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ऑस्कर नॉमिनेटिड फिल्म में किया काम, नेशनल अवॉर्ड भी मिला, कौन है वो एक्टर जो अब ऑटो चलाने को है मजबूर?

शफीक ने बताया कि एक समय पर उन्हें महसूस होने लगा कि उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है, जिसके बाद उन्होेंने घर लौटने का फैसला किया और बेंगलुरु चले गए. वह रोज ऑटो चलाकर परिवार पालते हैं.

ऑस्कर नॉमिनेटिड फिल्म में किया काम, नेशनल अवॉर्ड भी मिला, कौन है वो एक्टर जो अब ऑटो चलाने को है मजबूर?
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( Image Source:  @shafiq.syed.official )

साल 1988 में आई फिल्म सलाम बॉम्बे से तो आप सब वाकिफ ही होंगे, फिल्म को ऑक्सर के लिए नॉमिनेट किया गया था. इसमें बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट एक्टर शफीक सैयद ने काम किया था और चैपऊ का किरदार निभाया था जो मुंबई की सड़कों पर जीवन बिताने को मजबूर है. इस फिल्म के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी दिया गया था. लेकिन अब यह हालात है कि वह रोजमर्रा की जिंदगी जीने के लिए ऑटो रिक्शा चलाकर अपना गुजारा करते हैं और रोज 150 रुपये कमा लेते हैं.

2010 में एक ओपन मैगजीन को दिए गए इंटरव्यू में शफीक ने बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें लगा था कि उन्हें तो बिल्कुल भी 'एक्टिंग' नहीं करनी पड़ रही है. फिल्म की भाषा, कहानियां और हालात ऐसे थे जिनसे वो पहले ही गुजर चुके थे. लोगों ने सलाम बॉम्बे को आर्ट फिल्म कहा था, लेकिन सच तो यह है कि वह ऐसी फिल्म नहीं थी. वह सईद की अपनी कहानी जैसी थी. वह भारत की सड़कों पर जीने वाले लोगों की जिंदगी की कहानी थी. सयैद बताते हैं कि यह जिंदगी मौत से अलग नहीं थी, और मैंने उसे जिया था.

उनके साथ काम करने वाले कलाकार रघुवीर यादव, नाना पाटेकर और अनीता कंवर ने उनकी मदद की. उन्होंने सीखा कि एक्टिंग का मतलब है किसी स्थिति में ईमानदारी से 'रिएक्ट' करना. इस दौरान सामने वाले व्यक्ति की हरकतें इशारा देती हैं कि एक्टर को क्या करना है. सयैद कहते हैं कि उन्हें यह छोटी-छोटी बातें सीखनी थीं. यहां तक कि कैमरे के सामने बस खुद जैसा रहना भी उनके लिए सेट पर सीखने जैसा अनुभव था.

अपनी कहानी लगी थी

1980 के दशक में, शफीक बेंगलुरु में अपना घर छोड़कर बिना टिकट मुंबई चले गए थे. जिससे यह पता लगा सकें कि क्या शहर असल में वैसा ही है जैसा बॉलीवुड फिल्मों में दिखता है. जब वे चर्चगेट स्टेशन के पास सड़कों पर रह रहे थे, तो एक दिन एक महिला उनके पास आई और उन्हें व सड़कों पर मौजूद दूसरे बच्चों को एक्टिंग वर्कशॉप में शामिल होने के लिए 20 रुपये देने का ऑफर दिया. दूसरे लोग इसे स्कैम समझकर भाग गए, लेकिन शफीक ने इसे स्वीकार लिया क्योंकि वह भूखे थे. कई अन्य बच्चों के बीच,उन्हें मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे में मुख्य भूमिका निभाने के लिए चुना गया.

जब घर वापस जाने का फैसला किया

फिल्म की कामयाबी के बाद, शफीक ने सोचा कि वह एक्टिंग को गंभीरता से लेंगे. भारत के राष्ट्रपति से सम्मान पाना और नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीतना उनकी जिंदगी के सबसे कीमती और यादगार पलों में से एक था. हालांकि, जल्द ही उन्हें मौके मिलने बंद हो गए. खुद को इग्नोर महसूस करने के बाद, उन्होंने मुंबई छोड़ने और अपने शहर बेंगलुरु वापस जाने का फैसली लिया. घर लौटने पर वह एक्टिंग के बारे में सब कुछ भूल गए और ऑटो-रिक्शा ड्राइवर बनकर काम करने लगे. उन्हें अपने परिवार के 5 अन्य सदस्यों का खर्च उठाना था जो उन पर निर्भर थे, जबकि उनकी रोज की कमाई केवल 150 रुपये थी.

उल्लेखनीय है कि फिल्म सलाम बॉम्बे और पतंग के अलावा शफीक ने साल २०१५ में रिलीज हुई कन्नड़ फिल्म केयर ऑफ फुटपाथ 2 में भी काम किया था और उन्होंने नारियल बेचने वाले व्यक्ति का रोल किया था. लेकिन इसके बाद भी कोई खाल पहचान नहीं मिल पाई.

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