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वेब सीरीज से कितनी अलग है Mirzapur The Movie, जितेंद्र कुमार हुए फुस्स तो रवि किशन ने उड़ाया गर्दा, क्या पैसा वसूल है फिल्म?

अगर आप ‘मिर्जापुर’ के पुराने फैन हैं, तो फिल्म को बड़े पर्दे पर देखने का मजा कहीं ज्यादा हो सकता है. करीब तीन घंटे लंबी होने के बावजूद फिल्म जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस नहीं होती. कहानी में लगातार कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जो दर्शक की दिलचस्पी बनाए रखता है. यानी सीट पर बैठकर बार-बार घड़ी देखने की नौबत कम ही आती है.

वेब सीरीज से कितनी अलग है Mirzapur The Movie, जितेंद्र कुमार हुए फुस्स तो रवि किशन ने उड़ाया गर्दा, क्या पैसा वसूल है फिल्म?
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( Image Source:  instagram-@excelmovies )
हेमा पंत
Edited By:हेमा पंत9 Mins Read

Updated on: 5 Sept 2026 12:54 PM IST

मिर्जापुर’ के तीन सीजन देखने के बाद अगर आपको लगता था कि अब इस कहानी में नया क्या बचा है, तो ‘मिर्जापुर द मूवी’ इस सवाल का दिलचस्प जवाब देती है. फिल्म उसी दुनिया में ले जाती है, लेकिन कहानी को पुराने घटनाक्रम की कॉपी बनाने के बजाय एक अलग रास्ते पर आगे बढ़ाती है. करीब तीन घंटे लंबी यह फिल्म शुरुआत से अंत तक दर्शकों को बांधे रखने की कोशिश करती है.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या फिल्म देखने से पहले ‘मिर्जापुर’ के तीनों सीजन देखना जरूरी है? जवाब है- नहीं. अगर आपने शो देखा है तो आपको पुराने किरदारों और उनके रिश्तों की वजह से फिल्म का मजा ज्यादा आएगा, लेकिन नए दर्शक भी इसे समझ सकते हैं. लेकिन असली सवाल है कि क्या Mirzapur The Movie थिएटर में पैसे खर्च करने लायक है? फिल्म में जहां पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु शर्मा अपने पुराने रंग में नजर आते हैं, वहीं रवि किशन अपने किरदार से अलग ही चमक छोड़ते हैं. दूसरी तरफ जितेंद्र कुमार की कास्टिंग कुछ दर्शकों को खटक सकती है.

वही मिर्जापुर की दुनिया, लेकिन कहानी बिल्कुल नई

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फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यही है कि यह दर्शकों को पुरानी Mirzapur वाली दुनिया में वापस ले जाती है, लेकिन कहानी को वहीं से उठाकर आगे बढ़ाती है. शहर वही है, चेहरे वही हैं और किरदारों के रिश्तों में पुरानी गर्मी भी बरकरार है, मगर इस बार उनके सामने आने वाली परिस्थितियां और घटनाक्रम बिल्कुल नए हैं. यानी फिल्म को देखने पर ऐसा नहीं लगता कि वेब सीरीज की कहानी को ही बड़े पर्दे पर दोबारा परोसा गया है. मेकर्स ने उसी दुनिया के भीतर एक नई कहानी खड़ी करने की कोशिश की है.

नॉस्टैल्जिया है, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं

फिल्म में पुराने किरदारों की वापसी अपने आप में फैंस के लिए बड़ा नॉस्टैल्जिया फैक्टर है. पुराने चेहरों को देखते ही तीनों सीजन की यादें ताजा होती हैं, लेकिन अच्छी बात यह है कि फिल्म हर दूसरे सीन में पुराने डायलॉग, मीम या आइकॉनिक मोमेंट ठूंसकर दर्शकों की भावनाओं से खेलने की कोशिश नहीं करती. जहां पुरानी याद का इस्तेमाल कहानी या माहौल को मजबूत करता है, वहीं उसे जगह दी गई है. यही वजह है कि पुराने संदर्भ फिल्म पर बोझ नहीं बनते, बल्कि कहानी के साथ स्वाभाविक तरीके से चलते हैं.

