Middle East War: तेल का प्यासा क्यों है अमेरिका? Turmp की नजर ईरान के ऑयल पर, प्लानिंग भी तैयार
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के बीच तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है, जहां एक महीने में कच्चा तेल करीब 50% महंगा होकर 72 डॉलर से 116 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया. आइए इस खबर में जानते हैं कि जब अमेरिका में तेल पाया जाता फिर क्यों दूसरे देशों के तेल पर इसकी नजर रहती है.
मिडिल ईस्ट में एक महीने से ज्यादा समय से जारी जंग ने पूरी दुनिया को हिला दिया है. इस बीच Donald Trump का बयान दिया है कि 'ईरान का तेल अपने कब्जे में लेना चाहता हूं'. सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि आने वाले बड़े भू-राजनैतिक टकराव का संकेत माना जा रहा है.
28 फरवरी को हमले से पहले कच्चे तेल की कीमत करीब 72 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन युद्ध के बाद यह बढ़कर 116 डॉलर तक पहुंच गई. यानी सिर्फ एक महीने में 50% से ज्यादा उछाल और यही है असली 'तेल का खेल', जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है.
Donald Trump ने Financial Times को दिए इंटरव्यू में साफ कहा कि उनकी 'पसंदीदा चीज' ईरान का तेल लेना है और इसके लिए अमेरिका के पास कई विकल्प हैं. उन्होंने फारस की खाड़ी में स्थित खार्ग द्वीप का भी जिक्र किया, जो Iran के लगभग 90% तेल निर्यात का केंद्र है. ऐसे में इस इलाके पर नियंत्रण का मतलब सीधे तौर पर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पकड़ बनाना है.
तेल के लिए क्यों रोता रहता है अमेरिका?
अब सवाल उठता है कि जब अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा तेल उत्पादन करता है, तो फिर क्यों वह दूसरे देशों से तेल के लिए रोता रहता है? आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका रोज़ करीब 1.34 करोड़ बैरल तेल उत्पादन करता है, लेकिन इसके बावजूद वह लगभग 20 लाख बैरल तेल आयात भी करता है. इसकी सबसे बड़ी वजह है.तेल की “क्वालिटी”.
दरअसल, कच्चा तेल एक जैसा नहीं होता. इसे उसकी density, sulfur और flow के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. हल्का कच्चा तेल (Light Crude Oil) आसानी से रिफाइन होता है और इससे पेट्रोल व जेट फ्यूल जैसे प्रोडक्ट बनते हैं, जबकि भारी कच्चा तेल (Heavy Crude Oil) गाढ़ा होता है और इसे प्रोसेस करना मुश्किल होता है, लेकिन यह सस्ता होता है और जहाज ईंधन या सड़क निर्माण में ज्यादा उपयोगी है.
अमेरिका की असली समस्या यहीं से शुरू होती है. वहां का करीब 80% उत्पादन हल्के कच्चे तेल का है, जबकि उसकी ज्यादातर रिफाइनरियां भारी तेल को प्रोसेस करने के लिए बनी हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि 20वीं सदी में अमेरिका बड़े पैमाने पर भारी तेल आयात करता था और उसी हिसाब से उसका रिफाइनरी सिस्टम तैयार हुआ.
आज स्थिति यह है कि अमेरिका हल्का तेल पैदा करता है, लेकिन उसकी प्रोसेसिंग क्षमता भारी तेल के लिए ज्यादा उपयुक्त है. इसी कारण वह अपना हल्का तेल महंगे दाम पर बेचता है और बाहर से सस्ता भारी तेल खरीदता है.
किस-किस देश में तेल पाया जाता है?
मिडिल ईस्ट की जंग ने इस पूरी रणनीति को और अहम बना दिया है. यह क्षेत्र दुनिया का सबसे बड़ा तेल हब माना जाता है. यहां नियंत्रण का मतलब है. ग्लोबल सप्लाई पर पकड़, कीमतों पर प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दबदबा. Iran, Iraq और Saudi Arabia जैसे देश सिर्फ तेल उत्पादक नहीं, बल्कि 'एनर्जी पावर सेंटर' हैं.
तेल के चक्कर में Venezuela को ट्रंप ने बनाया था निशाना
इस पूरे खेल में Venezuela एक छुपा हुआ लेकिन बेहद अहम खिलाड़ी है. इसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों, कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर और राजनीतिक अस्थिरता के कारण इसका उत्पादन सीमित है. इसके बावजूद चीन इसका बड़ा खरीदार बना हुआ है, जिसे अमेरिका किसी भी कीमत पर कम करना चाहता है.
Donald Trump ने तो यहां तक आरोप लगाया कि वेनेज़ुएला ने “अमेरिका का तेल चुराया”, जबकि Nicolás Maduro की सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है. इसके अलावा, अमेरिका की तेल नीति के पीछे कई और वजहें भी हैं. देश की खपत बहुत ज्यादा है. रोज़ाना 18 से 20 मिलियन बैरल तक. तेल एक ग्लोबल कमोडिटी है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का असर सीधे अमेरिका पर भी पड़ता है. कुछ इलाकों में लॉजिस्टिक्स के कारण आयात करना सस्ता पड़ता है, और सबसे अहम बात. अमेरिका अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता.
इन सभी तथ्यों को जोड़कर देखें, तो साफ होता है कि तेल अब सिर्फ एक ईंधन नहीं रहा. मिडिल ईस्ट की जंग, ईरान के तेल पर कब्जे की बात और वेनेज़ुएला में दखल. ये सभी संकेत देते हैं कि आने वाले समय में तेल ही सबसे बड़ा “पावर वेपन” बन सकता है, जिसके दम पर दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों तय होंगी.