'बॉलीवुड ही नहीं, तंत्र विद्या में भी नेपोटिज्म घुस चुका', अक्षय की Bhooth Bangla में क्या, भूल भुलैया और स्त्री के कितने पास पहुंची?
'भूत बंगला' का पहला हाफ हंसी से भरपूर है, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी कमजोर पड़ जाती है. फिल्म कॉमेडी और हॉरर के बीच संतुलन बनाने में चूक जाती है, जिससे असर अधूरा रह जाता है.
Bhooth Bangla Review: अक्षय कुमार (Akshay Kumar) की नई फिल्म 'भूत बंगला' (Bhooth Bangla) रिलीज हो गई है. फिल्म देखने के बाद जो बात सबसे पहले मन में आई, वो ये कि लगता है अक्षय कुमार ने सोचा होगा- 'अरे, फ्रेंचायजी हाथ से निकल गई तो कोई बात नहीं, एक और हॉरर-कॉमेडी बना देते हैं.' फिल्म में अक्षय कुमार के साथ बहुत अच्छा स्टार कास्ट है, लेकिन सच बात करें तो फिल्म खत्म होने के बाद यही अहसास होता है कि ये 'भूल भुलैया' और 'स्त्री' का मिक्स बनाने की कोशिश लग रही है. फिल्म से तीन बड़े मैसेज निकलते हैं:
- सिर्फ बच्चा पैदा करने से कोई बाप नहीं बन जाता, लेकिन बाल डाई करने से बाप बन जाता है!
- नेटवर्क और इंटरनेट भले ही न मिले, लेकिन मोबाइल में टॉर्च तो जरूर होनी चाहिए!
- बॉलीवुड ही नहीं, तांत्रिक विद्या में भी अब नेपोटिज्म घुस चुका है!
- अगर आप पिछले 15 साल से अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी का इंतजार कर रहे थे, तो ये फिल्म उसी उम्मीद को ध्यान में रखकर बनाई गई है.
क्या है फिल्म की कहानी?
अक्षय कुमार की फिजिकल कॉमेडी आज भी बिल्कुल सटीक और मजेदार है. प्रियदर्शन का वो खास डायरेक्टर स्टाइल, जिसमें एक ही फ्रेम में कई किरदार एक साथ अफरा-तफरी मचाते हैं, फिल्म के पहले हिस्से में बहुत अच्छा काम करता है. कहानी की शुरुआत मीरा (मिथिला पालकर) की शादी से होती है. उसका भाई अर्जुन (अक्षय कुमार) और पिता वासुदेव (जिशु सेनगुप्ता) किसी भी हाल में उसकी शादी करवाना चाहते हैं. अचानक उन्हें पता चलता है कि उनके दादाजी ने मंगलपुर का एक पुराना महल मीरा के नाम कर दिया है. फिर सब फैसला करते हैं कि शादी उसी महल में करेंगे. मंगलपुर के महल पहुंचते ही कहानी में मजेदार किरदार जुड़ते हैं- महल का मैनेजर शांताराम (असरानी), वेडिंग प्लानर जगदीश (परेश रावल) और उसका भांजा सुंदर (राजपाल यादव)। ये तीनों किरदार फिल्म के सबसे बड़े प्लस पॉइंट हैं. इन तीनों के आने के बाद फिल्म पूरी तरह कॉमेडी मोड में आ जाती है. कई सीन ऐसे हैं जहां ज्यादा डायलॉग भी नहीं होते, बस किरदारों के एक्सप्रेशन और टाइमिंग से इतनी हंसी आती है कि पेट दुखने लगता है. पहले हाफ में फिल्म आपको अच्छे से बांधे रखती है और लगता है – वाह! यही वो पुरानी प्रियदर्शन वाली मस्त फिल्म है जिसका हम इंतजार कर रहे थे।लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म का पूरा मूड बदल जाता है.
