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Republic Day 2026: EU के लिए रेड कार्पेट से Welcome, अमेरिका को दिल में देगा दर्द! विश्व राजनीति में मोदी का बड़ा मैसेज

Republic Day 2026 India: भारत 26 जनवरी को 77वां गणतंत्र दिवस मनाएगा. यूरोपीय संघ के नेताओं को मुख्य अतिथि बनाकर भारत ने अपनी बदलती विदेश नीति का बड़ा संकेत दिया है कि भारत अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि नियम तय करने वाली ताकत है.

Republic Day 2026: EU के लिए रेड कार्पेट से Welcome, अमेरिका को दिल में देगा दर्द! विश्व राजनीति में मोदी का बड़ा मैसेज
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( Image Source:  ani/ social media )

Republic Day Parade Chief Guest: कर्तव्य पथ पर गणतंत्र की सलामी के साथ जब दुनिया की नजरें भारत पर टिकेंगी, तब रिपब्लिक डे 2026 सिर्फ परेड का दिन नहीं होगा. यह भारत की बदली हुई वैश्विक हैसियत का ऐलान होगा. यूरोपीय यूनियन के लिए बिछा रेड कार्पेट, राष्ट्रपति के ठीक बगल में उर्सुला वॉन डेर लेयेन और एंटोनियो कोस्टा की मौजूदगी और मंच के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, यह तस्वीर अपने आप में बड़ा संदेश है. यह संदेश साफ है, भारत अब केवल उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि नियम तय करने वाली ताकत है.

जैसे वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना हमारे संस्कारों में रची-बसी है, वैसे ही यह गणतंत्र दिवस परेड का आयोजन रणनीतिक साझेदारी, टेक्नोलॉजी, सप्लाई-चेन, ग्रीन एनर्जी और जियो-पॉलिटिक्स पर भारत–EU की नई केमिस्ट्री को दुनिया के सामने रखेगा. गणतंत्र दिवस की शान-ओ-शौकत, सेना की शौर्य-गाथा और सांस्कृतिक झांकियों के बीच, यह डिप्लोमैटिक मंच मोदी सरकार की विदेश नीति का बड़ा संदेश देगा. भारत भरोसेमंद साझेदार है और वैश्विक संतुलन का केंद्र भी.

राष्ट्रपति की मौजूदगी और खास मेहमान

भारत 26 जनवरी को अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है. इसी दिन 1950 में देश में संविधान लागू हुआ था. हर साल दिल्ली के कर्तव्य पथ पर होने वाली भव्य परेड सैन्य शक्ति के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रदर्शन करती है. गणतंत्र दिवस परेड की अध्यक्षता राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू करेंगी. उनके बगल में यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा बैठेंगे, जो इस आयोजन को वैश्विक मंच बना देता है. दोनों ही संयुक्त रूप से इस समोरोह के मुख्य अतिथि भी होंगे.

मुख्य अतिथि का चयन, सिर्फ प्रोटोकॉल नहीं

विदेश मामलों के जानकार बताते हैं कि राष्ट्रपति के बगल में बैठने वाला मेहमान भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं को दर्शाता है. दशकों से मुख्य अतिथि का चयन रणनीतिक संकेत के तौर पर देखा जाता रहा है. इस परंपरा की शुरुआत 1950 में शुरू हुई थी. पहली बार गणतंत्र दिवस परेड में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो शामिल हुए थे.

किन देशों को कितनी बार न्योता मिला?

ब्रिटेन 5 बार (महारानी एलिजाबेथ द्वितीय सहित), फ्रांस और रूस लगभग 5-5 बार, अमेरिका, चीन, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों के नेता भी इसमें शामिल हैं. विदेशी मेहमानों का समागम भारत के बदलते रणनीतिक रिश्तों का प्रतीक है.

मुख्य अतिथि कैसे चुना जाता है?

सबसे पहले विदेश मंत्रालय सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए संभावित देशों की शॉर्टलिस्ट बनाता है. लिस्ट पर प्रधानमंत्री कार्यालय अंतिम फैसला लेता है. रणनीतिक संतुलन, भूराजनीति समीकरण और तय मेहमानों की उपलब्धता देखी जाती है. यह प्रक्रिया कई महीनों तक चलती है.

यूरोपीय संघ क्यों खास?

बीबीसी ने विदेश मामलों के एक्सपर्ट हर्ष वी. पंत के हवाले से बताया है कि यूरोपीय संघ के नेताओं की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि भारत EU के साथ रणनीतिक और व्यापारिक साझेदारी को नई ऊंचाई देना चाहता है. संभावित व्यापार समझौते की भी अटकलें हैं. इस बार रिपब्लिक डे परेड ऐसे समय में हो रहा जब अमेरिका के साथ भारत व्यापार वार्ता में तनाव है.चीन और रूस की वजह से वैश्विक समीकरण बदल रहे हैं. भारत ग्लोबल साउथ के साथ अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है.

भारत का गणतंत्र दिवस क्यों अलग है?