नए किरदारों ने भी छोड़ी छाप

फिल्म में पुराने किरदारों की भरमार है, लेकिन मेकर्स ने कहानी में कुछ नए चेहरे जोड़कर खेल को थोड़ा और दिलचस्प बना दिया है. अच्छी बात यह है कि ये नए किरदार सिर्फ स्क्रीन भरने या भीड़ बढ़ाने के लिए नहीं आए हैं. कहानी में उनकी अपनी जगह है और कई मौकों पर ये नए चेहरे माहौल को और मजेदार बना देते हैं. खासकर अभिषेक बनर्जी अपनी कॉमिक टाइमिंग और अंदाज से अलग ही छाप छोड़ते हैं. उनका किरदार जब भी स्क्रीन पर आता है, कहानी में हल्कापन और मनोरंजन दोनों बढ़ जाता है.

वहीं बाकी नए कलाकार भी अपने-अपने हिस्से को मजबूती से निभाते हैं और पुराने किरदारों के बीच आसानी से फिट हो जाते हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि फिल्म नए चेहरों को आगे लाने के चक्कर में उन किरदारों को पीछे नहीं करती, जिनसे दर्शकों का पहले से इमोशनल कनेक्शन है. कालीन भैया, गुड्डू पंडित, मुन्ना और बाकी पुराने किरदारों की मौजूदगी अब भी कहानी का असली सेंटर बनी रहती है. यानी नए खिलाड़ी मैदान में जरूर उतरे हैं, लेकिन मिर्जापुर का भौकाल पुराने धुरंधरों के हाथ से निकलने नहीं दिया गया है.

रवि किशन बने फिल्म की जान

अगर फिल्म में किसी एक कलाकार का नाम सबसे पहले लिया जाए, तो रवि किशन बाजी मारते नजर आते हैं. उनका किरदार जैसे-जैसे कहानी में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे उनकी पकड़ भी मजबूत होती जाती है. कई ऐसे मौके आते हैं, जहां बाकी किरदारों के बीच रवि किशन अकेले ही पूरा सीन अपने नाम कर लेते हैं. उनकी बॉडी लैंग्वेज, चेहरे के हावभाव और सबसे बढ़कर डायलॉग बोलने का देसी अंदाज फिल्म के कई हिस्सों में जान डाल देता है. वह सिर्फ गंभीर सीन में ही नहीं, बल्कि हल्के-फुल्के पलों में भी अपनी मौजूदगी से असर छोड़ते हैं.

youtube-@Excel Movies

वहीं पंकज त्रिपाठी को कालीन भैया के रूप में देखना पुराने फैंस के लिए किसी ट्रीट से कम नहीं है. उनका ठहरा हुआ अंदाज, कम बोलकर ज्यादा असर पैदा करने की कला और स्क्रीन पर आते ही माहौल बदल देने वाली मौजूदगी अब भी बरकरार है. ऐसा लगता है जैसे कालीन भैया का किरदार उनके लिए ही बना हो. अली फजल भी गुड्डू पंडित के किरदार में पूरी तरह रचे-बसे नजर आते हैं, जबकि दिव्येंदु शर्मा अपने खास अंदाज और कॉमिक टाइमिंग से फिर वही पुराना मजा पैदा करते हैं. कुल मिलाकर एक्टिंग के मामले में फिल्म पुराने कलाकारों पर काफी भरोसा करती है और यही दांव इसके पक्ष में जाता है.

एक कास्टिंग जो खटकती है

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फिल्म की कास्टिंग ज्यादातर जगह मजबूत नजर आती है, लेकिन बबलू पंडित के किरदार में जितेंद्र कुमार कुछ दर्शकों को थोड़ा अटपटा लग सकते हैं. यहां दिक्कत उनकी एक्टिंग से ज्यादा उस इमेज की है, जो इस किरदार के साथ पहले से जुड़ी हुई है. पिछली कहानी में विक्रांत मैसी ने बबलू के किरदार को इतनी मजबूत पहचान दे दी थी कि उनकी जगह किसी नए चेहरे को देखना अपने आप में तुलना खड़ी कर देता है. जितेंद्र कुमार अच्छे कलाकार हैं, लेकिन उनके पुराने चर्चित किरदार की छाप यहां भी महसूस होती है. यही वजह है कि कुछ दर्शकों को वह बबलू पंडित के रूप में पूरी तरह फिट नहीं लग सकते.