दूसरे हाफ में कहानी हॉरर की तरफ मुड़ जाती है और वधूसुर नाम का एक राक्षस आ जाता है, जो नई-नई दुल्हनों को उठा ले जाता है. अब फिल्म में सिर्फ भूत नहीं, बल्कि देवता-राक्षस की लड़ाई, परिवार का पुराना राज, तांत्रिक विद्या और उसमें भी नेपोटिज्म जैसे कई एंगल जोड़ दिए जाते हैं. सुनने में ये सब काफी रोचक लगता है, लेकिन स्क्रीन पर ये सब एक साथ इतना ज्यादा हो जाता है कि कुछ भी साफ-साफ समझ नहीं आता. फिल्म कई कहानियों के धागे खोलती है- खासकर बाप और बेटे के रिश्ते वाले हिस्से को लेकिन उन्हें ठीक से जोड़ नहीं पाती. यहां फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी नजर आती है- स्क्रिप्टिंग में. पहले हाफ में जो मजबूत सेटअप बनाया गया था, वो दूसरे हाफ में धीरे-धीरे बिखरने लगता है. वधूसुर का जो डर पहले बनाया गया था, वो उसके आने के बाद भी उतना खतरनाक या डरावना महसूस नहीं होता. कई सीन ऐसे लगते हैं जिन्हें जबरदस्ती कहानी में डाला गया है.
उदाहरण के तौर पर, मीरा के बॉयफ्रेंड परिवार और ज्योतिषी के दबाव में शादी रद्द करने के लिए तैयार हो जाता है. अगर वो सच में शादी रद्द कर देता, तो सारी समस्या खत्म हो जाती. लेकिन फिल्म लॉजिक की जगह ड्रामा को ज्यादा महत्व देती है. पूरी फिल्म देखते समय बार-बार 'भूल भुलैया' और 'स्त्री' की याद आती रहती है. 'भूल भुलैया' ने भूत-प्रेत को साइंटिफिक तरीके से समझाया और एक अच्छा एन्ड दिया था.
फिल्म में क्या है कमी?
'स्त्री' ने हॉरर के जरिए एक सोशल मैसेज दिया था. लेकिन 'भूत बंगला' इन दोनों फिल्मों के बीच फंसकर रह जाती है. यहां असली भूत है, VFX भी काफी अच्छा है, क्लाइमेक्स के विजुअल्स भी ठीक-ठाक हैं, लेकिन फिल्म के पास कोई डीप या स्ट्रांग मैसेज नहीं है. नई दुल्हनों को उठा ले जाने वाला 'वधूसुर' का आइडिया बहुत अच्छा था. इसे शादी के दबाव, परिवार के जोर-जबरदस्ती जैसे मुद्दों से जोड़ा जा सकता था, लेकिन फिल्म इस दिशा में ज्यादा गहराई तक नहीं जाती. फिल्म में तब्बू और वामिका गब्बी जैसे दमदार कलाकार हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें सही से इस्तेमाल नहीं किया गया. उनके किरदार कहानी में आते हैं, लेकिन उनका असर लगभग कुछ भी नहीं रहता. फिल्म एक आइकॉनिक गाना या मोमेंट बनाने की कोशिश भी करती है जैसे 'भूल भुलैया' में 'आमी जे तोमार' लेकिन वो जादू यहां नहीं बन पाता.
हल्की-फुल्की कॉमेडी और फैमिली एंटरटेनमेंट
कुल मिलाकर 'भूत बंगला' एक ऐसी फिल्म है जो पहले हाफ में आपको खूब हंसाती है और अच्छे से एंटरटेन करती है. लेकिन दूसरे हाफ में कहानी बिखर जाती है और फिल्म अपनी पकड़ खो देती है. अक्षय कुमार, परेश रावल, असरानी और राजपाल यादव की शानदार एक्टिंग फिल्म को काफी हद तक संभाल लेती है. लेकिन एक मजबूत और साफ स्क्रिप्ट की कमी साफ दिखती है. अगर आप सिर्फ हल्की-फुल्की कॉमेडी और फैमिली एंटरटेनमेंट के लिए फिल्म देखना चाहते हैं, तो ये फिल्म आपको निराश नहीं करेगी. फैमिली के साथ देखने लायक है लेकिन अगर आप प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी से कुछ यादगार, नया और अलग अनुभव चाहते हैं, तो ये फिल्म उस उम्मीद को पूरी तरह पूरा नहीं कर पाती. फिल्म का म्यूजिक भी ऐसा है कि याद नहीं रहता. स्टेट मिरर इसे 2.5 स्टार देगा. ये फिल्म हंसाती है, एंटरटेन करती है, लेकिन दिल में नहीं बसती क्योंकि ओरिजिनल (OG) तो ओरिजिनल ही होता है और ये फिल्म आपको 'भूल भुलैया' को भूलने नहीं देती.