जहां दुनिया के कई देश युद्ध में जीत का जश्न मनाते हैं, वहीं भारत का गणतंत्र दिवस संविधान और लोकतंत्र के सम्मान का प्रतीक है. यही इसे दुनिया की अन्य सैन्य परेडों से अलग बनाता है. गणतंत्र दिवस परेड विदेशी मेहमानों की मौजूदगी गहरी छाप छोड़ती है. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ऊंट सवार टुकड़ियों से खासे प्रभावित हुए थे.

दरअसल, रिपब्लिक डे परेड अपने आप में एक शानदार नजारा होता है, लेकिन ध्यान इस बात पर भी होता है कि समारोह में सबसे खास सीटों पर कौन बैठा है. इस साल, भारत के खास मेहमान हैं, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा होंगे.

राष्ट्रपति के बगल में कौन बैठता है?

यह सिर्फ प्रोटोकॉल का मामला नहीं माना जाता है. दशकों से, मुख्य अतिथि के चुनाव को भारत की विदेश नीति की प्राथमिकताओं और उन संबंधों के संकेतक के रूप में देखा जाता रहा है, जिन्हें दिल्ली किसी खास समय पर उजागर करना चाहता है. रिपब्लिक डे पर किसी विदेशी मेहमान को अपना मुख्य अतिथि बनाने की प्रथा 1950 में शुरू हुई थी. जब तत्कालीन इंडोनेशियाई राष्ट्रपति सुकर्णो भारत की पहली गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुए थे. एक गणतंत्र के रूप में अपने शुरुआती वर्षों में, भारत ने अन्य नए स्वतंत्र देशों के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी थी.

1961 में भारत की गणतंत्र दिवस परेड में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय मुख्य अतिथि थीं. अब तक दुनिया भर के कई नेता इसमें हिस्सा ले चुके हैं. भारत के वैश्विक संबंधों और रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव को संकेत देता है. मुख्य मेहमान पड़ोसी देशों के नेताओं जैसे भूटान और श्रीलंका से लेकर अमेरिका और ब्रिटेन जैसी बड़ी शक्तियों के राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों तक रहे हैं.

भारत का ग्लोबल साउथ पर जोर

यह ऐसे समय में हो रहा है जब भारत अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत जारी रखे हुए है. ये बातचीत, जो लगभग एक साल से चल रही है, ने दोनों देशों के संबंधों में तनाव पैदा कर दिया है, क्योंकि अमेरिका ने भारतीय सामानों पर 50% टैरिफ लगाया है, जो एशिया में सबसे ज्यादा है, जिसमें भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से जुड़े जुर्माने भी शामिल हैं. उन्होंने यह भी बताया कि भारत ग्लोबल साउथ के साथ मिलकर काम कर रहा है.

साल 2018 में एसोसिएशन ऑफ साउथईस्ट एशियन नेशंस (आसियान) के नेताओं को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया था. पंत ने बताया कि यह पहली बार था जब किसी क्षेत्रीय समूह को आमंत्रित किया गया था, जो इस ब्लॉक के साथ भारत के जुड़ाव के 25 साल पूरे होने का प्रतीक था.

चीन को भी शामिल होने का मिला मौका

1965 में पड़ोसी देशों के बीच युद्ध होने से पहले पाकिस्तानी नेता दो बार मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे. उसके बाद इस्लामाबाद को आमंत्रित नहीं किया गया. जो रिश्तों में लगातार तनाव का संकेत है. चीन सिर्फ एक बार शामिल हुआ था जब मार्शल ये जियानयिंग 1958 में आए थे, दोनों देशों के बीच 1962 के युद्ध से चार साल पहले.

पुतिन 2007 में थे मेहमान

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 2007 में गणतंत्र दिवस परेड में शामिल हुए थे. विश्लेषकों का कहना है कि भारत की परेड दुनिया में कहीं और होने वाले इसी तरह के सैन्य प्रदर्शनों से कई कारणों से अलग है. यह तथ्य कि भारत में लगभग हर साल कोई न कोई मेहमान आता है, उनमें से एक है. अधिकांश देशों के लिए, ये परेड सैन्य जीत की याद दिलाती हैं. जैसे रूस का विजय दिवस दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी की हार का प्रतीक है. फ्रांस का बैस्टिल दिवस फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत और राजशाही के पतन का जश्न मनाता है, और चीन की सैन्य परेड दूसरे विश्व युद्ध में जापान पर उनकी जीत का प्रतीक है.

भारत का उत्सव संविधान पर केंद्रित है. "कई अन्य देशों के लिए, ये उत्सव युद्ध में जीत से संबंधित होते हैं. हम उसका जश्न नहीं मनाते। हम एक संवैधानिक लोकतंत्र बनने का जश्न मनाते हैं. इसी दिन यानी 26 जनवरी 1950 को देश में संविधान के लागू हुआ था.

रणनीति और प्रतीकवाद से परे, परेड अक्सर आने वाले नेताओं पर एक ज्यादा व्यक्तिगत छाप छोड़ती है. नाम न बताने की शर्त पर बात करने वाले पूर्व अधिकारी ने बताया कि ओबामा ऊंट पर सवार टुकड़ियों को देखकर खास तौर पर बहुत प्रभावित हुए थे. यह एक ऐसा पल था जो औपचारिक समारोह खत्म होने के काफी समय बाद तक उनके साथ रहा.

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