का नाम नहीं, लेकिन Sanctions पर कड़ा हमला?

संयुक्त घोषणा में सबसे मजबूत बयानों में से एक एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर है. BRICS ने कहा कि वह ऐसे एकतरफा दबाव वाले कदमों की निंदा करता है, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हैं. घोषणा में कहा गया कि एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध और सेकेंडरी Sanctions के दूरगामी और नकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं और इनका सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है.

घोषणा में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों का भी विरोध किया गया. इसमें ऐसे प्रतिबंध भी शामिल हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी नहीं मिली है. हालांकि, इन दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया. इसके बावजूद इन शब्दों का महत्व रूस और ईरान के लिए काफी ज्यादा है. दोनों ही BRICS सदस्य देशों पर अमेरिका के व्यापक प्रतिबंध हैं और वे लंबे समय से अमेरिकी Sanctions नीति की आलोचना करते रहे हैं. इस तरह घोषणा की भाषा ने मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता को जगह दी, लेकिन इसे अमेरिका पर सीधे हमले में नहीं बदला गया.

टैरिफ का किया जिक्र?

BRICS ने एकतरफा Tariff और गैर-टैरिफ उपायों को लेकर भी गंभीर चिंता जताई. घोषणा में कहा गया कि विश्व व्यापार संगठन यानी WTO के नियमों के खिलाफ उठाए गए ऐसे कदम चिंता का विषय हैं. यहां भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया.

Trump की BRICS पर नजर, भारत भी US Tariff के दबाव में?

यह मुद्दा डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद और महत्वपूर्ण हो गया है. ट्रंप BRICS को कई बार “Anti-American” बता चुके हैं. उन्होंने BRICS के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत Tariff लगाने की धमकी दी है. इसके अलावा डॉलर को कमजोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाने की चेतावनी भी दी है.

अमेरिका और BRICS के बीच तनाव का असर सिर्फ पूरे समूह तक सीमित नहीं है. भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अतिरिक्त अमेरिकी Tariff का सामना करना पड़ा है. भारत ने इन शुल्कों को “अनुचित, अन्यायपूर्ण और तर्कहीन” बताया है और कहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा.

West Asia पर सहमति बनाना भारत के लिए बड़ी चुनौती?

पश्चिम एशिया के मुद्दे पर BRICS के सभी देशों के बीच एक राय बनाना और भी मुश्किल था. ईरान और UAE इस संघर्ष को लेकर अलग-अलग भाषा और रुख चाहते थे. ईरान BRICS से पहले भी नाराजगी जता चुका था, क्योंकि समूह ने अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों को लेकर उसके समर्थन में कोई बयान जारी नहीं किया था. ईरान BRICS से समर्थन चाहता था. अंतिम घोषणा में ईरान का नाम तो नहीं लिया गया, लेकिन उसमें इस्तेमाल की गई कुछ भाषा को तेहरान अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकता है.

परमाणु सुविधाओं पर हमले पर BRICS ने क्या कहा?

BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी IAEA की निगरानी में आने वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों को लेकर “गंभीर चिंता” जताई. इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इजरायल किसी का भी नाम नहीं लिया गया. लेकिन पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के संदर्भ में यह भाषा ईरान के उस तर्क का समर्थन करती दिखाई देती है कि उसकी निगरानी वाली परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे. BRICS ने सभी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही और पश्चिम एशिया में “अधिकतम संयम” बरतने की अपील की.

Declaration में ‘अपने-अपने राष्ट्रीय रुख’ का जिक्र भी महत्वपूर्ण है. इसका मतलब यह है कि अलग-अलग देशों के युद्ध को लेकर अलग विचार होने के बावजूद वे एक ही दस्तावेज पर सहमत हो सकते हैं, बिना अपने व्यक्तिगत रुख को छोड़े. इसी वजह से इतने मतभेदों के बावजूद संयुक्त घोषणा को अपनाना भारत के लिए, जो इस बार BRICS का अध्यक्ष और मेजबान था, एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया.

Israel को लेकर Declaration में क्या?

BRICS की संयुक्त घोषणा में इजरायल को लेकर भाषा ज्यादा स्पष्ट और सीधी है. गाजा को लेकर BRICS ने लगातार जारी हिंसा पर चिंता जताई. समूह ने फिलिस्तीनियों को जबरन विस्थापित किए जाने का विरोध किया और 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु फिलिस्तीनी देश के गठन के समर्थन को दोहराया. इसमें पूर्वी यरुशलम को उसकी राजधानी बनाने की बात कही गई.

घोषणा में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय यानी ICJ में शुरू की गई कार्यवाही का भी जिक्र किया गया. साथ ही कहा गया कि गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाना इजरायल की “कानूनी जिम्मेदारी” है.

Lebanon के मामले में ब्रिक्स का रुख?

BRICS ने Lebanon में हुए युद्धविराम का स्वागत किया और सभी पक्षों से उसकी शर्तों का पूरी तरह पालन करने तथा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की. घोषणा में युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और Lebanon की संप्रभुता तथा क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई.

इसके बाद BRICS ने सीधे इजरायल से अपनी सेनाएं वापस बुलाने की अपील की. घोषणा में कहा गया कि इजरायल Lebanon की सरकार के साथ तय शर्तों का सम्मान करे और उन सभी Lebanese क्षेत्रों से अपनी कब्जे वाली सेनाएं वापस बुलाए, जहां वे अभी मौजूद हैं.

UN Security Council Resolution 1701 क्या है?

UN Security Council Resolution 1701 को 2006 में Israel-Hezbollah युद्ध के बाद अपनाया गया था. इसमें इजरायल की वापसी और दक्षिणी Lebanon में Lebanese सैनिकों तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती का प्रावधान था.

इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है. अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा Sanctions की आलोचना की गई है. परमाणु सुविधाओं वाले हिस्से में ईरान का नाम नहीं लिया गया. लेकिन इजरायल का नाम सीधे लिया गया और उससे Lebanon की जमीन से अपनी सेनाएं वापस बुलाने को कहा गया.

क्या भारत के रुख में सचमुच बदलाव आया है?

Declaration में इस्तेमाल की गई कड़ी भाषा के बावजूद इससे अकेले यह साबित नहीं होता कि भारत की विदेश नीति या पश्चिम एशिया को लेकर उसके रुख में कोई बुनियादी बदलाव आ गया है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि BRICS Declaration सभी 11 सदस्य देशों की सहमति से तैयार किया गया दस्तावेज है. यह केवल भारत का बयान नहीं है. इस बार BRICS अध्यक्ष के तौर पर भारत की जिम्मेदारी थी कि वह अलग-अलग हितों और विचारों वाले देशों को स्वीकार्य भाषा पर सहमत कराए.

भारत लगातार पश्चिम एशिया के मुद्दे पर बातचीत और कूटनीति का समर्थन करता रहा है. वह फिलिस्तीन के लिए Two-State Solution का भी समर्थन करता है और इजरायल के साथ अपने करीबी संबंध बनाए हुए है. BRICS Summit के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से भी मुलाकात की. इस दौरान भारत ने दोहराया कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए. भारत ने समुद्री आवाजाही, व्यापार और नाविकों की सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया.

भारत का व्यापक रुख अलग-अलग पक्षों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है. भारत रूस और यूक्रेन दोनों के साथ संपर्क में है. अमेरिका और इजरायल के साथ उसके महत्वपूर्ण संबंध हैं और ईरान के साथ भी उसने संवाद के रास्ते खुले रखे हैं. हालांकि, जिस माहौल में भारत इन सभी संबंधों को संतुलित कर रहा है, वह बदल चुका है.

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