जमीन से जुड़ा एक्शन

Mirzapur The Movie का एक्शन देखकर ऐसा नहीं लगता कि मेकर्स ने हर लड़ाई को जरूरत से ज्यादा बड़ा और चमकदार बनाने की कोशिश की है. यहां मारधाड़ उसी माहौल में रखी गई है, जिससे मिर्जापुर की दुनिया अब तक पहचानी जाती रही है. छोटे शहरों के दबंग, गैंगवार और देसी अंदाज वाली भिड़ंत को ध्यान में रखकर एक्शन को जमीन से जोड़ा गया है. न कोई बेवजह सुपरहीरो वाला स्टंट और न ही ऐसी गोलियां कि देखकर लगे बंदूक नहीं, आतिशबाजी चल रही है. इसी वजह से लड़ाई वाले सीन कहानी का हिस्सा लगते हैं, अलग से चिपकाए हुए एक्शन सीक्वेंस नहीं.

मजेदार है ह्यूमर

ह्यूमर की बात करें तो यहां भी मिर्जापुर वाला देसी स्वाद बरकरार है. मजाक सिर्फ पंचलाइन डालने के लिए नहीं किया गया, बल्कि किरदार जैसा है, उसी के हिसाब से उसका अंदाज और डायलॉग रखा गया है. कहीं किसी की हरकत हंसा देती है तो कहीं डायलॉग का बोलने का तरीका ही मजा दे जाता है. पुराने फैंस को बीच-बीच में वेब सीरीज की झलक जरूर मिलेगी, लेकिन फिल्म बार-बार पुराने चुटकुले निकालकर काम चलाने की कोशिश नहीं करती. यानी एक्शन में जमीन की मिट्टी और ह्यूमर में मिर्जापुर की पुरानी गर्मी, दोनों का बैलेंस फिल्म को मनोरंजक बनाए रखता है.

क्या थिएटर में देखनी चाहिए?

अगर आप ‘मिर्जापुर’ के पुराने फैन हैं, तो फिल्म को बड़े पर्दे पर देखने का मजा कहीं ज्यादा हो सकता है. करीब तीन घंटे लंबी होने के बावजूद फिल्म जरूरत से ज्यादा खिंची हुई महसूस नहीं होती. कहानी में लगातार कुछ न कुछ ऐसा होता रहता है, जो दर्शक की दिलचस्पी बनाए रखता है. यानी सीट पर बैठकर बार-बार घड़ी देखने की नौबत कम ही आती है. बड़े पर्दे पर एक्शन, बैकग्राउंड म्यूजिक और पुराने किरदारों की एंट्री इस अनुभव को और मजेदार बना देती है.

सबसे जरूरी बात यह है कि ‘Mirzapur The Movie’ सिर्फ तीन सीजन की पॉपुलैरिटी को भुनाने के लिए बनाई गई फिल्म नहीं लगती है. इसमें पुरानी पहचान के साथ नई कहानी, नए किरदार और नए टकराव जोड़े गए हैं. कालीन भैया, गुड्डू पंडित और बाकी पुराने चेहरों का अपना जलवा है, तो रवि किशन जैसे कलाकार फिल्म में नया रंग भरते हैं. ह्यूमर और देसी अंदाज भी बरकरार है. अगर आपने वेब सीरीज नहीं देखी है, तब भी फिल्म को एक अलग कहानी के तौर पर समझा जा सकता है, हालांकि पुराने फैंस को कई संदर्भ और किरदार ज्यादा कनेक्ट करेंगे. समय और बजट दोनों हैं, तो थिएटर में टिकट लगाने का रिस्क लिया जा सकता है- कुल मिलाकर पैसा वसूल होने की उम्मीद ज्यादा है.

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